बाबा ने शिरडी क्यों छोड़ा

sai-babaबाबा बार-बार कहते थे कि तेली की दीवार तोड़ दो, इसका अर्थ क्या है?

जैसे कि श्री साई सच्चरित्र में लिखा गया है कि शिरडी में तेली रहते थे, जो मस्जिद में दीप जलाने के लिए बाबा को भिक्षा में तेल देते थे. एक बार उन्होंने अपने पास तेल होते हुए भी बाबा को तेल देने से मना कर दिया. बाबा उन तेलियों के व्यवहार से तनिक भी खिन्न हुए बिना निर्विकार भाव से मस्जिद आए और जल को तेल में परिवर्तित कर उससे उन्होंने मस्जिद में दीप जलाए. तेलियों ने छिपकर यह सब देखा और बाबा के इस चमत्कार को देखकर उन्हें अपने किए पर बहुत पश्चाताप हुआ. जब वह अपने इस बुरे कृत्य से दुखी होकर भविष्य में उसे न दोहराने का संकल्प लेकर क्षमा मांगने बाबा के पास आए, तो बाबा ने उनको क्षमा करते हुए सत्य बोलने और पारस्परिक विभेद मिटा कर एक-दूसरे की सहायता करने के लिए कहा. इसके बाद वे तेली मस्जिद में नियमित रूप से तेल देते रहे और अपनी संकीर्णता से बाहर निकल आए.

मूलत: तेली की दीवार शब्दों का बाबा ने एक प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है. जो एक धार को दो बनाती है, वह है दीवार. जो दीवार लोगों को अलग कर देती है, वह लोभ, हिंसा और अहंकार से बनी हुई है. बाबा ने उन सबका संवरण करके उन्हें हटाने के लिए कहा ताकि लोगों की आत्मा पर पड़े हुए उनके कई जन्मों के संस्कारों की मैली दीवार हट सके और इस प्रकार चलते-चलते जब उनके सारे परदे हट जाएंगे और कोई परदा नहीं रहेगा तो व्यक्ति अपने में सबको और सबको अपने में देखेगा. कोई भी दीवार जो कि बाधक बनती है, नहीं रहेगी और वह अखंड सत्ता का अनुभव करेगा, जिसको हम ब्रह्म कहते हैं.

स्वार्थी लोगों के कारण बाबा का मन उखड़ना

श्री साई सच्चरित्र कहता है कि बाबा ने शिरडी छोड़कर अन्यत्र चले जाने के लिए कहा था पर तात्या आदि उन्हें वापस ले आए थे. बाबा का ऐसा करने के पीछे कारण क्या था.श्री साई सच्चरित्र में बाबा के शिरडी छोड़कर अन्यत्र जाने के बारे में जिक्र आया है. तत्कालीन कुछ भक्तों के अनुभवों में भी इसका उल्लेख हुआ है. शिरडी में रहते हुए जब बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैली, तो उनके पास आने वाले भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगी. उनमें आध्यात्मिक लाभ की कामना से आने वाले भक्तों की तुलना में ऐसे भक्तों की संख्या अधिक थी, जो सदैव केवल व्यक्तिगत समस्याओं एवं स्वार्थों की पूर्ति के लिए बाबा से फायदा उठाना चाहते थे.

वे चाहते थे कि अपनी चमत्कारिक शक्तियों से बाबा उन्हें उनके रोगों एवं समस्याओं से मुक्त कर दें. उन्हें यह परवाह नहीं थी कि उनके वह मांग उचित है या अनुचित? वह चाहते थे कि बुरा कार्य करने पर भी बाबा से उन्हें संरक्षण मिलता रहे.बहुत से भक्त केवल भौैतिक कामनाओं की पूर्ति के लिए बाबा को निरंतर घेरे रहते थे. बाबा अपनी दयालुता के कारण जो कुछ भी उनके पास होता था, सब कुछ लोगों में बांट दिया करते थे, रुपया, पैसा, खाना आदि. धीरे-धीरे ऐसे लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई, जो कि बाबा की दयालुता का लाभ उठाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार थे.

बहुतों की दृष्टि कि बाबा को प्राप्त होने वाली दक्षिणा एवं खाद्य पदार्थों पर होती थी. यहां तक कि बाबा के खाने के लिए जो भोजन आता था, वह भी लोग चाहते थे कि उनमें प्रसाद के रूप में बंट जाए. बहुत से लोग तो अपने तो अपने बच्चों को ही द्वारकामाई भेज देते थे और बाबा अपनी अतिशय दयालुता के कारण अपना पूरा भोजन बांट देते थे और खुद भूखे रह जाते थे.

दिनों-दिन बाबा की ख्याति फैलने के कारण बाहर से आने वाले भक्तों की संख्या भी बढ़ती गई और उसके साथ बाबा को प्राप्त होने वाली दक्षिणा की राशि भी बढ़ती गई. चूंकि बाबा सब कुछ बांट देते थे, यह जानकर कुछ धूर्त लोग भी स्वार्थ-साधन के लिए वहां जमा होने लगे और इसके लिए लोग अनुचित तरीके भी अपनाने लगे.लेकिन बाबा जिस महत्‌ उद्देश्य को लेकर आए थे, उस पर अपवाद-स्वरूप  (म्हालसापति एवं श्री काका साहेब दीक्षित आदि जैसे)कुछ भक्तों को छोड़कर अन्य का इस पर ध्यान नहीं था कि बाबा अपना (सरकार) का जो खजाना लोगों में बांटना चाहते थे, लोग उसे छोड़कर दूसरी चीजों की मांग कर रहे थे.

लोगों की तुच्छ भौतिक मांगो के सदर्ंभ में बाबा ने कहा भी था. भाउ ये हमारा काम ना. जैसा कि श्री साई सच्चरित्र में भी है कि लोग अपनी इच्छित वस्तुएं ही मांगते हैं. वह चाहते हैं कि उन्हें वह सब कुछ मिले जो वह चाहते हैं और वह नहीं, जो कि आध्यात्मिक निधि के रूप में बाबा उन्हें देना चाहते हैं.( साई सच्चरित्र, मराठी, अध्याय-32 ओवी 161-62) सांकेतिक रूप से बाबा ने लोगों से अपने भीतर की तेली की दीवार गिरा देने की जो बात कही थी उसका अर्थ था कि लोग अपने आपसी भेदभाव और मनमुटाव समाप्त करें, ताकि उनमें परस्पर प्रेम एवं सद्भावना की स्थापना हो सके, लेकिन लोग उनके शब्दों के मर्म को समझ न सके.

इन सब बातों के कारण बाबा अन्यत्र जाने के लिए कहते थे. फिर भी उन्हें भक्तों में असंख्य अवगुणों के होते हुए भी सदैव उनके कल्याण की चिंता थी, इसलिए वे तात्या आदि के कहने पर लौट आते थे-इस आशा के साथ कि एक दिन अवश्य लोगों उत्तम गुणों का विकास हो जाएगा और लोग उनके पास वह लेने आएंगे जो कि वे लोगों को देना चाहते हैं.

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