लोकेशन ढूंढते निकला हो गया दिमाग़ का दही फौज़िया अर्शी

fauzia arshiआपकी आने वाली फिल्म होग़या दिमाग़ का दही का शीर्षक बड़ा ही रोचक है, इस शीर्षक का चुनाव कैसे हुआ?
जब मैं फिल्म की शूटिंग की लोकेशन की तलाश में हिमाचल प्रदेश गई थी, उस वक्तहिमाचल में बहुत ठंड थी, वहां तूफानी बारिश हो रही थी, जबकि उस वक्त ऐसा नहीं होना था. अचानक से यह सब शुरु हुआ, तो लोकेशन मिलने में बहुत परेशानी आई. हिमाचल प्रदेश इतना खूबसूरत है कि अरे यह भी अच्छा लग रहा है, वह भी अच्छा लग रहा है. इसके साथ एक कन्फयूजन भी था, लेकिन जो एक बात मेरे ज़ेहन में आई कि एक हवेली थी जो फिल्म में दिखाई गई है एक खंडहर हवेली, वह फिल्म में एक कैरेक्टर की तरह खड़ी थी, उस खंडहर हवेली को ढूंढ़ने में बहुत वक्त लग रहा था, कभी यहां जा रहे थे, कभी वहां जा रहे थे और फिर उसके टेढ़े-मेढ़े रास्ते बहुत खूबसूरत भी थे, खैर ऐसे में एक दिन मेरे मुंह से निकला कि यार दिमाग का दही हो गया है लोकेशन ढूढ़ते-ढूढ़ते. वह मैंने कह तो दिया, लेकिन कहते ही मुझे लगा कि अरे यह तो कमाल का टाइटल है. उस वक्त मेरे साथ मेरे तीन साथी भी थे, वो सब भी हंस पड़े और मैनें कहा कि अब हम फिल्म का टाइटल रखेंगे दिमाग का दही और फिर इसे इंप्रोवाइज करते-करते हमने होगया दिमाग का दही टाइटल को फाइनल कर दिया.

यह बतौर निर्देशक आपकी पहली फिल्म है आपने कॉमेडी का ही चुनाव क्यों किया?
मुझे खुश रहना, लोगों को खुश रखना और हंसना अच्छा लगता है. दूसरी तरफ मैं जिस शहर से हूं वह है भोपाल. भोपाल अपनी हाज़िर-जवाबी और अच्छे मज़ाक के लिए मशहूर है. मैं वहीं पढ़ी-लिखी, मैं वहीं रह रही हूं. ऐसे में एक माहौल का असर आपकी पर्सनैलिटी, आपकी बातचीत और आपके तौर-तरीके में आता है, वो सब जिंदगी ने मुझे दिया और मैं उसे आगे लेकर ब़ढ़ी और अपना काम शुरु किया.

जब फिल्म बनाने कि बात आई, तो मुझे लगा कि मेरे सामने बहुत सारी स्क्रिप्ट थीं, कि यह बनाया जाए या वह बनाया जाए. फिल्म के निर्माता संतोष भारतीय हैं, उनसे मैंने डिसकस किया.फिर मैंने उनसे कहा कि सर हम किसी स्क्रिप्ट पर काम शुरू करें, बताइये क्या हो सकता है. कुछ तैयार हो जाए, फिर हमने कहां कि नहीं अब हम कॉमेडी फिल्म ही बनाएंगे, क्योंकि इतने अनुकूल माहौल में भी लंबे समय से कोई अच्छी कॉमेडी फिल्म नहीं आ रही है और द्वइर्थी कॉमेडी फिल्में आ रही हैं.

क़ादर खान इस फिल्म से वापसी कर रहे हैं, उन्हें फिल्म में कास्ट करने के लिए आपको कैसी मशक्कत करनी पड़ी?
पहले तो मुझे लोगों ने डरा दिया कि अरे क़ादर खान जी के पास तो जाना नहीं, वो तो बात करते ही नहीं हैं और वो तो आपको एंटरटेन भी नहीं करेंगे, तो एक-आध दिन तो ऐसे ही गुज़र गया. फिर मैंने सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि कॉमेडी मतलब क़ादर खान. जैसे ही कॉमेडी फिल्म के बारे में सोचा तो कॉमेडी फिल्म बिना क़ादर खान के बन ही नहीं सकती थी. इसके बाद यह जरूर सुना था कि वह शहर में नहीं हैं वह पुणे में रहने लगे हैं.

इसके बाद मालूम हुआ कि वह बीमार चल रहे हैं और किसी से मिलना नहीं चाहते, लेकिन हम एक दिन हिम्मत करके उनके घर पहुंच गए और हमने उनके सेक्रेटरी से कहा कि हमें एक बार कादर खान जी से मिलवा दीजिए, उन्होंने कहा कि वो तो नहीं मिलेेंगे, हमने कहा कि यदि नहीं मिलेंगे, तो हम भाग जाएंगे. लेकिन हमें एक बार मिलावाइए तो सही. खैर उन्होंने कोशिश की और हमने उनसे मुलाकात की, तो क़ादर ख़ान जी से मैंने कहा कि कादर साहब मैं यह फिल्म बनाना चाहती हूं.

कॉमेडी फिल्म है और आपके बिना यह फिल्म मैं नहीं बनाऊंगी और फिल्म में तो आपको काम करना ही पड़ेगा, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और पांच मिनट तक मुझे देखते रहे और कहने लगे कि अच्छा तुम करती क्या हो. मैंने कहा कि मैं फिल्म बनाती हूं. इसके बाद वह कहने लगे कि फिल्म तो बनाती हो, लेकिन उसके अलावा क्या करती हो, क्या किया है तुमने जिंदगी में, तो मैनें कहा कि कादर साहब मैं मैनेजमेंट की प्रोफेसर भी हूं. मैंने काफी सालों तक पढ़ाया लिखाया है, म्यूजीशियन भी हूं अब म्यूजिक और फिल्में ही मेरा शौक है, तो अब मैं यह कर रही हूं.

तो उन्होंने कहा कि फिर कोई बात नहीं है अब आगे बताओ, क्योंकि तुममें और मुझमें एक चीज कॉमन है, मैं इंजीनियरिंग पढ़ाता था, तुम मैनेजमेंट पढ़ाती हो, अब तुम्हारी और हमारी बात बन जाएगी और हम काम करेंगे. एक इतने बड़े राइटर जिन्होंने अमिताभ बच्चन और दूसरे बड़े कलाकारों को बनाया हो अगर वह कहे कि स्क्रिप्ट में दम है डायलाग्स अच्छे हैं, तो कितना विश्वास आता है. कादर ख़ान साहब को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए आपने प्रधानमंत्री जी को पत्र भी लिखा है, फिल्म जगत के किन किन लोगों ने आपके पत्र का समर्थन किया है.

देखा जाए तो इसके लिए पूरी फिल्म इंडस्ट्री खड़ी हो गई इस बात के लिए, बहुत सारे लोगों ने मुझे फोन किया और कहा कि हम क्या मदद कर सकते हैं, बताइये हम इस बात का बिल्कुल सपोर्ट करेंगे कुछ लोगों ने अखबारों में कोट दिया. ऋषि कपूर साहब ने कोट दिया. अमिताभ बच्चन साहब ने ट्‌वीट किया और उनसे अपनी मोहब्बत जताई. जाफरी बड़े राइटर हैं, उन्होंने ने बहुत इनकरेज किया. उन्होंने मुझे उनके ढेरों एचीवमेंट्‌स गिना दिए. उनसे बड़ी मोहब्बत करते हैं ये सभी लोग. इसके अलावा जितेंद्र उन्होंने इस बात का सर्मथन किया है, असरानी, शक्ति कपूर, गोविंदा, अनिल कपूर, सलीम साहब हैं. इन सारे लोगों ने इसका सर्मथन किया.

बॉलीवुड के पांच बड़े कॉमेडियन को एक साथ कास्ट करने का आपका अनुभव कैसा रहा?
अनुभव बहुत ही खूबसूरत और कमाल का, बहुत ही एक्साइटिंग और अनोखा रहा. ये जो पांच लोग हैं उन्हें इकट्‌ठा एक छत के नीचे खड़ा करना और उनसे काम करवालेना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन बहुत मुश्किल भी नहीं था. मुश्किल इसलिए भी नहीं था, क्योंकि मुझे यह मालूम था कि क्या करना है, मुझे स्क्रिप्ट मालूम थी, मैंने उसका पूरा होमवर्क किया हुआ था. मुझे बहुत बारीकी से पता था की फिल्म कैसी दिखेगी, तो परेशानी नहीं हुई और आसान इसलिए लगा, क्योंकि इन लोगों ने मेरे साथ बहुत सहयोग किया.

आप फिल्म की निर्माता है, निर्देशक हैं, संगीतकार हैं और गायिका भी. एक साथ इतनी भूमिकाएं अदा करने में आपको किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा?
मुझे इसमें किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा, क्योंकि ये चारों जो रोल हैं मेरे ये चारों अलग-अलग हैं. यदि आप अपनी सीमाएं बना लें, दायरें बना लें. अगर मैं प्रोड्यूसर हूं और उस वक्त प्रोड्यूसर के दायरे मे हूं, उस पर डायरेक्टर हावी नहीं होता और अगर डायरेक्टर हूं तो उस पर प्रोड्यूसर हावी नहीं होता. यदि म्यूजीशियन हूं, तो उस पर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर दोनों हावी नहीं होते. अगर हमें अपने दायरे पता हों, तो सारे काम असानी से हो जाते हैं. कोई कनफ्यूजन नहीं होता, कोई एक्सीडेंट नहीं होता, तो इतनी भूमिकाएं अदा करना बिल्कुल कठिन नहीं था. बस इतना है कि हिन्दुस्तान में हॉलीवुड की तरह एक्सेप्टेंस जरा मुश्किल है. लोगों को यह हजम नहीं होता कि कोई एक इंसान इतने काम कर सकता है.

वैसे हॉलीवुड में मडोना गाने भी लिखती हैं, ब्रिटनी स्पियर्स गाने भी लिखती हैं, उसपर परफॉर्म भी करती हैं, फिल्म में एक्ट्रेस भी हैं, अपने गाने कंपोज भी करती हैं, गिटार भी बजाती हैं, ड्रम्स भी बजाती हैं प्रोड्‌यूस भी करती हैं. मैं कहती हूं कि राजकपूर एक्टर भी थे डायरेक्टर भी थे, म्यूजीशियन भी थे और फिल्में प्रोडयूस भी करते थे, संजय लीला भंसाली म्यूजीशियन भी थे, डायरेक्टर भी और प्रोडयूसर भी थे, तो ऐसा कुछ नहीं है थोड़ी सी एक्सेप्टेंस की बात होती है. बाकी पहले वाला पोर्शन मैंने आपको बताया कि उसमें कोई चैलेंज नहीं था.

निर्देशन, संगीत और गायन इन तीनो में आपको सबसे ज्यादा क्या पंसद है?
बड़ा अच्छा सवाल है ये. इनमें से मुझे सबसे अच्छा संगीत लगता है. अब आप पूछेंगे कि संगीत ही क्यों अच्छा लगता है. क्योंकि संगीत के माहौल में जब मैं होती हूं, अपने संगीत की धुन में होती हूं, अपने गाने के कंपोजिशन में व्यस्त होती हूं तब सिर्फ मैं होती हूं, और उस वक्त बड़ा ईमानदार माहौल होता है. वहां कोई चालाकी नहीं होती, कोई मैन्यूपुलेशन नहीं होता, इसलिए मुझे म्यजिक सबसे अच्छा लगता है. मैं खुद से मिलती हूं. वहां पर कि मैं एक अच्छी इंसान हूं.

फिल्म के टीजर में फिल्म को नॉन-फैमिल ड्रामा बताया जा रहा है इसका क्या मतलब है?
आप पहले इंसान हैं जिसने हमसे यह सवाल पूछा. इसे कॉमेडी ड्रामा हमने व्यंगात्मक संदर्भ में कहा है. यह एक फैमिली की कहानी नहीं है यह करैक्टर की कहानी है. नहीं तो क्या लोगों को कन्फयूजन हो जाता है कि जहां एक घर है, बाप है उसके लड़के हैं, तो उनकी बहुएं हैं. बट इट्‌स नॉट अबाउट फैमिली इट्‌स अ युनीवर्सल फैक्ट जो इसमें हमने दिखाया है. यह फिल्म कैरेक्टर्स की कहानी है. जिसे पूरी फैमिली जाकर देख सकती है.

इतने सारे कॉमेडियन एक सेट पर होते थे, तो ऐसे में सेट का माहौल कैसा होता था?
बहुत अच्छा सवाल, मैं आपको कमाल की बात बताऊं, देखिए सब सोचते होंगे कि इतने सारे कॉमेडियन हैं, तो सेट पर बहुत हंसी-ठिठोली होती होगी, पर ऐसा कुछ भी नहीं था.

सेट पर उतनी ही देर मस्ती होती है, जितनी देर हम टेक कर रहे हैं, क्योंकि कॉमेडी फिल्म है और हर शॉट में कॉमेडी थी, पंचेज थे मजा था. तो हम इसे बहुत एंजॉय करते थे, लेकिन जैसे ही शॉट खत्म हुआ. जहां शॉट खत्म हुआ, ओमपुरी जी अपनी स्क्रिप्ट लेकर बैठ जाते थे देखने, एक तरफ राजपाल बैठ जाते थे और दूसरी तरफ संजय. सीन कैसे इंप्रोवाइज हो इस पर डिसकशन करने लगते थे.

मतलब ये बहुत ज्यादा गंभीर कलाकार हैं. पर्दे पर ये लोग कॉमेडियन हैं. अन्यथा ये लोग बहुत सिंसियर और बहुत संजीदा लोग हैं. राजपाल आकर कहते थे अरे फौजिया जी देखिए ये सीन अपना ऐसा है मैं इसे ऐसे करके बताऊं. ओमजी इतने बड़े कलाकार हैं, लेकिन वह एक नए डायरेक्टर के साथ भी उसी तरह व्यहार कर रहे थे जैसे कि बहुत बड़े और पुराने डायरेक्टर के साथ व्यवहार करते हैं.

इस फिल्म में ओमपुरी का जो किरदार है मिर्जा किशन सिंह जोसेफ, इसका क्या रहस्य है और क्या इसमें कोई संदेश भी छिपा है?
ये हम आपको नहीं बताएगें यह आपको 16 अक्टूबर को ही पता चलेगा.