विकास के सपने पर जाति का सच भारी

bjpबिहार विधानसभा का चुनाव अभियान अपने शबाब पर पहुंंच रहा है. राजनीतिक गठबंधनों, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और महागठबंधन की बात तो दूर, इनसे बाहर के छोटे-बड़े दलों ने भी अपनी चालें चल दी हैं. सभी राजनीतिक गठबंधनों और दलों ने अपने-अपने चुनाव अभियान की शुरुआत बिहार के विकास की जरूरत से की, पर अंततः वे जाति पर ही आकर टिक गये.

अब वे जाति की गोटी फिट कर, कुर्सी की जुगत भिड़ाने का कोई उपाय बाकी नहीं छोड़ रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल इस बार अभी नहीं, तो कभी नहीं की भावना से बिहार विधानसभा चुनाव लड़ रही है, और येन-केन प्रकारेण वह हिन्दीपट्टी के इस प्रखर राज्य की सत्ता पर क़ाबिज होने के लिए संकल्पित है. इस लिहाज़ से प्रत्यक्ष ही नहीं बल्कि परोक्ष रूप से भी वह सब कर रही है जिनका कुछ वर्ष पहले तक उसका नेतृत्व प्रखर विरोध करता था.

भाजपा अगड़ी जाति, दलित और पिछड़ों का नया राजनीतिक समीकरण तैयार करने में पिछले कई महीनों से जुटी है. अपने इस अभियान में वह बहुत हद तक सफल भी होती दिख रही है. बिहार के 13 प्रतिशत अगड़ी जाति के मतदाताओं में से तकरीबन तीन चौथाई भाजपा के साथ हैं. वह दलितों का भी अच्छा-खासा समर्थन हासिल होने का दावा कर रही है.

पिछले संसदीय चुनाव में रामविलास पासवान और उनकी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) एनडीए में शामिल हो गई थी. अब जीतनराम मांझी और उनका हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के साथ आने से बिहार का दलित नेतृत्व एनडीए के पाले में है. इसके साथ ही पिछड़े सामाजिक समूहों से वैश्य और कुशवाहा भी उससे जुड़ गए हैं. इन दोनों पिछड़े सामाजिक समूहों का पूरा नेतृत्व एनडीए के साथ हैै.

बिहार में वैश्य समाज में सुशील कुमार मोदी से बड़ा या उनके समानांतर दूसरा कोई नाम नहीं है. उपेन्द्र कुुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) संसदीय चुनाव में ही एनडीए का दामन थाम लिया था. इस बार हम के बहाने कुशवाहा समाज के दूसरे बड़े नेता भी एनडीए से जुड़ गए हैं. लेकिन पिछड़ों में सबसे जुझारू, बड़ी और राजनीतिक जातियां यादव व कुर्मी और अति-पिछड़ी जातियां अब भी भाजपा और एनडीए के दायरे से आम तौर पर बाहर ही हैं. भाजपा के शीर्श नेतृत्व का मानना है कि बिहार में लालू-नीतीश की जोड़ी को बेअसर करने के लिए इन सामाजिक समूहों पर निशाना साधना बेदह जरूरी है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुजफ्फरपुर में हुई रैली में खुद को द्वारकाधीश का प्रतिनिधि बताकर यदुवंशियों का संरक्षक घोषित किया था. इसी रणनीति के तहत भूपेन्द्र यादव और नंदकिशोर यादव जैसे अपेक्षाकृत युवा नेताओं के साथ-साथ नवागंतुक रामकृपाल यादव जैसे नेताओं को भी पार्टी में तवज्जो दी जाने लगी है. भाजपा की इस रणनीति का असर उसके उम्मीदवारों की सूची में भी दिखाई पड़ता है. इस रणनीति का पालन उसने अपने सहयोगी दलों से भी करवाया है.

भाजपा ने बड़ी चतुराई से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की घेराबंदी की है. भाजपा ने अपने चुनाव चिन्ह पर दो दर्जन से अधिक यादव उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. इसके अलावा सहयोगी दलों को भी इस पर खास तवज्जो देने को कहा गया. इसके बाद हालात ऐसे बने कि राजद से दुखी यादवों को बुला-बुला कर टिकट दिए गए. नालंदा जिला के इस्लामपुर निर्वाचन क्षेत्र से जिस वीरेन्द्र गोप को उम्मीदवार बनाया गया है उन्हें कुछ ही घंटे पहले भाजपा में शामिल कराता गया था.

लालू प्रसाद के पुत्र तेजस्वी यादव (राघोपुर) के खिलाफ जद(यू) के निवर्त्तमान विधायक सतीश कुमार यादव को तकरीबन बारह घंटे पहले और राजद विधायक दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी (अलीनगर) के खिलाफ राजद के पूर्व विधान पार्षद मिश्रीलाल यादव को तकरीबन चौबीस घंटे पहले ही भाजपा की सदस्यता दी गई. इसे कहते हैं घर बुला कर सिंबल देना. ये तो अंतिम समय के कुछ उदाहरण हैं. इससे पहले भी की राजद और जद(यू) से नाराज़ उसके कई नामचीन यादव उम्मीदवारों को पार्टी ने सम्मानित किया है. इसके अलावा, डॉ. रवीन्द्रचरण यादव (बिहारीगंज) और श्रीकान्त निराला (मनेर) भी राजद से भाजपा में आकर टिकट पानेवाले प्रमुख लोगों में शामिल हैं.

भाजपा और एनडीए के अन्य घटक दलों ने माय(मुस्लिम-यादव) में बिखराव का उपाय किया है. महागठबंधन- मुख्यतः राजद और जद(यू)- के यादव प्रत्याशियों के खिलाफ मुस्लिम और मुस्लिम प्रत्याशियों के विरोध में यादव प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतराने का फैसला किया है. दरभंगा जिला इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. वहां दरभंगा ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र में राजद के वरिष्ठ नेता ललित कुमार यादव के खिलाफ हम के नौशाद आलम को और अलीनगर में श्री सिद्दिकी के खिलाफ मिश्रीलाल यादव को मैदान में उतारा गया है.

जिले के केवटी में भाजपा के यादव विधायक हैं तो राजद ने वहां से मुस्लिम उम्मीदवार दिया है. इसी तरह हम ने साहबपुर कमाल (बेगूसराय) में राजद के श्रीनारायण यादव के खिलाफ मोहम्मद असलम व बेलागंज (गया) में सुरेन्द्र यादव के विरोध में शारिम अली को अपना उम्मीदवार बनाया है. लोजपा ने सिमरी बख्तियारपुर में महागठबंधन के यादव उम्मीदवार के खिलाफ मुसलमान को टिकट दिया है. हालांकि समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा-अर्थात तीसरे मोर्चा के उम्मादवारों की लिस्ट अब तक जारी नहीं हुई है. पर, इस मोर्चा में भी माय को निशाने पर लेने की तैयारी है. वस्तुतः यह मोर्चा राज्य में दोनों गठबंधन से निराश राजनेताओं का नया आश्रय-स्थल है. इस मोर्चा में शामिल सासंद पप्पू यादव ने तो साफ शब्दों में राजद के बड़े मुस्लिम नेता तसलीमुद्दीन को अपनी जनअधिकार पार्टी में शामिल होकर पप्पू यादव को नेतृत्व देने के लिए साथ आने का न्योता दिया है. यहां जिस ढंग से उम्मीदवारों का चयन हो रहा है वही बताता है कि जहां माय को भेदने के उपाय में भाजपा या एनडीए चूक गया, वहां तीसरी मोर्चा इस काम को बखूबी पूरा कर रहा है.

डुमरांव निर्वाचन क्षेत्र में एनडीए की रालोसपा ने रामबिहारी सिंह को उम्मीदवार बनाया है. इसलिए, वहां टिकट से वंचित जद(यू) के निवर्त्तमान विधायक दाउद अली जन अधिकार पार्टी (जअप) से उम्मीदवार हो रहे हैं. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद- और इस लिहाज से महा-गठबंधन के लिए यह चुनाव अग्निपरीक्षा है. माय लालू प्रसाद की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है. महा-गठबंधन के समर्थन का सामाजिक आधार भी यही है. बिहार के सबसे पुराने इस राजनीतिक-सामाजिक समीकरण को एकजुट रखना और ऐसा करते हुए उसे जुझारू मतदान के लिए पोलिंग बूथ तक ले जाना, लालू प्रसाद व महा-गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती है. यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि पिछले कुछ दशकों में यादव समाज का तीव्र राजनीतिकरण हुआ है और उनकी राजनीतिक आकांक्षायें परवान चढ़ने लगी हैं. उनकी इसी महत्वाकांक्षा का उपयोग हर राजनीतिक दल कर रहा है.

एनडीए के आक्रामक यादव पटाओ अभियान की काट महागठबंधन के पास नहीं दिखाई पड़ रही है. राजद और जद(यू) ने निवर्त्तमान विधानसभा के अपने तकरीबन पचास विधायकों को इस बार टिकट नहीं दिया है. यह संख्या दोनों दलों के कुल विधायकों के एक तिहाई से अधिक है. हालांकि इसमें सभी सामाजिक समूहों के विधायक हैं. लेकिन यह भी सही है कि माय के दायरे के विधायकों की संख्या भी कम नहीं है. इस घाव को महा-गठबंधन ने भरने की कोशिश की है. उसकी प्रत्याशियों की जारी सूची के अनुसार अगड़े सामाजिक समूहों को पंद्रह प्रतिशत व दलित समुदाय को सोलह प्रतिशत उम्मीदवारी दी गई है. विधानसभा की शेष 69 प्रतिशत सीटों पर इसने पिछड़ा-अतिपिछड़ा और मुसलमानों को अपना प्रत्याशी बनाया है.

महा-गठबंधन के तीनों दलों ने मिलकर मुसलमानों को 16 प्रतिशत उम्मीदवारी दी है. महा-गठबंधन के लिए केवल इतना संकट नहीं है. उसे माय को तो बचाना ही है, अतिपिछड़ा और महादलितों को भी अपने दायरे में गोलबंद रखना उसकी बड़ी जरूरत है. नीतीश कुमार ने अपने शासनकाल में इन सामाजिक समूहों के राजनीतिकरण व सशक्तिकरण का अभियान चलाया था. इसका लाभ उन्हें पिछले विधानसभा चुनावों में मिला था. पिछले संसदीय चुनावों में नरेन्द्र मोदी की सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण अतिपिछड़ों में तो भाजपा की घुसपैठ हुई, लेकिन महादलित समुदाय नीतीश कुमार के साथ ही रहा. पर, जीतनराम मांझी प्रकरण ने इसे तहस नहस कर दिया.

माना जा रहा है कि मांझी के कारण इन सामाजिक समूहों का समर्थन भाजपा (एनडीए) को मिलेगा. लेकिन यह बहुत हद तक सही नहीं है. पासवान, मुसहर जैसे दलित समुदायों का समर्थन एनडीए को मिल सकता है, पर अन्य जातियों पर नीतीश कुमार का प्रभाव अब भी है. इस लिहाज से महादलित में
महा-गठबंधन की एक हिस्सेदारी बनती है. अब यह महा-गठबंधन के रणनीतिकारों पर निर्भर करता है कि वे इसे किस हद तक बचा कर रखते हैं. इसी तरह अतिपिछड़ी जातियों में से कुछ भाजपा (या एनडीए) के साथ हो गई हैं और उनकी नीतीश कुमार के साथ वापसी कठिन है. पर, कुछ जातियों में अब भी नीतीश कुमार का असर है. इन सबके बावजूद लाख टके का सवाल यह है कि मतदान के दौरान और उसके बाद, इनके साथ कौन रहेगा?

इस प्रश्न के जवाब में काफी कुछ निर्भर करता है. बिहार में अतिपिछड़ों की आबादी लगभग बत्तीस प्रतिशत है. सूबे की चुनावी गोलबंदी का असर सामाजिक तौर पर भी पड़ा है और अधिकांश बड़ी जातियां स्पष्टतः इस पक्ष या उस पक्ष में हैं. लेकिन अतिपिछड़ी जातियां और कुछ दलित समुदाय अभी भी इस तरह की गोलबंदी से बाहर हैं. महा-गठबंधन के नेताओं को इनके बारे में, इनकी सुरक्षा के बारे में विचार करना है. मतदान के दौरान और उसके बाद इनकी सुरक्षा की गारंटी किसी भी राजनीतिक समूह की जीत को आसान बना देगी.

इस फ्रंट पर महा-गठबंधन को एनडीए की तुलना में वामदलों के मोर्चा से कम खतरा नहीं है. अतिपिछड़े और दलित समुदाय वामदलों का मूल आधार रहे हैं. इस बार सभी वाम दल(छह) एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं. इन सभी को एक साथ सामने रखकर देखें तो राज्य के तकरीबन चार दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों में इनकी ताकत है. इन क्षेत्रों में चुनावी नतीजों को ये प्रभावित कर सकते हैं. कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि महा-गठबंधन की घेराबंदी कई तरह से हो रही है. महागठबंधन और लालू प्रसाद की सबसे बड़ी ताकत माय है, और इसे इसी तरह के किसी जातीय हथियार से भेदने का कोई भी उपाय एनडीए या लालू-नीतीश विरोधी मध्यमार्गी दल बाकी नहीं छोड़ेगा. एनडीए हो या तीसरा मोर्चा या एमआईएम सुप्रीमो असदउद्दीन ओवैसी. सूबे की महा-गठबंधन विरोधी राजनीतिक ताकतों के लिए माय को निशाने पर लेना और इसे बिखेरना, इन सबकी राजनीतिक जरूरत है. राज्य की लगभग 40 प्रतिशत विधानसभा सीटों के चुनावी नतीजों को माय की एकजुटता प्रभावित करती है.

माय की एकजुटता लालू प्रसाद की मूल पूंजी है और पिछले कई चुनावों से इन सामाजिक समूहों के मतदाताओं की मतदान शैली पर उनका गहरा असर रहा है. इसलिए, इसे तोड़े बगैर बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद के प्रभाव को बेअसर नहीं किया जा सकता. इसीलिए एनडीए ने इस चुनाव में तीस से अधिक यादव प्रत्याशी दिए हैं. इसके साथ ही भाजपा की कोशिश रही है कि महागठबंधन के यादव प्रत्याशियों के खिलाफ एनडीए के अन्य दल व परोक्ष-सहयोगी मुस्लिम प्रत्याशी दें. बिहार विधानसभा चुनाव की रणभूमि में इसके उदाहरण बिखरे पड़े हैं.

loading...