बाबा के बताए रास्ते पर चलना चाहिए

Sai-Babaसाई-धुन
मन में साई-धुन हमेशा क्यों नहीं चलती रहती और इसे सदा चलाने के लिए क्या प्रयास करने चाहिए?अजपाजप हमारी सांस को कहते हैं, जो हमारे अंदर निरन्तर चलती रहती है. हम जपते नहीं हैं पर सांस अपनी गति से चलती है. सांस के साथ नाम को मिलाकर चलने से असर होता है. यह गृहस्थ आदमी नहीं कर सकता, क्योंकि उसे बाकी कार्यों में मन लगाना पड़ता है. अच्छा यही है कि इस अजपाजप के साथ साई-साई को जोड़कर, हर समय न बोलकर बाबा की भावना को मन में रखें. हर कर्म और भावना से उनकी भावना को जोड़ते रहें. यही उनका मानसिक जप होगा. जब समय मिले तो साई नाम लीजिए. बैठकर अपनी हर सांस के साथ साई-नाम लेकर जप करें.

अनोखी योग शिक्षा
क्या बाबा ने अपने भक्तों को योग-शिक्षा दी थी? आजकल प्रचलित जैसी योग-शिक्षा दी जा रही है, उस प्रकार की योग-शिक्षा के बारे में आपकी अवधारणा क्या है? लोग योग को साधारणत: एक प्रकार का शारीरिक व्यायाम समझते हैं, जो कि मुद्रा और आसन के साथ किया जाता है. योग-पद्धति का संपूर्ण विवरण महर्षि पातंजलि द्वारा लिखित योग-सूत्र ग्रंथ में मिलता है. लोग कभी-कभी योग क्रिया को प्राणायाम के साथ भी जोड़ देते हैं. कुछ लोग ध्यान करते समय पद्मासन तथा सिद्धासन जैसे आसन में बैठते हैं.

परंतु श्री शिरडी साई बाबा ने अपने किसी भी भक्त को इन योग-क्रियाओं के बारे में कभी भी कुछ नहीं बताया था. पर योग-क्रिया के विरुद्ध भी उन्होंेने कुछ नहीं कहा है. श्री उपासनी बाबा जैसे बाबा के कुछ महान भक्त बाबा से मिलने से पहले संपूर्ण योग-क्रिया के बारे में अभ्यास कर चुके थे. श्री उपासनी महाराज बाबा के आदेशानुसार खंडोबा मंदिर में तीन वर्ष से अधिक अवधि तक रहे, पर बाबा ने उनको कभी भी इस प्रकार योग-क्रिया करने के लिए नहीं कहा था.

भक्तों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए बाबा के द्वारा किया गया पथ-प्रदर्शन मानसिक शुद्धिकरण, मानसिक नियंत्रण और मानसिक उन्नयन पर आधारित था. इस विषय में बाबा ने इस प्रकार किसी कभी भी किसी मुद्रा में बैठने के लिए नहीं कहा था. वे शारीरिक नियंत्रण की अपेक्षा मानसिक नियंत्रण पर अधिक बल देते थे.

बाबा का रास्ता : भक्तिमार्ग
बाबा को पाने के लिए ज्ञान-प्रधान मार्ग से चलना चाहिए या भक्ति प्रधान मार्ग से? क्योंकि कई बुद्धिजीवी ज्ञान-मार्ग को अधिक श्रेयस्कर समझते हैं.आजकल बाबा के बारे में लोग बहुत सी किताबें पढ़कर अपने को सिद्ध समझते हैं. इस संबंध में बहुत सी पुस्तकें उपलब्ध हैं, लोग उन्हें पढ़ते हैं. ज्ञान मार्ग में लोग कितना भी पढ़ें, जब तक इस स्थूल ज्ञान में भक्ति का रस न जुड़े, तब तक उस सुक्ष्म रूप को नहीं पाया जा सकता. भक्ति-मार्ग की अपनी महत्ता है.

जैसे-जैसे भाव का, भक्ति का सोपान उच्चतर होता जाता है, वैसे ही बुद्धि का, ज्ञान का सोपान भी स्वत: उच्चतर होता जाएगा. पर विपरीत रूप में यह संभव नहीं है. अर्थात भक्ति द्वारा ज्ञान को पाया जा सकता है, परंतु बुद्धि द्वारा उस भक्ति-भाव को नहीं पाया जा सकता. भक्त कहेगा-ङ्गहे ईश्वर! जो ज्ञान तुम हमें दे रहे हो, वह ज्ञान का अनुभव मेरा नहीं है, वह तो तुम्ही से मिला है.फफ किन्तु ज्ञान मार्ग पर चलने वाला अपने को श्रेष्ठ समझता है. भक्ति से उत्तपन्न ज्ञान निरहंकार करता है, पर बुद्धि से जो ज्ञान होता है, वह अहंकार उत्पन्न करता है.

शुद्ध अंतर्मन से साई-भक्ति
बाबा से पाक मोहब्बत हम करना चाहते हैं पर उसके रास्ते से अनजान हैं, आपसे हमें मदद चाहिए. एक व्यक्ति अच्छा साई भक्त कब और कैसे बन सकता है? बाबा से पाक मोहब्बत करने का अर्थ है-बाबा के द्वारा कहे हुए और बताए हुए रास्ते पर पूर्ण रूप से चलना. पहले तो खुद को साफ करने की आवश्यकता है, जिसमें कई वर्ष या जन्म लग सकते हैं. फिर भी प्रयास हमेशा जारी रखना चाहिए. अपने अन्दर ईश्वरीय गुण-जैसे दया, क्षमा, अंहिसा, सेवा आदि जगाने से सद्गुरू साथ चलने लगते हैं.

ङ्गश्री साई सच्चरित्रफफ पढ़ने से पता चलने लगता है कि वे लोग बाबा के करीब थे, जो उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो चुके थे. बाहर की पूजा अर्चना आदि अंतर्मन को साफ करने का माध्यम ही है. फिर भी मात्र पूजा पाठ कर लेने से पूर्ण साई-भक्ति नहीं मिल सकती, जब तक अर्ंतमन साफ न हो.

loading...