लालू का बैकवर्ड-फॉरवर्ड राग फिर सुशासन का क्या होगा

यदुवंशियों सावधान! अपने वोट को छितराने नहीं देना. भाजपा वाला यादव के वोट को बांटने का सब उपाय कर दिया. यादव को कमज़ोर करना चाहता है. अरे, जब यादव को भैंस कमज़ोर नहीं कर सका, तो इस सब (भाजपाई) क्या है? जाग जाओ. दलाल को पहचानो. कमंडल के फोड़ देवे ला हऊ. यह लड़ाई बैकवर्ड-फॉरवर्ड की है. लालू प्रसाद ने अपने बेटे तेजस्वी यादव के चुनाव क्षेत्र राघोपुर से जब चुनाव अभियान की शुरुआत की, तो उनके इन बोलों ने बिहार चुनाव में
महा-गठबंधन के एजेंडे को ही बदल कर रख दिया. क्या वास्तव में बिहार में इस बार लड़ाई बैकवर्ड-फॉरवर्ड की है या फिर लालू यादव चुनाव को इस ओर ले जाना चाह रहे हैं?
ज़ाहिर है, लालू यादव ने जब बैकवर्ड-फॉरवर्ड का राग छेड़ा है, तो उसके पीछे उनकी कोई न कोई चुनावी नीति ज़रूर होगी. लालू प्रसाद ने एक तीर चलाया, जो निशाने पर भी जाकर लग गया. भाजपा को यह अच्छी तरह एहसास है कि लालू अगर पूरे चुनाव को बैकवर्ड-फॉरवर्ड की राह पर ले गए, तो एनडीए की चुनावी संभावनाओं पर ग्रहण लग सकता है. लालू प्रसाद 1990 के अपने प्रयोग को दोहराना चाह रहे हैं, क्योंकि बैकवर्ड-फॉरवर्ड के मूलमंत्र ने ही लालू को सत्ता का रास्ता दिखाया. लालू अपनी हर सभा में बैकवर्ड-फॉरवर्ड और आरक्षण की बात कहना नहीं भूल रहे हैं. वह कहते हैं, मुझे फांसी चढ़ा दो, पर मैं आरक्षण में कोई छेड़छाड़ नहीं होने दूंगा. लालू इस बात को समझ रहे हैं कि वह सूबे की सत्ता से बाहर रहे हैं, इसलिए अपनी किसी उपलब्धि को गिनाना संभव नहीं है. लालू प्रसाद इस बात का ख्याल रख रहे हैं कि
उनकी किसी बात से कहीं नीतीश कुमार को ज़्यादा ़फायदा न हो जाए.
लालू को बैकवर्ड-फॉरवर्ड एक ऐसी दवा नज़र आ रही है, जो उनकी सभी कमज़ोरियों को ठीक कर देगी. यही वजह है कि अपने सहयोगी दलों की नाराज़गी झेल कर भी लालू प्रसाद बैकवर्ड-फॉरवर्ड का राग अलाप रहे हैं. जानकार बताते हैं कि लालू के इस चुनाव प्रचार से कांग्रेस को काफी परेशानी हो रही है, क्योंकि उसके वोटरों में सवर्ण भी शामिल हैं. पटना के गांधी मैदान में उलझन झेल लेने के बाद पार्टी अब नहीं चाहती कि लालू प्रसाद के साथ कोई मंच साझा किया जाए. इसलिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी के चुनावी दौरे से लालू प्रसाद को दूर रखा गया है. दूसरी तऱफ जदयू के रणनीतिकार यह सोचकर चिंतित हो रहे हैं कि अगर लालू प्रसाद इसी तरह बैकवर्ड-फॉरवर्ड और आरक्षण की बात करते रहे, तो फिर नीतीश के विकास और सुशासन के एजेंडे का क्या होगा? जदयू यह मान रहा है कि दोनों चीजें साथ नहीं चल सकती हैं. नीतीश कुमार एक विकसित बिहार का वादा कर रहे हैं, तो दूसरी तऱफ लालू प्रसाद जाति-पांत से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं. इसलिए तारतम्य के अभाव में वोटरों के पास सही संदेश नहीं जा पा रहा है. महा-गठबंधन की ताकत कहीं न कहीं इस तरह के विरोेधाभासों से कमज़ोर हो रही है.
बताया जाता है कि अगले चरण के मतदान के पहले नीतीश कुमार इस मसले पर लालू प्रसाद से वन टू वन बात भी कर सकते हैं. नीतीश कुुुुुमार अपने सभी भाषणों में कह रहे हैं कि उन्होंने तो बिहार में परिवर्तन करके दिखा दिया. अब कौन-से परिवर्तन की ज़रूरत है? भाजपा बेवजह बिहार में परिवर्तन की बात कह रही है. सूबे की जनता इस बार भाजपा के झांसे में आने वाली नहीं है. नीतीश कुमार का सारा फोकस विकास पर है, पर कुछ समय वह भाजपा की आलोचना पर भी दे रहे हैं. नरेंद्र मोदी और अमित शाह उनके निशाने पर हैं. नीतीश कुमार कहते हैं कि लोकतंत्र में तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं होती. उनकी लड़ाई बिहार के स्वाभिमान के लिए है, जो जारी रहेगी. नीतीश यह अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि सुशासन और विकास ही उनकी ताकत है और उसे वह किसी भी हाल में कमज़ोर नहीं होने देना चाहते हैं. जातीय ताकत में नीतीश कुमार लालू के सामने कहीं नहीं टिकते हैं, इसलिए उनका पूरा दारोमदार अपने सुशासन और विकास के एजेंडे पर ही निर्भर करता है. लेकिन, लालू प्रसाद जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, उससे नीतीश कुछ असहज महसूस कर रहे हैं.
जहां तक भाजपा का सवाल है, तो उसके निशाने पर प्रमुखता से लालू प्रसाद हैं. भाजपा अपने 2005 के प्रयोग को ही दोहराना चाहती है यानी जंगलराज. यही वजह है कि भाजपा के सभी बड़े-छोटे नेता चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि लालू को वोट देने का सीधा मतलब है जंगलराज की वापसी. उधर जबसे लालू ने बैकवर्ड-फारवर्ड की लड़ाई की बात की है, भाजपा ने कुछ देर सेे ही सही, लेकिन काफी मजबूती से उसका प्रतिकार करना शुरू कर दिया है. बताया जा रहा है कि अमित शाह ने इस बात को लेकर भाजपा के सभी बड़े नेताओं की क्लास लगाई कि आ़िखर लालू के इस जातीय बयान का जवाब देने में देरी क्यों की गई? अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि इस मामले में अमित शाह ने सुशील मोदी तक को नहीं बख्शा. इसके ठीक अगले दिन बेगूसराय के कार्यकर्ता सम्मेलन में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि भाजपा आरक्षण में किसी भी तरह के छेड़छाड़ के पक्ष में नहीं है. अमित शाह ने कहा, लालू प्रसाद झूठ के आंसू बहा रहे हैं. मैं देश की जनता को आश्वस्त कर रहा हूं कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में कोई फेरबदल नहीं होगा. अमित शाह की इस लाइन के बाद अब भाजपा के सभी नेता उन्हीं की तरह बोल रहे हैं.
नीतीश कुमार को लेकर भाजपा की तल्खी कम है और सारा फोकस लालू प्रसाद पर किया जा रहा है. भाजपा की रणनीति बहुत सा़फ है. विकास का नंबर पहला और लालू प्रसाद के बयानों-आरोपों का मुंंहतोड़ जवाब. भाजपा यह समझ रही है कि उसकी असली लड़ाई लालू प्रसाद से है. इसलिए बिना कोई मा़ैका गंवाए ताबड़तोड़ हमला किया जाए. जहां तक भाजपा के सहयोगी दलों की बात है, तो राम विलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा भी क़रीब-क़रीब भाजपा की लाइन पर ही बोल रहे हैं. लालू प्रसाद पर हमला उनका पहला टास्क है और उसके बाद विकास का सपना ये दोनों नेता बिहार की जनता को दिखा रहे हैं. पप्पू यादव अपनी सभाओं में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार, दोनों पर ही जमकर हमला कर रहे हैं. देखा जाए, तो चुनावी समर में इस वक्त सभी अपनी-अपनी लाइन पर ही चल रहे हैं और इसी लिहाज से उन्हें जनता का रिस्पांस भी मिल रहा है.