हास्यास्पद विरोध, लचर दलील

Narendra-Modiभोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन खत्म हो गया. इस तरह के सम्मेलनों की सार्थकता को लेकर पिछले हफ्ते भर से सवाल खड़े किए जा रहे हैं. एक खास वर्ग और खास विचारधारा के लेखकों के द्वारा. इन सवालों को विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह के कथित बयान ने और हवा दे दी. खबरों के मुताबिक वीके सिंह ने कहा था कि इस बार का सम्मेलन पूर्व के सम्मेलनों से जुदा है. पहले साहित्यकार लोग आते थे, खाते-पीते थे और पर्चा पढ़कर चले जाते थे.

उनके मुताबिक इस बार भाषा पर बात होनी थी साहित्य और साहित्यकारों पर कम, लिहाज़ा उनको नहीं बुलाया गया. बाद में उन्होंने अपने इस बयान का खंडन करते हुए मीडिया पर उसको तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप जड़ दिया. खैर चाहे जो भी हो लेकिन जनरल वीके सिंह के उक्त बयान के बाद विश्व हिंदी सम्मेलन को लेकर विरोध तेज हो गया था, खासकर सोशल मीडिया आदि पर सक्रिय लेखकों ने छाती कूटनी आरंभ कर दी थी.

विरोध में मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी गईं, इस तरह की शब्दावलियों का प्रयोग किया जैसी शब्दावलियां इस्तेमाल करने के पहले जाहिलों और अनपढ़ों को भी हिचक होती है. फेसबुक पर भक्तों से भाषा की मर्यादा की अपेक्षा करनेवालों ने मर्यादा तार-तार कर दी. दरअसल यह एक पुरानी कहावत है कि अगर किसी का चौबीसों घंटे विरोध करोगे तो उसके बहुत सारे गुण-अवगुण तुम्हारे अंदर भी आ जाएंगे. भक्तों के विरोधियों के साथ भी यही हुआ. वो वैसी ही भाषा बोलने-लिखने लग गए.

इस बार अगर सरकार ने तय किया था कि विश्व हिंदी सम्मेलन में साहित्य पर कम भाषा पर ज्यादा बात होगी तो इसमें गलत क्या था? भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए तकनीक से जुड़ने पर विमर्श होने में बुराई क्या है? दरअसल ललबबुआओं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उद्धाटन सत्र को संबोधित करने से दिक्कत थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निजी हमले हुए. उनकी कविताओं को लेकर तंज कसे गए.

यह सब सही है लेकिन यहां पर आग्रह सिर्फ इतना है कि किसी भी विरोध के पहले इतिहास बोध का ज्ञान होना आवश्यक है,अन्यथा विरोध खोखला लगता है या फिर वो व्यक्तिगत कुंठा की अभिव्यक्ति मात्र होकर रह जाती है. विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन को लेकर हो-हल्ला मचानेवालों को यह याद दिलाना जरूरी है कि जब पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में हुआ था तब उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को 10 जनवरी 1975 को संबोधित किया था.

इस बात का या तो मोदी का विरोध करनेवालों को ज्ञान नहीं है या फिर वो सुविधानुसार भुला देने का खेल खेल रहे हैं. दोनों ही स्थिति चिंताजनक है. अज्ञानता तो फिर भी कम ़खतरनाक है लेकिन अगर जानबूझकर लोगों को भरमाने के लिए तथ्य छिपाए जा रहे हैं तो यह अपेक्षाकृत ज्यादा खतरनाक है. दरअसल एक खास विचारधारा के लोगों कि यह खूबी है जिसमें वो तथ्यों को छिपाकर विरोध का खेल खेलते हैं. अश्वत्थामा हतो नरो के बाद शंख बजाकर द्रोणाचार्य पर हमला करने की नीति का अनुसरण करते हैं. उन्हें यह याद रखना चाहिए कि धर्मराज युधिष्ठिर के दामन पर सिर्फ वही एक दाग है.

विश्व हिंदी सम्मेलन के विरोधियों के पेट में इस बात को लेकर भी दर्द हो रहा है कि अमिताभ बच्चन को क्यों बुलाया गया? ये तो अच्छा हुआ कि अमिताभ बच्चन के दांत दर्द ने उनके विरोधियों के पेट दर्द को ठीक कर दिया. अमिताभ बच्चन को विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन में एक सत्र में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था. अंतिम समय में उनकी तबीयत ़खराब होने की वजह से वो नहीं आ पाए. तबतक उनपर आरोपों की बौछार शुरू हो गई थी.

ये कहा गया कि उनका हिंदी से क्या लेना देना? पिता की कविताओं को महफिलों में पढ़कर पैसे कमाने से लेकर भांड आदि तक कहा गया. सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय एक अध्यापक-लेखक ने कहा कि-हिंदी साहित्य में अभिनेता अमिताभ बच्चन के योगदान के बारे में गूगल से लेकर राष्ट्रीय पुस्तकालय तक पर कहीं कोई रचना नहीं मिलेगी. इसके बावजूद उनको मोदी सरकार ने दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन सत्र में आमंत्रित किया है.

यह संकेत है कि मोदी जी की निष्ठा साहित्य में नहीं मुंबईया सिनेमा में है. अब इतने विद्वान लेखक को क्या बताया जाए कि ये विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन नहीं था. मैं यह मानकर चलता हूं कि उनको इतना तो ज्ञान होगा ही कि साहित्य और भाषा में थोड़ा फर्क तो है. रही बात अमिताभ बच्चन के हिंदी साहित्य में योगदान की. ना तो अमिताभ बच्चन ने और ना ही इस वक्त की सरकार ने कभी ये दावा कि बच्चन साहब बड़े साहित्यकार हैं, पर हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर अमिताभ के प्रयास सराहनीय हैं.

अमिताभ बच्चन का विरोध करनेवालों को मालूम होना चाहिए कि अमिताभ बच्चन अब भी देवनागरी में ही फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ते हैं, जिसका चलन बॉलीवुड में अब खत्म हो गया है. सारी हिंदी फिल्मों के डॉयलॉग रोमन में लिखे जाते हैं और अभिनेता और अभिनेत्री उसको ही पढ़ते हैं. ऐसे माहौल में अमिताभ बच्चन का देवनागरी को अहमियत देना काबिले तारीफ है. दरअसल अमिताभ बच्चन को जिस सत्र में बोलना था उसका विषय था-अच्छी हिंदी कैसे बोलें.

आज अमिताभ बच्चन के उच्चारण और कठिन से कठिन हिंदी शब्दों को सहजता के साथ बोलकर लोकप्रिय बना देने की कला का कोई सानी नहीं है. कौन बनेगा करोड़पति में उन्होंने हिंदी के उन लुप्तप्राय शब्दों को संजीवनी दे दी जिसका प्रयोग तो अब हिंदी के साहित्यकार भी नहीं करते हैं. पंचकोटि जैसा शब्द एक बार फिर से चलन में आ गया. अमिताभ बच्चन के विरोध को देखकर जोहानिसबर्ग में हुए नवें विश्व हिंदी सम्मेलन में मॉरीशस के कला और संस्कृति मंत्री मुकेश्वर चुन्नी का भाषण याद आ गया. मॉरीशस के कला और संस्कृति मंत्री मुकेश्वर चुन्नी ने ये माना था कि हिंदी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड फिल्में और टीवी पर चलने वाले सीरियल्स का बहुत बड़ा योगदान है.

उन्होंने इस बात को स्वीकार किया था कि उनकी जो भी हिंदी है वो सिर्फ हिंदी फिल्मों और टीवी सीरियल्स की बदौलत है. जब वो हिंदी में बोल रहे थे तो उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी जबरदस्त था, भारतीय राजनेताओं की तरह जबरदस्ती ओढ़े हुए गंभीरता के आवरण से एकदम अलग. चुन्नी ने अपने भाषण में कहा कि वो किसी और कार्यक्रम के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर थे और उन्हें विश्व हिंदी सम्मेलन में आना पड़ा.

इस वजह से उनके अधिकारियों को उनका भाषण तैयार करने का मौका नहीं मिला पाया, लिहाज़ा वो हिंदी में बगैर किसी नोट्स के बोले थे. चुन्नी ने फिल्मों और टेलीविजन सीरियल्स की जमकर तारीफ की और कहा कि हिंदी के फैलाव में सबसे ज्यादा योगदान उनका ही है. जोहानिसबर्ग में तीन दिन तक कई अहिंदी भाषी लोगों से बातचीत के बाद मुझे भी यह लगा था कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में फिल्मों का बहुत योगदान है. दरअसल फिल्मी कलाकारों को लेकर हिंदी के वामपंथी लेखक कभी संजीदा नहीं रहे.

फिल्म वालों को बुर्जुआ संस्कृति का शोषक मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती रही. हिंदी फिल्मों के बड़े से बड़े गीतकार को हिंदी का कवि नहीं माना गया जबकि विचारधारा का झंडा उठाकर घूमनेवाले औसत कवियों को महान घोषित कर दिया गया. ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मान समारोह में भी अमिताभ बच्चन को बुलाने को लेकर विरोध हुआ था लेकिन तब भी हिंदी समाज ने चंद लेखकों के विरोध को खारिज कर दिया था, अहमियत नहीं दी थी.

विश्व हिंदी सम्मेलन का विरोध करनेवाले इन्हीं छोटी चीजों में उलझकर रह गए. इस बात पर सवाल खड़े होने चाहिए कि सत्रों के वक्ताओं का चयन किस आधार पर हुआ. उन वक्ताओं की क्या विशेषता रही है. सवाल इस बात पर खड़े किए जाने चाहिए कि पिछले नौ सम्मेलनों में जो प्रस्ताव पारित किए गए थे उनका क्या हुआ. हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए सरकार की तरफ से क्या प्रयास किए जा रहे हैं. हिंदी के युनिवर्सल फांट आदि को लेकर सरकार क्या कर रही है.

दरअसल तथ्यों के आधार पर विरोध करने के लिए मेहनत की आवश्यकता है, गंभीर सवालों से मुठभेड़ के लिए गंभीरता से अध्ययन की भी आवश्यकता होती है. फेसबुक आदि पर जिस तरह से अभिव्यक्ति की आजादी की अराजकता है उसमें तो बगैर तथ्यों के सिर्फ हवाबाजी के आधार पर विरोध होता है जिसका कोई अर्थ नहीं होता है बल्कि उस तरह का विरोध हास्यास्पद हो जाता है. और विरोध जब हास्यास्पद होते हैं तो विरोध करनेवाले हास्य के पात्र बन जाते हैं. आग्रह यही है कि खुद को हास्यास्पद ना बनाएं.

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