चुनाव नहीं, देश बड़ा होता है

Modiदेश के अ़खबार बिहार की अलग-अलग पार्टियों के चुनाव प्रचार की खबरों से भरे पड़े हैं. मुझे नहीं मालूम कि एनडीए के रणनीतिकार कौन लोग हैं, लेकिन यह बुद्धिमतापूर्ण निर्णय नहीं लगता है कि बिहार में प्रधानमंत्री की इतनी ज़्यादा संख्या में रैलियां कराई जाएं. बेशक, वह पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं, पार्टी के सबसे बड़े चेहरे हैं. यह उनका व्यक्तित्व होगा, जो यह निर्णय करेगा कि लोग कैसे मतदान करते हैं.

लेकिन, इसकी ज़रूरत नहीं थी कि वह इतनी सारी जगहों पर जाकर भाषण दें और एक ही बात बार-बार दोहराएं. उन्हें केंद्र की सत्ता में आए ड़ेढ साल से अधिक समय हो गया है. इसलिए अब उनकी नीतियों और उनके कामों को खुद बोलना चाहिए, न कि उन्हें अपनी सफलता के बारे में बोलने की ज़रूरत पड़नी चाहिए. यह उनके दूसरे कैबिनेट सहयोगियों एवं पार्टी के नेताओं के लिए ठीक है कि वे जाकर राज्य में उनके कामों का बखान करें. बहरहाल, प्रधानमंत्री ने सक्रिय रूप से चुनाव अभियान में हिस्सा लेने का फैसला किया और सारी चीजें अपने हाथ में ले लीं. पहले के प्रधानमंत्री किसी राज्य के चुनाव में दो या तीन से अधिक रैलियां नहीं करते थे.

जहां तक मुझे जानकारी है, प्रधानमंत्री मोदी बिहार में 40 रैलियां करने वाले हैं, जो ज़रूरत से ज़्यादा हैं.दूसरी तऱफ विभिन्न पार्टियां लुभावने नारों और जो काम उन्होंने किए हैं, उनके ज़रिये सत्ता में वापसी के लिए ज़ोर लगा रही हैं. नीतीश कुमार द्वारा किए गए काम, उनकी छवि और जातीय समीकरण उनके पक्ष में जाएंगे, जबकि जबरदस्त धनबल और आरएसएस की अ़फवाह फैलाने की शक्ति-काबिलियत आदि एनडीए के पक्ष में काम करेंगे.

आ़िखरकार जीत किसकी होगी, यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन अभी जो लग रहा है, उसके हिसाब से जद (यू)-राजद-कांग्रेस महा-गठबंधन आगे दिख रहा है. पांच नवंबर को जब आ़िखरी चरण के चुनाव हो जाएंगे, तब कुछ अंदाज़ा हो सकता है कि महा-गठबंधन कैसा प्रदर्शन करता है. जहां तक भाषण की विषय-वस्तु का सवाल है, तो प्रधानमंत्री को यह शोभा नहीं देता कि वह इतने अधिक आक्रामक होकर लालू यादव पर व्यक्तिगत हमले करें. अगर भाजपा का कोई दूसरा नेता ऐसा करता, तो कोई खास बात नहीं होती, लेकिन प्रधानमंत्री को खुद को इस तरह के व्यक्तिगत हमलों से अलग रखना चाहिए.

ज़ाहिर है, बिहार चुनाव कोई भी जीते, वह प्रधानमंत्री बने रहेंगे और उन्हें जीतने वाले के साथ मिलकर काम करना पड़ेगा. ट्‌वीटर जोक्स से भरा पड़ा है, जिसमें लोग री-ट्‌वीट कर रहे हैं कि जी न्यूज ही एक ऐसा चैनल है, जिसने अभी तक अपनी वफादारी कायम रखी है. यानी जो सर्वे हैं, वे सब ग़लत हैं. टीवी चैनल अपनी मर्जी की चीजें दिखा रहे हैं. हर कोई यह समझता है कि जी न्यूज एनडीए का पक्ष लेगा और बाकी चैनल उससे अलग होंगे.

यद्यपि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के संदेश के पालन की बात कहकर मामला ठंडा करने की कोशिश की, लेकिन हक़ीकत यह है कि देश के राजनीतिक माहौल को सांप्रदायिक बनाने और उसका ध्रुवीकरण करने की कोशिश हो रही है, जो देश के लिए कतई उचित नहीं है. हर पांच साल में देश एवं राज्यों में चुनाव आएंगे और चले जाएंगे. चुनाव ही सब कुछ नहीं है. चुनाव सबसे बड़ी चीज नहीं है, लेकिन देश सबसे ऊपर है. हमने देश का निर्माण बहुत मुसीबतों के बाद किया है.

1947 से लेकर अब तक हम पाकिस्तान के रास्ते पर नहीं गए. हालांकि, दोनों देशों ने एक साथ अपना स़फर शुरू किया था. और, अब हम सारी उपलब्धियों के बाद, चूंकि आरएसएस ने सत्ता हासिल कर ली है, खुद को तबाह कर लें? वे बेहतर कर सकते हैं, अगर एक छोटा-सा सेल स्थापित करें, संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों एवं अन्य प्रावधानों का अध्ययन करें और खुद के विचारों की उनसे तुलना करें. जहां भी उनकी विचारधारा संविधान से मेल नहीं खाती, उन्हें चाहिए कि वे अपनी विचारधारा को संविधान के हिसाब से ठीक कर लें, क्योंकि संविधान ही सर्वोपरि है.

बेशक, वे संविधान में संशोधन कर सकते हैं, लेकिन यदि उनके पास पर्याप्त संख्या हो तो. फिलहाल उनके पास यह संख्या नहीं है. इसलिए उचित यही होगा कि वे अपने वक्तव्यों के स्वर में नरमी लाएं. और, एक व्यवहारिक समाधान का पता लगाया जाना चाहिए कि आरएसएस जो करना चाहता है, संविधान उसके लिए कितनी अनुमति देता है? मामला अगर इससे आगे बढ़ता है, तो फिर यह न्यायपालिका के पास जाएगा.

न्याय पालिका ऐसे मामलों में उलझना नहीं चाहती, क्योंकि राजनीतिक दल आ़िखरकार राजनीतिक दल हैं और सबकी अपनी-अपनी विचारधारा है. जब तक राजनीतिक दल ज़िम्मेदारी के साथ व्यवहार नहीं करेंगे, तब तक भारतीय लोकतंत्र नहीं चल सकता. कुछ वर्षों के बाद संघर्ष शुरू हो जाएगा और वैसी ताकतें हावी हो जाएंगी, जिनका राजनीति या सिविल सोसायटी से कोई संबंध नहीं होगा, जैसा कि हमारे पड़ोस में हुआ.

बिहार चुनाव असल मुद्दा है. एक महीने से भी कम समय में नतीजे आ जाएंगे. हमें आशा करनी चाहिए कि मतदाता एक स्थिर सरकार चुनेंगे, न कि एक एमएलए इधर से, एक एमएलए उधर से लेकर सरकार बनाने की स्थिति पैदा करेंगे. जब नवंबर में सरकार बनेगी, तो मैं आश्वस्त हूं कि सरकार चाहे जिसकी बने, केंद्र सरकार उसके साथ पूरा सहयोग करेगी और प्रधानमंत्री ने जितने भी वादे किए हैं, उन्हें वह पूरा करेंगे. वह बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, जिन्हें हम अव्यवहारिक भी मान सकते हैं, क्योंकि राज्य अपनी गति से आगे बढ़ेगा.

लेकिन, जो भी करने की ज़रूरत है, वह किया जाना चाहिए. केवल यह कहना कि वहां जंगलराज है, क़ानून-व्यवस्था खराब है, इसका कोई मतलब नहीं है. ये सारी चीजें पीछे छूट चुकी हैं. पिछले दो वर्षों में बिहार में हमने क़ानून-व्यवस्था के खराब होने की कोई बड़ी खबर नहीं सुनी है. नीतीश कुमार के ़िखला़फ भारतीय जनता पार्टी की तऱफ से भी अब तक कोई आरोप नहीं लगा. यह अच्छी बात है. उनके ़िखला़फ स़िर्फ यही आरोप है कि जबसे उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ा है, बिहार में विकास का कोई काम नहीं हुआ है.

न तो यह आरोप सत्यापित किया जा सकता है और न यह सही है. आशा करते हैं कि अगले कुछ हफ्तों का चुनाव प्रचार घटिया नहीं होगा और शालीनता बरकरार रहेगी तथा जो सबसे लोकप्रिय पार्टी हो, वह जीते.

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