कहती है एडीआर रिपोर्ट कोई दल पाक-सा़फ नहीं

adr-reportएसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) ने बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के उम्मीदवारों द्वारा दाखिल किए गए हलफनामों के आधार पर उनके वित्तीय, आपराधिक एवं अन्य विवरणों पर एक रिपोर्ट जारी की है. साथ में एडीआर ने अपना एक वीडियो भी जारी किया है, जिसमें मतदाताओं से अच्छी-सा़फ छवि वाले उम्मीदवारों को वोट देने और यदि सा़फ छवि का उम्मीदवार न हो, तो नोटा का इस्तेमाल करने की अपील की गई है.

यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनाव मैदान में मौजूद सभी राजनीतिक दल विकास की बात कर रहे हैं, सुशासन भी एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन सभी दलों के बीच आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार मैदान में उतारने के आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी जारी है. भाजपा नीतीश के नेतृत्व वाले महा-गठबंधन पर जंगलराज वापस लाने की कोशिश करने का आरोप लगा रही हैं, वहीं खुद भाजपा के नेता अपनी पार्टी पर पैसे लेकर टिकट बांटने का आरोप लगा रहे हैं. ऐसे में एडीआर द्वारा जारी यह रिपोर्ट क्या कहती है, उस पर एक नज़र डालना आवश्यक हो जाता है.

जैसा कि ऊपर ज़िक्र किया गया है कि चुनाव में उतरे सभी राजनीतिक दल विकास एवं सुशासन को अपना चुनावी मुद्दा बता रहे हैं, लेकिन एडीआर द्वारा जारी आंकड़े कुछ और कहानी बयां कर रहे हैं. दरअसल, दागी और आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट देने में कोई भी दल पीछे नहीं है यानी चुनाव जिताऊ उम्मीदवार उनके लिए नैतिकता से ऊपर हैं. एडीआर रिपोर्ट में पहले चरण में चुनाव मैदान में उतरे सभी उम्मीदवारों के हलफनामों का विश्लेषण किया गया है.

कुल 587 उम्मीदवारों में से 174 यानी 30 प्रतिशत उम्मीदवार आपराधिक छवि के हैं, जिनमें से 130 पर गंभीर मामले चल रहे हैं. पहले चरण के उम्मीदवारों की सूची देखकर बाकी के चरणों के उम्मीदवारों की छवि का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है.

बिहार में पिछले कई चुनावों से राजनीति का अपराधीकरण एक अहम मुद्दा रहा है. चुनाव के दौरान और बाद भी राज्य में सक्रिय तक़रीबन हर राजनीतिक दल ने इस मुद्दे को इतने ज़ोर-शोर से उठाया कि उसे देखते हुए कम से कम यह उम्मीद रखी जा सकती थी कि सभी नहीं, तो अधिकतर दल, खास तौर पर बड़े दल इसे नापसंद करते हुए आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को टिकट नहीं देंगे. लेकिन, सच्चाई इसके ठीक उलट है.

इस दलदल में सभी पार्टियां गर्दन तक डूबी हैं, चाहे वह सुशासन का दावा करने वाली हो, पार्टी विद डिफरेंस का दावा करने वाली हो या फिर दूसरी पार्टियों को जंगलराज का पर्याय बताने वाली. इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पहले चरण के उम्मीदवारों द्वारा स्वघोषित आपराधिक मामलों पर एक निगाह डालना ही काफी है.

जनता को अपना वोट देने का जितना अधिकार है, उतना ही अधिकार उसे अपने उम्मीदवार की पृष्ठभूमि जानने का भी है. मतदाता के लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि जो लोग चुनाव मैदान में अपनी उम्मीदवारी पेश कर रहे हैं, उनकी छवि कैसी है? बहरहाल, अगर मैदान में मौजूद उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि को दलवार देखा जाए, तो भाजपा के 27 में से 14 (52 प्रतिशत), सीपीआई के 25 में से 14 (56 प्रतिशत), बसपा के 41 में से आठ (20 प्रतिशत), जदयू के 20 में से 11 (46 प्रतिशत), सपा के 18 में से नौ (50 प्रतिशत), राजद के 17 में से आठ (47 प्रतिशत), कांग्रेस के आठ में से छह (75 प्रतिशत) और लोजपा के 13 में से आठ (62 प्रतिशत) उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं.

जहां तक गंभीर मामलों का सवाल है, तो भाजपा के 27 में से 10 (37 प्रतिशत), सीपीआई के 25 में से सात (28 प्रतिशत), बसपा के 41 में से छह (15 प्रतिशत), जदयू के 20 में से नौ (38 प्रतिशत), सपा के 18 में से सात (39 प्रतिशत), राजद के 17 में से छह (35 प्रतिशत), कांग्रेस के आठ में से चार (50 प्रतिशत) और लोजपा के 13 में से छह (46 प्रतिशत) उम्मीदवारों पर गंभीर अपराध के मामले दर्ज हैं.

16 उम्मीदवारों ने अपने ऊपर हत्या के आरोप की घोषणा की है, जिनमें वारसलीगंज के जदयू उम्मीदवार एवं वर्तमान विधायक प्रदीप कुमार भी शामिल हैं, जिन पर हत्या के चार मामले दर्ज हैं. बाकी उम्मीदवारों ने अपने ऊपर हत्या के एक-एक मामले की घोषणा की है. हत्या का प्रयास करने के मामले घोषित करने वाले उम्मीदवारों की संख्या 37 है. हिसवा विधानसभा क्षेत्र के निर्दलीय उम्मीदवार राम स्वरूप यादव पर सबसे अधिक पांच मामले दर्ज हैं.

बाकी उम्मीदवारों में जदयू के तीन, भाजपा, बसपा एवं जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के एक-एक और एक निर्दलीय शामिल हैं. ग़ौरतलब है कि पिछली विधानसभा (2010) में एडीआर ने 243 विधायकों में से 242 के हलफनामों का अध्ययन किया था. इनमें से 141 (58 प्रतिशत) विधायक ऐसे थे, जिनके ़िखला़फ आपराधिक मामले लंबित थे. 2005 की विधानसभा में यह संख्या 117 (50 प्रतिशत) थी. 2010 की विधानसभा में गंभीर आपराधिक मामले वाले विधायकों की संख्या 85 थी.

अगर पहले चरण के उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि और उनकी दलगत स्थिति का जायजा लिया जाए, तो यह सा़फ हो जाता है कि पिछली विधानसभा की तरह आने वाली विधानसभा भी अपराधियों से मुक्त नहीं होगी. विधानसभा में आपराधिक छवि वाले विधायकों की संख्या में बढ़ोत्तरी का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा. पिछले चुनाव की भांति इस बार भी आपराधिक छवि वाले बहुत सारे उम्मीदवार सा़फ छवि के उम्मीदवारों को हराने में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन उनकी जीत वास्तव में जनता की पराजय होगी.

चुनाव में पार्टियों को कामयाबी तक पहुंचाने में ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ताओं का बहुत बड़ा रोल होता है. चूंकि आम कार्यकर्ता ग़रीब होता है और चुनाव में खर्च करने के लिए उसके पास पैसे नहीं होते, इसलिए वह ज़मीन से जुड़ा होने के बावजूद चुनाव नहीं लड़ पाता. राजनीतिक दलों पर करोड़पतियों से पैसे लेकर टिकट देने के आरोप अक्सर लगते रहे हैं. यह चुनाव भी ऐसे आरोपों से मुक्त नहीं है. इसमें बड़ी-छोटी सभी पार्टियां शामिल हैं. हाल में भाजपा सांसद आरके सिंह ने पार्टी पर पैसे लेकर टिकट बेचने का आरोप लगाया है.

बहरहाल, चुनाव आम आदमी की पहुंच से कितनी दूर चला गया है, इसका अंदाज़ा बिहार जैसे ग़रीब राज्य के उम्मीदवारों की घोषित संपत्तियों से ही लगाया जा सकता है. एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले चरण के उम्मीदवारों में 146 (25 प्रतिशत) करोड़पति हैं. अगर कुल उम्मीदवारों की घोषित आय का औसत निकाला जाए, तो यह 1.44 करोड़ रुपये प्रति उम्मीदवार होगी. अगर दलगत स्थिति देखी जाए, तो भाजपा के 27 में से 18 (67 प्रतिशत), जदयू के 24 में से 19 (71 प्रतिशत), राजद के 17 में से 11 (65 प्रतिशत), सपा के 18 में से छह (33 प्रतिशत), कांग्रेस के आठ में से छह (75 प्रतिशत) और लोजपा के 13 में से आठ (32 प्रतिशत) उम्मीदवार करोड़पति हैं. यही नहीं, 23 उम्मीदवारों ने अपनी आय एक करोड़ रुपये से अधिक घोषित की, लेकिन उन्होंने अपना आयकर रिटर्न पेश नहीं किया.

वारिस नगर विधानसभा क्षेत्र से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे बिनोद कुमार सिंह 74 करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ सबसे अमीर उम्मीदवार हैं, जबकि दूसरे नंबर पर खगड़िया विधानसभा क्षेत्र से जदयू प्रत्याशी पूनम देवी यादव हैं, जिनके पास 42 करोड़ रुपये की संपत्ति है. बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनहित दल के उम्मीदवार सुरेश सदा और हिसुआ से मूल निवासी समाज पार्टी के उम्मीदवार प्रदीप राजबंशी ने अपनी संपत्ति शून्य बताई है.

जहां तक उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता का सवाल है, तो तीन उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन्होंने खुद को निरक्षर घोषित किया है. जबकि 52 उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन्होंने खुद को साक्षर बताया है. 332 (57 प्रतिशत) उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन्होंने अपनी शैक्षणिक योग्यता 12वीं पास या उससे कम बताई है, जबकि 241 (41 प्रतिशत) ने स्नातक या उससे अधिक योग्यता ज़ाहिर की है. जहां तक महिलाओं के प्रतिनिधित्व का सवाल है, तो वह भी काफी निराशाजनक है. कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की संख्या केवल 56 (नौ प्रतिशत) है.

सत्ता में महिलाओं की भागीदारी यूं ही सवालों के घेरे में है. अक्सर आधी आबादी को सत्ता में भागीदारी देने की बात कही जाती है. बिहार में स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण हासिल है. बावजूद इसके महिला उम्मीदवारों की संख्या में कमी चिंताजनक है और यह लोकतंत्र के लिए अच्छा शगुन नहीं है. इस संबंध में भी राजनीतिक दलों को सोचने की ज़रूरत है. कुल मिलाकर पहले चरण के उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि सरकार चाहे जिसकी बने, विधानसभा की तस्वीर पहले से भिन्न नहीं होगी.

एडीआर की नज़र में गंभीर आपराधिक मामले
1. पांच साल या उससे अधिक सजा वाले अपराध.
2. ग़ैर ज़मानती अपराध.
3. चुनाव से संबंधित अपराध (धारा 171 या रिश्वतखोरी).
4. सरकारी खजाने को ऩुकसान पहुंचाने से संबंधित अपराध.
5. हमला, हत्या, अपहरण एवं बलात्कार से संबंधित अपराध.
6. लोक प्रतिनिधि अधिनियम में उल्लेखित अपराध (धारा 8).
7. भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत अपराध.
8. महिलाओं के ऊपर अत्याचार संबंधी अपराध.

नेताओं के लिए उम्र का कोई मायने नहीं
बिहार विधानसभा चुनाव में हलफनामों को लेकर भी एक विवाद खड़ा हो गया है, जो राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के दोनों पुत्रों तेज प्रताप यादव एवं तेजस्वी यादव से जुड़ा है. लालू यादव के दोनों पुत्र चुनाव मैदान में हैं. उन्होंने चुनाव आयोग को दिए अपने हलफनामे में अपनी जो आयु बताई है, वह विवादों के घेरे में आ गई है. इस विवाद का दिलचस्प एवं हास्यास्पद पहलू यह है कि छोटे भाई की उम्र अधिक हो गई है और बड़े भाई की उम्र कम.

तेजस्वी यादव ने फेसबुक पर अपनी स़फाई पेश की कि मतदाता सूची की त्रुटि के कारण दोनों भाइयों की उम्र में अंतर पैदा हुआ और यह सब क़ानून के मुताबिक हुआ. बहरहाल, सच्चाई जो भी हो, लेकिन मतदाता सूचियों में लोगों के नाम और उम्र में गड़बड़ी की शिकायत कोई नई और अनोखी बात नहीं है. ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं. मसलन, बिहार में ही ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जिनकी उम्र ने ऐसी हास्यास्पद स्थिति न पैदा की हो. मिसाल के तौर पर दरभंगा के भाजपा सांसद कीर्ति झा आज़ाद की उम्र वर्ष 2009 में 48 वर्ष थी, जो 2014 में 55 वर्ष हो गई. कीर्ति आज़ाद ने 10 वर्षों में 12 वर्षों का स़फर तय कर लिया.

इसी तरह राजद के जयप्रकाश नारायण यादव की उम्र वर्ष 2004 में 54 वर्ष थी, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी उम्र 60 वर्ष बताई गई, जबकि दोनों चुनावों के बीच 10 वर्ष का फासला है. वर्तमान में केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा सांसद राधा मोहन सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही मामला है. वर्ष 2004 में उनकी उम्र 56 वर्ष थी और 2009 में 59 वर्ष. यदि दो या दो से अधिक चुनाव लड़े सभी उम्मीदवारों की उम्र का जायजा लिया जाए, तो यह सूची बहुत लंबी हो जाएगी.

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि उम्मीदवारों द्वारा चुनाव आयोग को स्वयं से संबंधित जानकारियों के बारे में जो हलफनामा यानी शपथ-पत्र दिया जाता है, उसमें इस तरह की ग़लत बयानी क्यों की जाती है? ज़ाहिर है, जो उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है और जीत रहा है, वह इतनी बड़ी ग़लती नहीं करेगा कि दो अलग-अलग हलफनामों में परस्पर विरोधाभासी जानकारी देगा. यहां कमी चुनाव आयोग की भी है.

अगर चूक चुनाव आयोग की तऱफ से हो रही है, जैसा तेजस्वी यादव ने दावा किया है, तो उसे इसे ़फौरन दुरुस्त करना चाहिए. दूसरे यह कि यदि ग़लती उम्मीदवारों की तऱफ से हो रही है, तो उनके ़िखला़फ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. वरना ऐसे हलफनामों का कोई मतलब नहीं रह जाएगा.

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