सेना में एसी निकलवा कर खरीदे जा रहे टैंक भीषण गर्मी में काम करने से फौजियों का इंकार

army-tankभारतीय सेना एक बड़े अंदरूनी विरोध का सामना कर रही है. थलसेना की आर्मर्ड कोर में तैनात सैनिक भीषण गर्मी में भट्ठी की तरह दहकते टैंकों के अंदर काम करने से इंकार कर रहे हैं. भारतीय सेना को बिना एसी वाले टैंक दिए जाने का जबरदस्त विरोध हो रहा है. गर्मी के कारण टैंकों के नाजुक पुर्जे नष्ट हो रहे हैं. भीषण गर्मी से सैनिकों का मानसिक संतुलन ठीक न रहने से हादसे हो रहे हैं. एसी निकलवा कर टैंक खरीदे जाने की प्रक्रिया बंद किए जाने की सिफारिशों को पिछले एक दशक से ताक पर क्यों रख दिया गया है, इस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.

दोयम दर्जे के व्यवहार से सेना युद्ध के लिए तकनीकी तौर पर और मनोबल के साथ खुद को तैयार कैसे कर सकेगी, यह सवाल दिनोंदिन गहराता जा रहा है. पाकिस्तान की तऱफ से सीमा पर उकसावे की लगातार कार्रवाई हो रही हो और भारत के सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग तक सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का संदेश दे चुके हों, ऐसे संवेदनशील समय में भी भारतीय थलसेना के टैंकों में वातानुकूलन मशीनें (एसी) लगाने में सरकार कोताही कर रही है, यह हैरत करने और देश के लोगों को तकलीफ पहुंचाने वाली ़खबर है.

भारतीय सेना के टैंक युद्धाभ्यास के दौरान आग का गोला बन जाते हैं. उनके अंदर बैठे सैनिक भयानक गर्मी के कारण अपना दिमागी संतुलन ठीक नहीं रख पाते, फिर वे युद्ध कैसे लड़ेंगे! मानसिक असंतुलन के कारण होने वाली मानवीय चूकों से युद्धाभ्यास के दरम्यान ही मेजर ध्रुव यादव जैसे कई अफसर एवं सैनिक शहीद होते रहते हैं, लेकिन नौकरशाही के चंगुल में फंसा रक्षा मंत्रालय इस तऱफ ध्यान नहीं दे रहा है.

भारतीय थलसेना की आर्मर्ड कोर (टैंक दस्ता) के आला अफसर बताते हैं कि आर्मर्ड कोर के अफसर एवं सैनिक भीषण गर्मी में टैंक के भीतर काम करने से मना कर रहे हैं. कभी सख्त फौजी अनुशासन का हवाला देकर, तो कभी समझा-बुझाकर उनसे काम तो लिया जा रहा है, लेकिन स्थिति अत्यंत भयावह और अमानवीय है. उसका नकारात्मक असर प्रशिक्षण और युद्धाभ्यास पर पड़ रहा है. टैंकों के संवेदनशील उपकरण खराब हो रहे हैं, वह अलग. सेना के अफसर सैन्य क़ानून के तहत खुला बयान नहीं दे सकते, लेकिन उनकी पीड़ा चीख की तरह महसूस की जा सकती है. भारतीय सेना के मध्य कमान का मुख्यालय लखनऊ में ही है. यहां उन चीखों की अनुगूंज सुनी जा सकती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अराजक स्वरूप में सड़कों पर दिखती है, लेकिन सेना अपनी ईमानदार अभिव्यक्ति भी नहीं दे सकती.

सेना की उसी पीड़ा को अभिव्यक्ति देते हुए हम आपको इस बारे में खबरदार कर दें कि टैंकों के प्रशिक्षण या टैंकों के युद्धाभ्यास वाले क्षेत्र में आप रहते हों, तो सतर्क रहें और सैनिकों को अपनी तऱफ से जितनी शीतलता प्रदान कर सकें, उतना अच्छा होगा. यह राष्ट्र-धर्म है. इसका पालन यदि सरकार नहीं कर रही है, तो आम नागरिक अपने धर्म से क्यों वंचित हों! यह ़खबर महज अ़खबार की औपचारिकता निभाने के लिए नहीं लिखी जा रही, बल्कि चौथी दुनिया के ज़रिये आप नागरिकों तक एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना पहुंचाने की कोशिश की जा रही है. भारतीय सेना के मध्य कमान के तहत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, ओडीशा, छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश जैसे सात राज्य आते हैं.

मध्य कमान प्रशिक्षण और अभ्यास के लिए मुफीद क्षेत्रों में शुमार है, लेकिन यह मसला केवल मध्य कमान तक सीमित नहीं है. देश भर में जहां भी आर्मर्ड कोर (टैंकों) के रेजिमेंट, डिवीजन, कैविलरी या फॉर्मेशंस हैं, उन सब जगहों से एक ही आवाज़ आ रही है. खास तौर पर देश के विशाल एवं संवेदनशील दक्षिणी-पश्चिमी सेक्टर (राजस्थान-गुजरात सीमा क्षेत्र) में पड़ने वाली असहनीय गर्मी में टैंकों का युद्धाभ्यास फौजियों के लिए अत्यंत तकलीफदेह साबित हो रहा है.

संबद्ध सैन्य कमानों के सेना कमांडर इसे लेकर अत्यंत चिंतित हैं और इस बारे में सेनाध्यक्ष को भी अवगत कराया जा रहा है, लेकिन इस आपातकालीन-महत्व के मसले को रक्षा मंत्रालय पर काबिज नौकरशाह (आईएएस अफसर) दबाए बैठे हैं. मध्य कमान में टैंकों के बेड़े प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश में बबीना (झांसी), कानपुर, मेरठ, रुड़की और झारखंड में नामकूम में हैं. झांसी के बबीना में भारी-भरकम 31 आर्मर्ड डिवीजन है.

आप यह जानते-समझते चलें कि टैंकों के निर्माण के समय ही अन्य उपकरणों की तरह उनमें एसी मशीनें भी फिट की जाती हैं, लेकिन निर्माता देशों से टैंकों की खरीद करने वाले भारतीय प्रतिनिधि-अधिकारी उनमें से एसी मशीनें निकलवा देते हैं. उनका तर्क होता है कि ऐसा करने से टैंक की क़ीमत थोड़ी कम हो जाती है. ऐसे भौंड़े तर्कों पर भारतीय सेना के लिए टैंक खरीदे जाते हैं और भारतीय फौजियों के लिए असहनीय यातना का सामान खरीदा जाता है. रक्षा उपकरणों की खरीदारी में मोटा कमीशन खाने वाले नेताओं, नौकरशाहों और दलालों को भारतीय सैनिकों की अनिवार्य-सुविधा देखी नहीं जाती और कुछ हज़ार रुपये की एसी मशीनें टैंकों से निकलवा दी जाती हैं.

हज़ारों करोड़ रुपये के टैंकों की खरीद में कुछ हज़ार की एसी मशीनें निकलवा कर सरकारी कोष को बचत कराई जा रही है या यह भारतीय सैनिकों का मनोबल तोड़ डालने का क्रमश: प्रयास है, इसे आसानी से समझा जा सकता है. अगर यह भारतीय सैनिकों की पीड़ा से जुड़ा मसला न होता, तो एसी निकलवा कर टैंक खरीदने के तर्क को लोग किसी फूहड़ चुटकुले की तरह लेते. यह अत्यंत गंभीर मसला है कि भारतीय रक्षा प्रणाली ऐसे ही फूहड़ चुटकुलेबाजों के बूते चल रही है. पाकिस्तानी सैनिक वातानुकूलित टैंकों में युद्धाभ्यास करते हैं और महान भारतवर्ष के सैनिक टैंकों के अग्नि-कक्ष में बैठकर अपने शौर्य का नहीं, बल्कि अपने धैर्य का इम्तिहान देते हैं.

रक्षा मंत्रालय के विशेषज्ञ अधिकारियों की टीम ने वर्ष 1999 में ही टैंकों में एसी होने की अनिवार्यता रेखांकित कर दी थी. यह तय हो गया था कि एसी निकलवा कर टैंक खरीदे जाने की प्रक्रिया फौरन बंद हो और सभी सक्रिय टैंकों में तत्काल एसी फिट कराए जाएं. लेकिन अ़फसोस यह है कि इस सिफारिश की फाइल नौकरशाहों ने दबा दी और भारतीय सैनिकों की त्रासदी का दौर अब भी जारी है. यह नौकरशाही और लालफीताशाही के गंदे मनोभाव उजागर करने वाला पहलू है.

दु:खद यह है कि भारतीय सेना के लिए जो टैंक या अन्य उपकरण खरीदे जाते हैं, उनका ज़मीनी स्तर पर इस्तेमाल करने वाले अफसरों और सैनिकों से उनकी अनुभवजनित राय नहीं ली जाती. तकनीकी विशेषज्ञों के परीक्षण दल ने यह भी पाया था कि बिना एसी के लंबे समय तक गर्मी सहने और धूल की वजह से टैंकों के प्रदर्शन स्तर में काफी कमी आ गई है. इसके बावजूद एसी निकलवा कर टैंक खरीदे जाते रहे. इनमें टी-90 जैसे टैंक भी शामिल हैं.

सेना के एक आला अधिकारी इसे नौकरशाहों का घटियापन बताते हुए कहते हैं कि खुद अपने बाथरूम में भी एसी रखने वाले आईएएस अफसर दूसरे को ज़रूरत के समय भी एसी का इस्तेमाल नहीं करने देना चाहते. यह आधिकारिक तथ्य है कि तमाम तकनीकी आपत्तियों को ताक पर रखते हुए रक्षा मंत्रालय ने एसी मशीनें निकलवा कर टैंक खरीदने का करार किया. इस वजह से आर्मर्ड कोर के टैंकों के संवेदनशील पुर्जे बेकार होने की स्थिति में आ गए हैं. कई टैंकों के उपकरण तो बदले भी जा रहे हैं. रक्षा मंत्रालय के ही आधिकारिक दस्ताव़ेज बताते हैं कि युद्ध में कारगर भूमिका अदा करने वाले टैंकों के गर्मी एवं धूल में काम करने की वजह से उनके मिसाइल दागने के उपकरणों और प्रत्येक क्षण तापक्रम बताने वाले यंत्र की परफॉर्मेंस में गिरावट आई है.

मिसाइल फायर करने की क्षमता के साथ-साथ टैंकों के एक्टिव डिफेंस सिस्टम, थर्मल इमेजिंग प्रणाली, नाइट विज़न और फायर कंट्रोल सिस्टम में काफी खराबी आ रही है. तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ने गर्मी वाले सेक्टरों में ये खामियां अधिक पाई हैं. राजस्थान के बाड़मेर-जैसलमेर सेक्टर के लंबे रेगिस्तानी सीमा क्षेत्र में तैनात टी-90 टैंक अत्यंत खराब हालत में पाए गए हैं. झांसी के बबीना और रांची के नामकूम जैसे क्षेत्रों में भी खामियां पकड़ी गईं.

शर्मनाक बात यह है कि रक्षा मंत्रालय ने हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करके टैंकों का बेड़ा बनाया, लेकिन उसके रखरखाव की कोई फिक्र नहीं की. टैंक खरीदने के पहले भी विशेषज्ञों के दल ने परीक्षण के दौरान टैंकों के भीतरी हिस्सों के बहुत अधिक गर्म होने का उल्लेख करते हुए उनमें एसी लगाने की सिफारिश की थी. रक्षा मंत्रालय ने वर्ष 1999 में ही टैंकों में एसी लगाने की ज़रूरत स्वीकार कर ली थी, लेकिन उसके बाद भी एसी मशीनें निकलवा कर टैंक खरीदे जाते रहे. पहले खरीदे जा चुके टैंकों में एसी लगाने की तो बात ही दूर रही.

सैन्य ज़रूरतों की आपराधिक उपेक्षा
वर्ष 1999 में विशेषज्ञ टीम द्वारा की गई एसी युक्त टैंक खरीदने की सिफारिश बार-बार आगे बढ़ाई जाती रही, लेकिन उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई. यह सैन्य ज़रूरतों की आपराधिक उपेक्षा का मामला है. सेना मुख्यालय के एसी कक्षों में बैठे रहने वाले अफसरों ने ही कहा कि टैंकों के कपोले (ढक्कन) खोलकर रखने से अंदर गर्मी नहीं लगती. ऐसे नाबालिग-वक्तव्य देने वाले अफसरों को यह नहीं समझ में आता कि युद्ध में टैंकों के कपोले खोलकर नहीं रखे जा सकते. दूसरा यह कि कपोले खोलकर रखने से धूल का गुबार टैंकों के अंदर भरता है, जिससे उपकरण खराब होते हैं और अंदर बैठे सैनिकों को सांस लेने में दिक्कत होती है.

सैनिकों के मानसिक संतुलन पर भी खराब असर पड़ता है. इसके बावजूद टैंकों से एसी निकलवा कर उसकी खरीद होती रही. कहा गया कि बाद में ज़रूरत पड़ेगी, तो लगवा लिया जाएगा. इस बेवकूफाना तर्क को आधार बनाकर रक्षा मंत्रालय ने 2001 में एसी हटवा कर 310 टैंकों की खरीद फाइनल की. उसी वर्ष एक हज़ार और टैंकों की खरीद के लिए ऑर्डर जारी हुआ, उनमें भी एसी नहीं था. जब नए टैंकों के संवेदनशील उपकरण अत्यधिक गर्मी के कारण खराब होने लगे, तब रक्षा मंत्रालय ने 2002 में फिर सैद्धांतिक तौर पर स्वीकार किया कि टैंकों में एसी लगना ज़रूरी है, लेकिन टैंकों में एसी लगाने का निर्णय लेने में ही चार साल लग गए. अवाडी स्थित हैवी व्हीकल फैक्ट्री में एसी बनने का काम 2006 में शुरू हुआ और ट्रायल में ही फेल हो गया.

2008 में इस मामले को बंद कर दिया गया और बिना एसी के टैंक खरीदे जाने की प्रक्रिया जारी रही. इस दौरान (वर्ष 2014 तक) बिना एसी लगे तक़रीबन दो हज़ार टैंक खरीदे गए. इनमें एक ही क्रम में पहले 310 टैंक, फिर 1,000 टैंक और फिर 347 टैंक खरीदे गए. जब रक्षा मंत्रालय से इस बारे में पूछा गया, तो उसने भी वही कहा कि टैंकों के कपोले खुले रखने से गर्मी नहीं लगती. रक्षा मंत्रालय ने गर्मी की वजह से संवेदनशील उपकरणों में आने वाली खराबी और सैनिकों के दिमागी असंतुलन के कारण होने वाले हादसों की बात दबा दी.

टेट्रा आर्मर्ड व्हीकल्स में भी एसी नहीं
थलसेना के बेतहाशा इस्तेमाल में आने वाली टेट्रा आर्मर्ड व्हीकल्स में भी एसी नहीं हैं. इसके बावजूद उन्हीं वाहनों में उबलते हुए फौजी अपना अभ्यास पूरा करते हैं. टेट्रा के घटिया आर्मर्ड व्हीकल्स के बारे में पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह (मौजूदा केंद्रीय मंत्री) ने भी गंभीर सवाल उठाए थे. तब उन्हें तक़रीबन सात सौ घटिया वाहन खरीदने के बदले 14 करोड़ रुपये रिश्वत देने की पेशकश की गई थी. जनरल सिंह ने आरोप लगाया था कि सेना के लिए 7,000 टैट्रा ट्रक महंगी क़ीमत पर खरीदे गए थे और किसी ने सवाल तक नहीं उठाया था. जनरल सिंह का कहना था कि उक्त ट्रक मानकों के अनुरूप नहीं हैं और ऐसे क़रीब सात सौ ट्रकों का सौदा मंजूर करने के लिए उन्हें 14 करोड़ रुपये की रिश्वत देने की कोशिश की गई थी.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...