किसका कितना नफा-नुक़सान

bihar-chunavजनगणना के धार्मिक आंकड़े

जनगणना के धार्मिक आंकड़ों ने बिहार के चुनावी माहौल में नई लहर पैदा कर दी है. हालांकि, दावा किया जा रहा है कि इसका बिहार विधानसभा चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है. यह महज एक संयोग है कि बिहार विधानसभा चुनाव के कुछ पहले इन्हें जारी किया जा रहा है. ये आंकड़े क़रीब पांच साल पहले यानी 2011 की जनगणना में हासिल किए गए थे. चूंकि जनगणना के विविध आंकड़े कई चरणों में जारी होते हैं, लिहाजा इन्हें भी जारी कर दिया गया. यह दावा सहज विश्वास करने योग्य नहीं है.

इन आंकड़ों का राजनीतिक उपयोग तय है और फिलहाल यह बिहार में किया जाना है. बिहार की मौजूदा (2011 की जनगणना के हिसाब से) आबादी 10 करोड़ 41 लाख है. कुल आबादी में हिंदू 82.69 प्रतिशत और मुस्लिम 16.87 प्रतिशत हैं. रिपोर्ट के अनुसार, सूबे में इन दस वर्षों (2001-11) में हिंदुओं के म़ुकाबले मुसलमानों की आबादी में बढ़ोत्तरी की रफ्तार अधिक रही और हिंदुओं की तुलना में उनकी आबादी 3.34 प्रतिशत बढ़ी है.

पिछली जनगणना (2001) के बाद हिंदुओं की आबादी 24.61 प्रतिशत बढ़ी, जबकि मुस्लिम आबादी में 27.95 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई. सूबे में ईसाई आबादी में बढ़ोत्तरी का प्रतिशत सबसे अधिक यानी 143 रहा. वहीं बौद्धों की आबादी में 41.25, जैन समुदाय की आबादी में 17.58 और सिखों की आबादी में 14 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई.

रिपोर्ट के अनुसार, किशनगंज में मुस्लिम सबसे अधिक हैं. इस ज़िले की कुल जनसंख्या 16.90 लाख है, जिनमें मुस्लिम 11.49 लाख और हिंदू 5.31 लाख हैं. कटिहार की कुल जनसंख्या 30.71 लाख है, जिसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी 13.65 लाख है. पूर्णिया की जनसंख्या 32.84 लाख है, जिसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी 12.55 लाख है. अररिया की कुल जनसंख्या 28.11 लाख है, जिसमें मुसलमानों की हिस्सेदारी 12.07 लाख है.

इसके अलावा पूर्वी चंपारण में 9.90 लाख, दरभंगा में 8.81 लाख, पश्चिमी चंपारण में 8.65 लाख, मधुबनी में 8.18 लाख, मुजफ्फरपुर में 7.45 लाख, सीतामढ़ी में 7.40 लाख और सीवान में 6.06 लाख मुसलमान हैं. जबकि शिवहर, सुपौल, जहानाबाद, अरवल, लखीसराय एवं शेखपुरा में मुस्लिम आबादी लाख से नीचे है. ग़ौरतलब है कि भारत सरकार के पास ये आंकड़े क़रीब डेढ़ साल से तैयार थे. पिछले संसदीय चुनाव के पहले इन्हें जारी होना तय था, लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसके राजनीतिक निहितार्थ अपने अनुकूल न पाकर ऐसा करने से खुद को रोक लिया.

इस साल जनवरी में केंद्र के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व ने अघोषित कारणों से ऐसा नहीं होने दिया. लगता है, उपयुक्त राजनीतिक मा़ैके की तलाश थी और बिहार विधानसभा चुनाव से बेहतर ऐसा अवसर भला क्या होता! धार्मिक समूहों की जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) स्थिति का इस चुनाव में उत्तेजक राजनीतिक इस्तेमाल हो सकता है.

बिहार में चुनाव के दौरान तीखे सामाजिक समीकरण बनते हैं, जो तात्कालिक राजनीतिक विवशताओं के चलते बदलते रहते हैं, तो कुछ एक से अधिक चुनावों में काम करते हैं. बिहार में माय (मुस्लिम-यादव) सबसे पुराना समीकरण है, जो अपनी राजनीतिक प्रकृति में भाजपा विरोधी माना जाता है. यह समीकरण लालू प्रसाद के साथ है और उनकी ताकत का मूल स्रोत भी. 1995 से लेकर अब तक के सारे चुनावों में यह कमोबेश उनकी राजनीति के साथ रहा है. राज्य के मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह भाजपा (एनडीए) के लिए बड़ी चुनौती है.

बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से 50 से अधिक सीटों पर जीत-हार में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. क़रीब सौ सीटों पर माय उल्लेखनीय ढंग से ताकतवर है. यह राजनीतिक वास्तविकता भाजपा (एनडीए) को कतई रास नहीं आ रही है. हालांकि, अगड़ों का आम समर्थन भाजपा को है, पर उसे माय के समानांतर पिछड़े मतदाताओं की स्पष्ट गोलबंदी चाहिए.

गत संसदीय चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम पर माय से इतर मतदाताओं की गोलबंदी हुई थी, पर उसमें मोदी की सामाजिक पृष्ठभूमि की बड़ी भूमिका रही थी. इस बार ऐसा नहीं है. निस्संदेह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब भी किसी राजनेता से अधिक है, लेकिन उनके नाम पर पिछड़े सामाजिक समूहों में पिछली बार जैसी गोलबंदी कहीं दिख नहीं रही है. ऐसे में भाजपा को नया हथियार चाहिए. ऐसे में धार्मिक ध्रुवीकरण सबसे आसान और धारदार हथियार हो सकता है, जो जनगणना के धार्मिक आंकड़े उसे सहज उपलब्ध करा रहे हैं. रिपोर्ट बताती है कि पूर्णिया प्रमंडल के चारों ज़िलों (पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, कटिहार) के साथ-साथ दरभंगा, मधुबनी, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीवान एवं मुजफ्फरपुर में मुस्लिम मतदाताओं का खासा राजनीतिक महत्व रहेगा.

भाजपा के चुनावी रणनीतिकार महा-गठबंधन को शिकस्त देने के लिए इस धार्मिक समूह के ़िखला़फ आम गोलबंदी की कोशिश करेंगे. सच्चाई यह भी है कि पूर्णिया प्रमंडल भाजपा के लिए सदैव चुनौती भरा रहा है. बांग्लादेशी घुसपैठ को मुद्दा बनाकर भाजपा वहां अपनी राजनीति कभी परवान चढ़ाती थी, पर 2005 में एनडीए की सरकार बनने के बाद उसने इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया. अब तो केंद्र में मोदी सरकार के चलते यह मुद्दा उठाना उसके लिए और भी कठिन है.

जनगणना के धार्मिक आंकड़े जारी होने को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सामान्य प्रशासनिक कामकाज का अंग बताया है और राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने अब तक कोई गंभीर प्रतिक्रिया नहीं दी. वस्तुत: यह रिपोर्ट राजद प्रमुख की राजनीति को एक साथ कई अवसर देती है. पूर्णिया और सहरसा के साथ-साथ दरभंगा प्रमंडल के विधानसभा क्षेत्रों को लेकर उन्हें नए सिरे से अपनी रणनीति तय करनी होगी. माय को राजनीतिक तौर पर ज़्यादा सार्थक, ज़्यादा धारदार और लाभकारी बनाना होगा.

गत संसदीय चुनाव में बिहार ने देखा है कि नरेंद्र मोदी की सामाजिक पृष्ठभूमि के नाम पर किस तरह मंडल के सामाजिक समूहों में भाजपा ने सेंधमारी की. जनगणना के धार्मिक आंकड़े भाजपा को ज़्यादा धारदार और स्थायी हथियार देते हैं. महा-गठबंधन के नेताओं, विशेषकर लालू प्रसाद को इस रणनीति की काट तैयार करनी होगी.

इसी साल जुलाई के पहले हफ्ते में जनगणना के सामाजिक-आर्थिक आंकड़े जारी किए गए थे. उसी के साथ बिहार समेत देश के विभिन्न हिस्सों से जातीय आंकड़े जारी करने की मांग उठने लगी. बिहार में राजद प्रमुख ने इस मांग को लेकर राजभवन तक मार्च किया, राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा, धरना दिया, उपवास किया और बिहार बंद का आह्वान भी किया. लालू प्रसाद की इस राजनीतिक सक्रियता के चलते ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को अपनी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सामाजिक पृष्ठभूमि की सार्वजनिक तौर पर चर्चा करनी पड़ी. जनगणना के धार्मिक आंकड़े जारी होने से बिहार की चुनावी राजनीति को नया आयाम मिला है, जिसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है.

अब देखना यह है कि महा-गठबंधन का नेतृत्व, विशेषकर लालू प्रसाद अपने माय को बचाने के लिए क्या करते हैं? लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती महा-गठबंधन के सामने है, उन्हें मंडल को बचाना है. पिछले संसदीय चुनाव के दौरान उनकी राजनीति धरी की धरी रह गई और मंडलवादी राजनीति के विभिन्न सामाजिक समूह भाजपा की ओर पलायन कर गए. कई दबंग पिछड़ी जातियां उधर चली गईं और अब भी वहीं हैं.

अति पिछड़ी जातियों (जिनकी बिहार की आबादी में क़रीब 33 प्रतिशत की हिस्सेदारी है) का भी महत्वपूर्ण हिस्सा भाजपा के साथ चला गया था. लेकिन, इस विधानसभा चुनाव में यह तबका भाजपा के साथ है, ऐसा निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता. महा-गठबंधन नेतृत्व की चुनावी रणनीति मंडल के सामाजिक समूहों को अपने साथ बांधकर रखने और भाजपा की ओर गए समूहों को वापस लाने की होनी चाहिए.