सच्चाई पर पर्दा डालने की नाकाम कोशिश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने छह दिवसीय अमेरिका एवं आयरलैंड के दौरे से वापस देश लौट आए हैं. कहा जा रहा है कि पिछले 60 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला आयरलैंड दौरा था. लेकिन, ऐसा कहने वाले यह बताना भूल गए कि जवाहर लाल नेहरू के बाद नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने आयरलैंड का दौरा किया. सा़फ है कि वे जवाहर लाल नेहरू का नाम नहीं लेना चाहते, लेकिन फिर भी हकीक़त यह है कि भारत के आ़िखरी प्रधानमंत्री, जो आयरलैंड के दौरे पर गए थे, वह जवाहर लाल नेहरू थे. नेहरू को साहित्य से रुचि थी और आयरलैंड का एक समृद्ध इतिहास रहा है. यह वही ज़मीन है, जिस पर डब्ल्यू. बी. येट्स जैसे सुप्रसिद्ध कवियों ने जन्म लिया. ग़ौरतलब है कि हरिवंश राय बच्चन ने भी येट्स से प्रेरणा ली थी. लेकिन, ये सारी बातें मौजूदा सरकार के लिए बेमानी हैं.

दरअसल, अमेरिका का दौरा प्रधानमंत्री का असली दौरा था. सरकार इसे एक कामयाब दौरा करार दे रही है. मेरी समझ में नहीं आता कि कामयाब दौरा क्या होता है. बेशक यह एक बहुत ही कामयाब जनसंपर्क की कवायद थी. जहां कहीं भी प्रधानमंत्री जाते हैं, वहां के अप्रवासी भारतीयों को एकत्र करना उन्हें बहुत अच्छा लगता है. पहले उन्होंने न्यूयॉर्क के मैडीशन स्न्वायर में ऐसा किया, फिलहाल कैलिफोर्निया में किया और अपने हालिया दुबई दौरे पर भी ऐसा कर चुके हैं. भावनात्मक तौर पर विदेशों में बसे भारतीयों से जुड़ना जनसंपर्क की अच्छी मिसाल तो हो सकती है, लेकिन आर्थिक तौर पर इसका कोई खास मतलब नहीं है. लोग इन दौरों से आने वाले निवेश के बारे में पूछेंगे. अर्थशास्त्र का एक कमज़ोर छात्र भी यह समझता है कि मुद्रा का प्रवाह उसी ओर होता है, जिधर मुना़फा अधिक होता है. इसलिए सवाल यह नहीं है कि कौन प्रधानमंत्री है और वह किस तरह का भाषण देता है, बल्कि सवाल यह है कि ज़मीनी सतह पर कौन-सी नीति अपनाई जा रही है. 1991 में जब मनमोहन सिंह नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री थे, तो उन्होंने इंटरनेशनल मोनेटरी फंड और विश्व बैंक के दिशा निर्देशों के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था खोल दी थी. नतीजतन यहां पैसे आने लगे. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने नियंत्रण का बुनियादी मॉडल बदल दिया था.

मैं न तो पहले वाले सुधार की वकालत करता हूं और न इस बात की कि अभी और अधिक सुधार की ज़रूरत है. रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन बिल्कुल सही कहते हैं कि भारत को फिलहाल किसी बड़े सुधार की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यहां किसी तरह का आर्थिक संकट नहीं है. लेकिन, मौजूदा सरकार कहती है कि वह इज ऑ़फ बिजनेस (व्यापार में आसानी) के उपाय करेगी. यह बहुत अच्छा मुहावरा है, लेकिन यदि आप वाकई बिजनेस में आसानी पैदा करना चाहते हैं, तो आपको सबसे पहले व्यापारियों के रास्ते में खड़ी रुकावटों की पहचान करके उन्हें हटाने के उपाय भी करने होंगे. विदेशी निवेश को ़िफलहाल अलग रखते हैं. भारतीय व्यापारियों को अपनी परेशानियों की एक सूची तैयार करनी चाहिए. मुझे यह कहने में बड़ा अ़फसोस हो रहा है कि फिक्की, एसोचैम आदि संस्थाएं अपना काम बिल्कुल नहीं कर रही हैं. इनसे जुड़े लोग केवल सरकार को खुश करने में लगे हुए हैं. दरअसल, उनका काम है कि वे सरकार को बताएं कि व्यापार को आसान बनाने के लिए क़ानून में कौन-से बदलाव होने चाहिए और उनके बदलने का तरीका क्या होगा. अगर व्यापार में आसानी होगी, तो विदेशी बिजनेसमैन खुद इसकी पड़ताल कर लेंगे कि वे भारत से मुना़फा हासिल कर सकते हैं या नहीं.

एक विदेशी कंपनी फोक्सकम मुंबई आई. यह एक ताईवानी कंपनी है, जिसकी चीन में एक बड़ी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है. कंपनी भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट खोलना चाहती है. फोक्सकम के प्रमुख ने मुंबई में घोषणा की कि उन्होंने गुजरात, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक का भ्रमण किया और सभी बिंदुओं पर ग़ौर करने के बाद महाराष्ट्र में अपनी यूनिट लगाने का ़फैसला लिया. विदेशी भावनाओं में बहकर इधर या उधर नहीं जाते, वे केवल यह देखना चाहते हैं कि किस जगह सबसे बेहतर सुविधाएं मौजूद हैं. उन्हें एक बेहतर एअरपोर्ट चाहिए, अच्छी सड़कें चाहिए, योजनाओं की जल्द से जल्द स्वीकृति चाहिए. पिछले 18 महीने में इस दिशा में मैंने कोई ठोस काम होते नहीं देखा है. काम हो रहा है, लेकिन अत्यंत सुस्त रफ्तार के साथ. मैं किसी के ऊपर आरोप नहीं लगाना चाहता, हर कोई अपना बेहतर देने की कोशिश कर रहा है. लेकिन, यदि आप वाकई गंभीर हैं, तो उन मौजूदा एवं पूर्व नौकरशाहों का एक छोटा सेल बनाइए, जो व्यापार नियंत्रण को समझते हों और राजस्व के ऩुकसान के बिना नियंत्रण में कमी लाने के सुझाव दे सकते हों. मैं राजस्व की चिंता को समझ सकता हूं, लेकिन कई ऐसे बिंदु हैं, जहां राजस्व का कोई लेना-देना नहीं, पर उनसे भारत में व्यापार के तरीके में आसानी पैदा हो सकती है.

प्रधानमंत्री के अत्यधिक विदेश दौरों की बहुत आलोचना हो रही है. मैं इस नज़रिये से इत्तेफाक नहीं रखता. प्रधानमंत्री को अवश्य ही विदेशी दौरों पर जाना चाहिए, दुनिया के दूसरे नेताओं से परस्पर संबंध रखने चाहिए. लेकिन, आप यह नहीं कह सकते कि उन्होंने बराक ओबामा से कई मुलाकातें कर ली हैं, इसलिए भारत की सभी समस्याएं हल हो जाएंगी. अमेरिकी निवेश उसी सूरत में आएगा, जब आप भारतीय बाज़ार को उनके लिए आकर्षक बनाएंगे. बाज़ार को कितना आकर्षक आपको बनाना चाहिए या नहीं बनाना चाहिए, यह एक गंभीर विषय है. इस पर विचार करने के लिए वित्त मंत्री, वित्त सचिव, मुख्य आर्थिक सलाहकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर यानी सबको शामिल होना चाहिए. मैं केवल यह आशा कर सकता हूं कि पर्दे के पीछे इस विषय पर कुछ काम हो रहा होगा और उसकी घोषणा तक हमें इंतज़ार करना होगा.

दूसरा मुद्दा है बिहार चुनाव का. यह चुनाव दरअसल पैसे और पिछड़े वर्ग के बीच लड़ा जा रहा है. भाजपा के पास बहुत पैसा है, ऊंची जाति के लोग स्वाभाविक रूप से उसके साथ हैं. वह मुलायम सिंह और अन्य को अलग करके लालू के वोट बैंक में सेंध मारने की कोशिश कर रही है. भाजपा ओवैसी को भी प्रोत्साहित कर रही है, ताकि वह मुसलमानों का वोट काट लें. लेकिन, जहां तक मैं समझता हूं कि भारतीय मतदाता अब उस सीमा को लांघ चुके हैं, अब वे परिपक्व हो गए हैं. आप चाहे जितना पैसा बहा लें, वोट काटना अब आसान नहीं है. भाजपा की केंद्र में सरकार है, उसके साथ उपेंद्र कुशवाहा, राम विलास पासवान एवं जीतन राम मांझी जैसे सहयोगी हैं, जिनके अपने प्रभाव वाले पॉकेट्स हैं और जो वास्तव में भाजपा के लिए मददगार साबित होंगे.

दूसरी तऱफ नीतीश बिहार के अकेले राजनेता हैं, जिनके ़िखला़फ किसी तरह का आरोप नहीं है. यहां तक कि भाजपा और उसके सहयोगी भी कह रहे हैं कि जबसे नीतीश ने उनसे नाता तोड़ा है, बिहार का विकास नहीं हुआ है (हालांकि यह ग़लत है). इसके आगे वे नीतीश कुमार के ़िखला़फ कुछ भी नहीं कह सकते. न तो कोई उन पर किसी घोटाले का आरोप लगा सकता है और न उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े कर सकता है. लालू के साथ गठबंधन की वजह से उनके विरोधी जंगलराज की रट लगा रहे हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मतदाताओं पर इसका कोई प्रभाव पड़ेगा. आने वाले कुछ दिनों में यह सा़फ हो जाएगा कि हवा का रुख किधर है. इतना तो तय है कि भाजपा के लिए लड़ाई आसान नहीं है, जैसा कि वह पहले सोच रही थी.

बिगड़ती हुई चीज़ें ठीक करने के लिए अमित शाह को भागकर पटना जाना पड़ा. पार्टी के सांसद एवं पूर्व गृह सचिव आरके सिंह ने खुलेआम आरोप लगाया कि पैसे लेकर पार्टी के टिकट बांटे गए हैं. जदयू-राजद, जिनकी भाजपा आलोचना कर रही है, उन पर भी ऐसे आरोप नहीं हैं. भाजपा, जिसकी केंद्र में सरकार है और जिसके पास बहुत पैसा है, पर टिकट बेचने के आरोप लग रहे हैं, तो यह बहुत अ़फसोसजनक बात है. जहां तक मुझे याद है, कांग्रेस अपने अच्छे दिनों में जीतने वाले उम्मीदवार चुनती थी और चुनाव अभियान के लिए पैसा भी देती थी. अगर आप मज़बूत दल हैं, तो आप योग्य उम्मीदवारों को टिकट दीजिए और उन्हें इतना फंड दीजिए कि वे चुनाव लड़ सकें. पैसा कमज़ोर दल लेते हैं. पहला आरोप मायावती के ऊपर लगा था, क्योंकि उनके पास दलितों का वोट बैंक था. राजनीति के लिए यह अच्छा रुझान नहीं है, चाहे जो भी पार्टी ऐसा करे. असली पार्टी वह है, जो योग्य उम्मीदवारों को टिकट दे और उन्हें चुनाव लड़ने के लिए पैसा भी दे, चाहे वे जीतें या हारें. आशा करते हैं कि बिहार चुनाव के बाद एक स्थायी सरकार बनेगी.

बीसीसीआई ने अभी हाल में अपना अध्यक्ष खोया है. जगमोहन डालमिया ने भारतीय क्रिकेट को मजबूती प्रदान की थी. उनका स्थान लेने के लिए वही पुराने चेहरे मैदान में थे, लेकिन मुझे खुशी है कि शशांक मनोहर जैसे शख्स के नाम पर सहमति बन गई है, जिनका पिछला कार्यकाल (2008-11) ज़ाहिर करता है कि वह बहुत व्यवहारिक व्यक्ति हैं. हालांकि, वह महाराष्ट्र से संबंध रखते हैं और ऐसा सोचा जा सकता है कि शरद पवार के नज़दीक हैं. लेकिन, उनकी कार्यशैली अलग है. वह ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो बेहूदगी बर्दाश्त करे. वह बहुत अच्छे वकील हैं, वह ग़ैर-क़ानूनी काम कभी नहीं करेंगे और न होने देंगे. दो साल के कार्यकाल के लिए हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं. हम आशा करते हैं कि वह क्रिकेट को स्वच्छ बनाने में सफल होंगे.

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