भिन्न धर्म-परंपराएं व भिन्न पूजा पद्धतियां

Sai-Babaअपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए

यदि ईश्वर एक है, तो उसकी आराधना-पद्धतियों में इतनी विभिन्नता क्यों है?.

आराधना या चिंतन के बारे में ईश्वर ही भिन्न-भिन्न लोगों को या धार्मिक समुदायों को भिन्न-भिन्न मार्ग दिखाते हैं. अपने पूर्व जन्म के संस्कार एवं इस जन्म में प्राप्त धर्म और संस्कृति के अनुसार लोग किसी मार्ग का अनुसरण करते हैं. कोई व्यक्ति ईश्वर को किस रूप से पुकारेगा, यह उसके आत्मा और परमात्मा के बीच एक समझौता है, जिसमें और कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता. दूसरों की आराधना पद्धति या उपासना को गलत साबित करने का प्रयास और अपनी धर्म परंपराओं को श्रेष्ठता देने का प्रयास धर्मों में विभिन्नता की सृष्टि करता है.चूंकि विभिन्न लोगों की विभिन्न परंपराएं होती हैं, इसीलिए गीता में श्रीकृष्ण ने कहा-

ङेयान्‌स्वधर्मों विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌.
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मों भयावह:.
(अर्थात-इसलिए उन दोनों(राग-द्वेष) को जीतकर सावधान हुआ स्वधर्म का आचरण कर, क्योंकि अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है. अपने धर्म में मरना भी कल्याणपरक है और दूसरे का धर्म भय देने वाला है.)
श्रीमद्भगवद्गीता,अ.3/35
इसलिए किसी के धर्म को-दूसरा कोई चाहे कितना ही गलत समझे, अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए, जैसा कि श्री साई सच्चरित्र में बाबा ने भी कहा.

प्रतीक पूजा

प्रतीक पूजा का क्या महत्व है?

परमेश्वर, परब्रह्म एवं भगवान की परिकल्पना आध्यात्मिक अनुभूति-प्राप्त संत एवं महात्माओं द्वारा परम व्यापक रूप से की गई है. साथ ही उन्होंने ईश्वरीय सत्ता को सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में भी अनुभव किया है. जिन्होंने कठिन आध्यात्मिक मार्ग में चलते हुए और गुरु-कृपा द्वारा ईश्वर के चैतन्य रूपी स्वरूप का अनुभव कर लिया, उनके लिए प्रतीक-पूजा की आवश्यकता नहीं है. प्रतीकों की पूजा, जैसे कि मूर्ति, फोटो, चित्र आदि की पूजा, भक्तगण प्रारम्भिक अवस्था में करते हैं. यह इसलिए है कि जो कठिन योग-साधना द्वारा अपने चैतन्य को विश्व-भुवन में व्याप्त करने की क्षमता नहीं रखते हैं, उस व्यापक रूप की एक प्रतीक-रूप में पूजा कर सकते हैं. समष्टि को व्यष्टि रूप से, बृहत्‌ को क्षेत्र रूप से प्रस्तुत करने के लिए सांकेतिक उपादानों, रूपा आदि का प्रयोग किया जाता है, जैसा कि साहित्य में होता है. इनके द्वारा उस मूल स्वरूप को समझने में सहायता मिलकती है, पर साकार प्रतीक यानी मूर्ति की पूजा करते-करते निराकार रूप तक पहुंचा जा सकता है.

देवी पूजा

हिंदू धर्म में देवी पूज्या होती हैं, पर अन्य धर्मों में देवी पूजा नहीं होती. क्या आध्यात्मिक मार्ग में जाने के लिए देवी-पूजा ही एक मात्र रास्ता है?

पहले तो समझना चाहिए कि हिंदु धर्म में कहलाने वाली देवी वास्तव में क्या हैं? देवी और दैवी आदि दोनों शब्दों का अर्थ लगभग एक ही है. ईश्वर की शक्ति को दैवी शक्ति कहते हैं और उसका नारी रूप प्रतीक है देवी. वास्तव में ब्रह्म न पुरुष है, न नारी- वह निर्गुण है. हिंदु धर्म में श्री दुर्गा के दस हाथ ईश्वर की दस शक्तियों की समष्टि दर्शाते हैं. अत: अगर किसी धर्म में इन प्रतीकों का प्रयोग न भी हो, फिर भी इन्हीं अदृश्य शक्तियों के माध्यम से समस्त जड़ और जीव वस्तुएं नियंत्रित होती हैं.

सदगुरु-पूजा

सदगुरु की पूजा को क्या सगुण-साकार पूजा कहेंगे?
जी हां. सद्गुरु का अर्थ है-एक साकार मानव रूपी शरीर, जिसमें एक महत्‌ ईश्वरीय चेतना निवास कर रही है. वह चेतना-शक्ति चाहे तो एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को आधार बना सकती है. जैसे कि आदि शंकराचार्य ने परकाया प्रवेश किया था. सामान्य आदमी की चेतना शक्ति इतने उच्चतर या सूक्ष्म स्तर तक नहीं पहुंची है कि वह जब चाहे अपनी चेतना-शक्ति को अन्य शरीर में प्रवेश करा सके. वस्तुत: भक्त पहले सद्गुरु के शारीरिक रूप की पूजा करना शुरू करत हैं. सद्गुरु की पूजा वे पहले इसलिए करते हैं कि उनकी कृपा, क्षमा, शांति आदि गुणों से भक्त अभिभूत हो जाता है. इसी कारण शरीर-धारण के लिए या एक शरीर में निवास करने के कारण अथवा ये कहें कि शरीर-रूपी एक क्षेत्र में निवास करने के कारण वे साकार होते हैं और ईश्वरीय गुणों से विभूषित होने के कारण श्रीगुरु सगुण-साकार हैं.

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