डेेयरी उद्योग फायदा ही फायदा

पशुपालन हमारे देश में ग्रामीणों के लिए स़िर्फ आमदनी का ज़रिया ही नहीं रहा, बल्कि यह देशवासियों की सेहत से भी जुड़ा है. एक समय था, जब पशुपालन के पेशे को लोग अच्छा नहीं मानते थे, लेकिन अब जमाना बदल गया है. पशुपालन अब पहले की तरह गोबर-कीचड़ का खेल नहीं रहा, बल्कि यह आधुनिक होकर चोखी कमाई का ज़रिया बन चुका है. पशुपालन अगर योजनाबद्ध तरीके से और तकनीक अपना कर किया जाए, तो इससे अच्छा-खासा मुना़फा हासिल किया जा सकता है. डेयरी उद्योग में दुधारू पशु पाले जाते हैं. इसके तहत भारत में गाय और भैंस पालन को ज़्यादा महत्व दिया जाता है.

कहते हैं, हर समस्या का समाधान है, बशर्ते चाह होनी चाहिए. राजस्थान के झुंझुनू ज़िले के चेलासी गांव में मोरारका फाउंडेशन ने डेयरी फार्म के रूप में किसानों को नया जीवन और नई दिशा देने का काम किया है. डेयरी फार्म के चलते यहां के किसानों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है और अब देश के दूसरे क्षेत्रों के किसान भी मोरारका फाउंडेशन के संपर्क में आकर अपने यहां डेयरी की शुरुआत कर रहे हैं. मोरारका फाउंडेशन के अनुसार, खुशहाली एवं समृद्धि के लिए डेयरी व्यवसाय और पशुपालन बेहद ज़रूरी है. यदि खेती करना है, तो गौ-पालन करना आवश्यक है. किसानों को मोरारका फाउंडेशन से पूरा सहयोग मिल रहा है.

श्रवण कुमार चेलासी गांव के अग्रणी किसानों में से एक हैं. श्रवण ने बताते हैं कि किस तरह मोरारका फाउंडेशन ने उनकी सहायता की. श्रवण ने बताया कि जैविक खेती, जो कि वर्ष 2009 में पंजीकृत हुई थी और उस पर जो कार्य हो रहा है, वह मोरारका फाउंडेशन की देन है. श्रवण ने कहा कि अगर मोरारका फाउंडेशन से कोई बात करनी हो या वहां तक कोई समस्या पहुंचानी हो, तो वह बहुत आसान काम है. फाउंडेशन हर समस्या का समाधान करता है, वह भी चंद दिनों के अंदर. श्रवण मोरारका फाउंडेशन से 2009 से जुड़े हैं. श्रवण ने जीवकोपार्जन के लिए सऊदी अरब में अपने जीवन के बहुमूल्य 22 साल ग़ुजारे.

वह कहते हैं कि आप चाहे दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, मिट्टी की खुशबू वापस बुला ही लेती है. गांव आने के बाद श्रवण ने सोचा कि घर से बाहर रहने पर लोग परिवार एवं समाज से दूर हो जाते हैं, जिससे खुद की पहचान भी ़खत्म हो जाती है. श्रवण जानते हैं कि रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव स़िर्फ खेत पर नहीं, बल्कि मनुष्यों एवं पशुओं पर भी पड़ते हैं. इसलिए उन्होंने कुछ अलग करने की सोची और इस बारे में मोरारका फाउंडेशन के स्थानीय अधिकारियों से बात की. चर्चा में निष्कर्ष निकला कि डेयरी व्यवसाय करना चाहिए. सऊदी अरब में नौकरी करने के दौरान श्रवण को विश्व की सबसे बड़ी गाय डेयरी देखने का मा़ैका मिला था. उसे देखने के बाद श्रवण ने डेयरी व्यवसाय अपनाने का फैसला लिया, जिसके लिए मोरारका फाउंडेशन द्वारा उसे मदद मिली. मोरारका फाउंडेशन ने श्रवण को अजीतगढ़ स्थित डेयरी सहज एग्रो प्राइवेट लिमिटेड का दौरा कराया. सहज एक जैविक प्रमाणीकृत डेयरी है. श्रवण ने अपनी दो बीघा भूमि पर 22 गायों के साथ अक्टूबर 2014 में मंगलम्‌ डेयरी जैविक कृषि फार्म की शुरुआत की.

आज पूरी दुनिया के लोग मिलावट वाली चीजों से डरते और उनसे नफरत करते हैं. पैकिंग वाली चीजों में भी कुछ न कुछ मिलावट पाई जाती है. आज ज़्यादातर लोग अपने ही क्षेत्र में बने उत्पाद पसंद करते हैं, चाहे वह पेय हो, घी हो या फिर मक्खन. जो लोग पहले शहरों की तऱफ भागते थे, वे फिर वापस गांव की तऱफ आने लगे हैं. श्रवण का मानना है कि अगर किसी के पास खेती लायक भूमि है, तो उसे कहीं भटकने की ज़रूरत नहीं है. श्रवण कहते हैं, डेयरी व्यवसाय काफी अच्छा है, इससे दूसरे लोगों को भी रोज़गार मिलता है. हमारी सारी व्यवस्था जैविक यानी ऑर्गेनिक है. गायों को किसी भी तरह की कोई दवा नहीं दी जाती. श्रवण ने बताया कि उन्होंने जब यह व्यवसाय शुरू किया, तो उस समय सर्दी का मौसम था. गायों का बीमार हो जाना जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन कुछ समय बाद सब ठीक हो गया. आज उन्हें डॉक्टर की ज़रूरत नहीं पड़ती.

श्रवण ने अपनी गायों के लिए बाजरा और हरी घास हैदराबाद से लाकर खेतों में प्लांट किया और उसी बाजरे को गन्ने के रूप में काटकर अलग-अलग बोया जाता है. यह बाजरा तीन साल तक चलता है. इसे गायें काफी शौक से खाती हैं, क्योंकि इसमें खट्टा-मीठा मिश्रण होता है. श्रवण के पास दो-तीन प्रजातियों की गायें हैं. वह जर्सी गायों का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं. भविष्य में जर्सी और देसी गाय रखने का विचार है. ये गायें 20-25 लीटर दूध देती हैं. उन्होंने कहा कि डेयरी व्यवसाय में 50 प्रतिशत तक मुना़फा होता है, वह भी तब, जबकि वह जैविक खेती करते हैं. अगर वह बाज़ार से लाकर गायों को चारा खिलाएंगे, तो कुछ नहीं बचेगा. वह खुद के पैदा किए बाजरा, मक्का, जौ, चना एवं ज्वार आदि का मिश्रण करके गायों को खिलाते हैं. उनके डेयरी फार्म से सात-आठ लोगों को रा़ेजगार मिला.

उनके दो साथियों ने अपनी डेयरी खोल ली है. श्रवण अन्य किसानों को भी डेयरी फार्म खोलने के लिए प्रेरित करते हैं. वह कहते हैं कि पहले हाथ से दूध निकाला जाता था, लेकिन आज मशीनों के माध्यम से दूध निकाला जाता है. गायों के गोबर से वह जैविक खाद तैयार करते हैं, जिसके इस्तेमाल से फसल अच्छी होती है. उन्होंने बताया कि वह गोमूत्र के संबंध में विभिन्न कंपनियों से विचार-विमर्श कर रहे हैं, ताकि उसका इस्तेमाल दवा के रूप में किया जा सके.