कौन और क्यों बनाता है 21वीं सदी की डायन

magicsouth-kanjia-mray-villageअगस्त माह के पहले पखवाड़े में झारखंड एक बार फिर शर्मसार हुआ, जहां डायन होने और जादू-टोना करने के आरोप में सात महिलाओं समेत नौ लोग मौत के घाट उतार दिए गए. बीते 14 अगस्त की रात लोहरदगा ज़िले के हुदु गांव निवासी मना मुंडा एवं बुधराम उरांव नामक वृद्धों को आठ वर्षीय बालक सूरज उरांव का इलाज झाड़-फूंक के ज़रिये कर पाने में नाकाम रहने पर पंचायत ने उन्हें पीट-पीटकर मार डालने की सजा सुनाई.

इससे पहले सात अगस्त की रात राजधानी रांची से 37 किलोमीटर दूर मांडर थाना अंतर्गत दक्षिण कंजिया मराय टोली नामक गांव में अंधविश्वा3सी जनता ने ओझा-गुनी के कहने पर पांच महिलाओं को पहले निर्वस्त्र किया, फिर पत्थरों एवं लाठी-डंडों से पिटाई कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया. पलामू एवं गुमला ज़िलों से भी डायन करार देकर दो महिलाओं की हत्या कर देने की ख़बर है. दक्षिण कंजिया मराय टोली की घटना में पुलिस ने 25 लोगों को गिरफ्तार किया है.

हुआ यह कि दो अगस्त को गांव के इस्तानिस जलहा खलखो के 13 वर्षीय बेटे विपिन की असामयिक मौत हो गई. ओझा-गुनी ने बताया कि इसके पीछे गांव की एतवारिया खलखो का हाथ है. गांव में पहले हुई कुछ अन्य मौतों के लिए भी ओझा-गुनी मारी गई महिलाओं को दोषी करार दे चुके थे. नतीजतन, पंचायत बुलाकर एतवारिया, जसिंता, तेतरी, रकिया एवं मदनी को यह सजा दी गई. जसिंता एवं मदनी की उम्र क़रीब 60 वर्ष बताई जाती है.

राज्य में ऐसी यह पहली घटना नहीं है. बीते 12 मई की रात नक्सल प्रभावित ज़िले सिमडेगा के कोलेबिरा थाना अंतर्गत गांव सरईपानी में दो वृद्धाओं रतनी एवं विमला को डायन बताकर मार दिया गया. रतनी के पति हौड़ा प्रधान के अनुसार, मौ़के पर बड़ी संख्या में तीर-कमान से लैस पुरुष-महिलाएं एवं बच्चे मौजूद थे. रतनी एवं विमला को सबने पहले लात-घूंसों एवं लाठी-डंडों से पीटा और फिर चट्टानों से नीचे फेंक दिया. पुलिस भी दोनों वृद्धाओं के शव बरामद नहीं कर सकी.

डायन अथवा डाकन का यह अभिशाप केवल झारखंड को नहीं डस रहा है, बल्कि इसकी गिरफ्त में देश का एक बड़ा हिस्सा है. उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, तमिलनाडु, असम, पश्चिाम बंगाल एवं राजस्थान के पिछड़े इलाकों से ऐसी ख़बरें आएदिन सुनने को मिलती हैं. बीती 21 जुलाई को असम के सोनितपुर ज़िले के विमाजुली गांव में 63 वर्षीय मोनी ओरांग नामक वृद्धा को दो सौ से ज़्यादा लोगों की भीड़ ने घर से बाहर निकाल कर पहले उसके कपड़े फाड़े, फिर पीटने के बाद धारदार हथियार से उसका सिर कलम कर दिया.

इससे पहले बीती 11-12 जुलाई को ओडिशा के क्योंझर ज़िले में एक ही परिवार के पांच सदस्यों को अंधविश्वा-सी लोगों ने कुल्हाड़ी से काट डाला. मरने वालों में तीन बच्चे भी शामिल थे. हत्यारों का मानना था कि उक्त परिवार जादू-टोने में लिप्त था, जिसके चलते इलाके के बच्चे बीमार हो जाते हैं. इसी तरह बीती दो फरवरी को बिहार के बांका ज़िले के बौंसी थाना अंतर्गत सांगा पंचायत के आदिवासी बाहुल्य गांव पथरिया में एक वृद्धा और उसकी 40 वर्षीय बेटी को डायन करार देकर पहले गर्म सलाखों से दागा गया, फिर मल-मूत्र पिलाया गया और अर्द्धनग्न कर पीटा गया.

बीते वर्ष 29-30 नवंबर को मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले के गांव रायसेड़ा में एक दलित महिला को जादू-टोने के शक में न स़िर्फ लाठियों से पीटा गया, बल्कि उसे निर्वस्त्र करके गले में जूतों-चप्पलों की माला पहना कर पूरे इलाके में घुमाया गया. उसे गांव के बाहर स्थित तालाब में तीन घंटे तक खड़ा भी रखा गया.

एक जनवरी, 2011 लेकर मार्च 2014 तक देश भर में कुल 527 महिलाएं इस अंधविश्वा स का शिकार बनीं. 2011 में 240, 2012 में 119, 2013 में 160 एवं 2014 के मार्च माह तक आठ महिलाएं डायन होने और जादू-टोने के आरोप में अपनी ज़िंदगी से हाथ धो बैठीं. यह कड़वा सच स्वयं केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 25 जुलाई, 2014 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में उद्घाटित किया.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के सहारे मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट तो पेश कर दी, लेकिन महिलाओं पर हो रहे इस अत्याचार को रोकने के लिए उसके पास कोई ठोस योजना नहीं है. उसने इसे राज्य के तहत क़ानून व्यवस्था का मामला बताते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया. दरअसल, अशिक्षा एवं ग़रीबी के चलते लोग कोई बीमारी होने पर पहले ओझा-गुनी के पास भागते हैं. बाद में हालत बिगड़ने पर डॉक्टर या अस्पताल की शरण लेते हैं.

अगर कहीं मरीज की मौत हो जाए, तो ऐसे में ओझा-गुनी जिसकी तरफ़ इशारा कर दे, उसे डायन-टोटकेबाज कहकर सजा देना आम बात है. उसके बाल काटना, मल-मूत्र पिलाना, मुंह काला करके घुमाना, निर्वस्त्र कर पीटना समाज के लोग अपना धर्म-हक़ समझ लेते हैं. कभी-कभी तो सामूहिक दुराचार तक अंजाम दिया जाता है. बीते तीन जून को मध्य प्रदेश के शिवपुरी ज़िले की ग्राम पंचायत ठेवला अंतर्गत मजरा कैमरारा में दबंगों ने एक आदिवासी महिला पर डायन होने का आरोप लगाते हुए उसे उसके घर से खींचकर गांव के बीच स्थित चबूतरे पर लाकर दो दिन सामूहिक बलात्कार किया.

दबंग हर रा़ेज उसे उसके घर से बाल पकड़ कर चबूतरे तक लाते और फिर उससे सामूहिक दुष्कर्म करते. अफ़सोस की बात यह कि 70 घरों वाले उस गांव के किसी भी शख्स ने विरोध तक नहीं किया और न पुलिस को सूचना दी.

बिहार के खगड़िया ज़िले में बेलदौर थाना क्षेत्र के गांव भरना में दबंगों ने 65 वर्षीय कौशल्या को लाठी-डंडों से पीटा और उसके आगे एक महिला का शव रखकर उसे ज़िंदा करने के लिए कहा. पीड़िता की पुत्री के मुताबिक, गांव के जंग बहादुर सिंह की बहू काफी दिनों से बीमार थी, जिसकी मौत हो गई. इसके लिए कौशल्या को ज़िम्मेदार ठहराते हुए डायन करार देकर उसकी जमकर पिटाई की गई. खगड़िया में एक महिला पंचायत सदस्य भी ऐसे अंधविश्वाकसी लोगों का शिकार बन गई. पांच लोगों ने डायन-टोनहिन कहकर पहले उसे जमकर पीटा और फिर उसकी नाक काट ली.

मुजफ्फरपुर के हथौड़ी थाना अंतर्गत गांव सिमरी में 65 वर्षीय सुशीला को उसके पड़ोसियों ने डायन बताते हुए लाठियों से इतना पीटा कि वह अधमरी हो गई. पड़ोसी की 20 वर्षीय बेटी की तबियत खराब होने का खामियाजा सुशीला को भुगतना पड़ा. दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह कि पुलिस ने सुशीला की पीड़ा सुनने के बजाय उसे दुत्कारते हुए थाने से भगा दिया. झारखंड के रांची के लापुंग इलाके में दो आदिवासी महिलाओं को डायन बताकर मौत के घाट उतार दिया गया.

पुलिस ने उनमें से एक महिला की लाश बेलारी नदी के किनारे बरामद की. बंधनी मुंडाइन नामक यह महिला कई दिनों से गायब थी. पश्चिचमी सिंहभूम ज़िले के झींकपानी थाना अंतर्गत गांव सोनापासी में निराशो गोप नामक महिला को डायन बताते हुए जान से मारने की कोशिश की गई. उसके भाई को भी लोहे की राड से पीटा गया. राजस्थान के उदयपुर के सलंबूर थाना अंतर्गत गांव कराकली में केशीबाई नामक वृद्धा को उसके भतीजे ने इस कदर पीटा कि अगले दिन उसकी मौत हो गई.

इसी उदयपुर के गोगुंदा थाना अंतर्गत गांव सेलू निवासी 65 वर्षीय वृद्धा हगामी पर डायन होने का आरोप लगाकर उसके निकट संबंधियों ने उस पर थूका और मुंह में जूता ठूंसने का प्रयास किया. कुछ दिनों पहले उक्त वृद्धा के जेठ ओमकार के पुत्र मांगी लाल की मृत्यु हो गई थी. ओमकार का मानना था कि उसके बेटे की मौत हगामी की वजह से हुई, क्योंकि वह डायन है. राष्ट्रीय महिला आयोग केे अनुसार, देश के 50 से ज़्यादा ज़िलों में डायन प्रथा का प्रकोप है. बहुत छोटी-छोटी बातों पर किसी भी महिला को डायन या डाकन बता दिया जाता है, जैसे कुएं का पानी सूख जाना, गाय दूध देना बंद दे अथवा पड़ोस में किसी का बीमार हो जाना आदि. प

एक केंद्रीय क़ानून बनाने की ज़रूरत

डायन कहकर महिलाओं के उत्पीड़न, अपमान और जान से मार देने की घटनाओं को देखते हुए 1996 में बिहार की संस्था फ्री लीगल एड कमेटी (फ्लैक) के संस्थापकों में से एक प्रेमचंद प्रेम ने इस संबंध में एक क़ानून की ज़रूरत महसूस की. पटना जाकर उन्होंने तत्कालीन बिहार के प्रत्येक विधायक से संपर्क साधा और डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम बनवाने के लिए सहायता मांगी.

प्रेमचंद जब डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम बनवाने के लिए प्रयास कर रहे थे, तो कुछ राजनेताओं ने उनके क़दम को आदिवासी संस्कृति पर हमला बताकर विरोध भी किया, लेकिन 1999 में बिहार विधानसभा एवं विधान परिषद ने यह अधिनियम पारित कर मंजूरी के लिए राज्यपाल को भेज दिया. 20 अक्टूबर, 1999 को राज्यपाल ने डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम को मंजूरी दे दी. यह दिन बिहार में आज भी अंधविश्वानस विरोधी दिवस के रूप में मनाया जाता है.

एकीकृत बिहार देश का ऐसा पहला राज्य बना, जिसके पास इस तरह का क़ानून था. 2000 में जब बिहार का विभाजन हुआ और झारखंड पृथक राज्य बना, तो उसने भी यह क़ानून अपने यहां लागू किया. इस अधिनियम के अंतर्गत आरोपी को तीन महीने की कैद एवं एक हज़ार रुपये जुर्माने और ओझा-गुनी को एक साल की कैद एवं दो हज़ार रुपये जुर्माने का प्रावधान है.

2009 में तत्कालीन केंद्रीय बाल एवं महिला कल्याण मंत्री कृष्णा तीरथ ने डायन प्रथा प्रतिषेध राष्ट्रीय क़ानून बनाने का आश्वाासन भी दिया था, लेकिन आज तक उसका कहीं कोई अता-पता नहीं है. बीते 16 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन ने डायन बताकर महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार के विरोध में प्रदर्शन किया. संगठन की अध्यक्ष रजनी तिलक ने आरोपियों को फांसी देने, डायन शब्द को असंवैधानिक घोषित करने और एक केंद्रीय क़ानून बनाने की मांग की.

पिछले दिनों राजस्थान हाईकोर्ट ने भी राज्य सरकार से डायन प्रथा विरोधी क़ानून को लेकर जवाब-तलब किया. नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अजीत सिंह एवं न्यायमूर्ति एएस ग्रेवाल की खंडपीठ ने बीती 13 जुलाई को आदेश दिए कि जब तक यह क़ानून विधिवत लागू नहीं हो जाता, तब तक पीड़ितों को पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत दो लाख रुपये की क्षतिपूर्ति जारी रखी जाए.

याचिका में कहा गया था कि राज्य विधानसभा में डायन प्रथा विरोधी क़ानून पारित तो कर दिया गया, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया, जिससे उसका लाभ पीड़ितों को नहीं मिल पा रहा है. राज्य सरकार की ओर से कहा गया है कि अतिशीघ्र यह क़ानून पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा. सामाजिक कार्यकर्ताओं का मत है कि देश में मौजूद विभिन्न क़ानूनों के ज़रिये भी दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करके पीड़ित को न्याय दिलाया जा सकता है, लेकिन पुलिस ऐसे मामलों में जान-बूझकर रुचि नहीं लेती.

राजस्थान के भीलवाड़ा निवासी बोली देवी विश्नोजई का मामला यही बताता है. बोली देवी को डायन बताकर समाज ने इस कदर अपमानित किया कि उनके सरकारी कर्मचारी पति को दबाव और तनाव के चलते नौकरी छोड़नी पड़ी. उनकी बहुओं को भी बेइज्जत किया गया. उनका घर से निकलना और कहीं आना-जाना तक बंद हो गया.

पर्दे के पीछे छिपी घिनौनी साजिश

ऐसी घटनाओं के पीछे एक बड़ी वजह बेसहारा महिलाओं की संपत्ति पर दबंगों की गिद्ध-दृष्टि, भूमि संबंधी विवाद, पुरानी रंजिश एवं आपसी ईर्ष्या-भाव भी है. जवान-विधवा औरतों पर कुदृष्टि रखने वाले असरदार लोग भी ओझा-गुनी द्वारा उसे डायन करार देने की धमकी देकर अनुचित लाभ उठाते हैं और नाकाम रहने पर ऐसी औरतें मौत के घाट उतार दी जाती हैं. पीड़ित पक्ष की सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि गांव या क्षेत्र का कोई भी शख्स उसकी मदद के लिए आगे नहीं आता.

लोग हमलावरों का साथ इसलिए देते हैं, क्योंकि वे संख्या बल में ज़्यादा होते हैं या फिर उन्हें समाज के ख़िलाफ़ जाने में डर लगता है. पीड़ित पक्ष को पुलिस या अस्पताल जाने के लिए साधन तक नहीं मिल पाता. पैसों का प्रबंध करने के लिए उसे खेत, घर या फिर गहने-बर्तन गिरवी रखने पड़ते हैं. इलाकाई साहूकार भी गरज देखकर कर्ज की रकम पर ब्याज दर को लेकर मनमर्जी चलाते हैं. उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले के गांव घघरीटोला निवासी जोधी लाल की कहानी कुछ यही पीड़ा बयां करती है.

जोधी लाल को डायन-टोनहिन के आरोप के चलते कुल्हाड़ी के अनगिनत वार सहने वाली अपनी पत्नी मनबसिया को बचाने की ख़ातिर खेत और महुआ के 13 पेड़ महज एक हज़ार रुपये में गिरवी रखने पड़े. जोधी लाल पुलिस के पास भी गया, लेकिन उसे फटकार और भद्दी गालियां मिलीं. जब अदालत ने आदेश किया, तब कहीं जाकर उसका मुक़दमा दर्ज हुआ. बकौल जोधी लाल, डायन-चुड़ैल जैसी कोई बात नहीं थी. हमलावरों से पेड़ और ज़मीन को लेकर उसका विवाद चल रहा था. इसी बीच उस परिवार के एक लड़के की मृत्यु हो गई, जिसके लिए मनबसिया को दोषी ठहरा दिया गया.

महेंद्र अवधेश

महेंद्र अवधेश पिछले १८ वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय हैं.स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक,हर शनिवार, मेरी संगिनी, विचार सारांश में बतौर उप संपादक सेवाएं देने के बाद अक्टूबर २००९ से चौथी दुनिया में वरिष्ठ कॉपी संपादक के रूप में कार्यरत हैं.शुक्रवार, बिंदिया, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, हरिभूमि, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका आदि पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.
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महेंद्र अवधेश पिछले १८ वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय हैं. स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक, हर शनिवार, मेरी संगिनी, विचार सारांश में बतौर उप संपादक सेवाएं देने के बाद अक्टूबर २००९ से चौथी दुनिया में वरिष्ठ कॉपी संपादक के रूप में कार्यरत हैं. शुक्रवार, बिंदिया, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, हरिभूमि, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका आदि पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.