पैसा हड़पने के लिए फर्जी मुक़दमा

Nira-Radiaराव धीरज सिंह जेल कैसे पहुंचे-2

चार अप्रैल, 2003 को राव धीरज सिंह के चचेरे भाई (कजन) चेतन, जो करण के साथ रह रहा था, ने सिंह से कहा कि नीरा और करुणा उनसे अपने फार्म हाउस पर मिलना चाहती हैं, लेकिन सिंह ने मिलने से मना कर दिया. वह दोबारा करण से मिलना नहीं चाहते थे. इसके बजाय सिंह ने उन सभी लोगों को अपने घर पर आमंत्रित किया, लेकिन करण के बिना. मतलब वह करण से दोबारा किसी भी क़ीमत पर मिलने के लिए तैयार नहीं थे. अगले दिन सुबह साढ़े पांच बजे सिंह के घर की डोरबेल बजी. जब उन्होंने दरवाजा खोला, तो सामने चार व्यक्तियों को देखा.

उनके साथ चेतन भी था. उनमें से एक व्यक्ति ने दिल्ली पुलिस का कार्ड दिखाया और खुद को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच का इंस्पेक्टर बख्शी बताया. उस पुलिस अधिकारी ने बताया कि उन्हें करण से एक शिकायत मिली है कि सिंह ने उसके साथ मारपीट की है. इसलिए सिंह को उनके साथ पुलिस स्टेशन जाना होगा और जांच में सहयोग करना होगा.

आरके पुरम क्राइम ब्रांच पहुंचने के बाद राव धीरज सिंह ने देखा कि वहां शैलेंद्र सिंह की कार खड़ी है. पुलिस सिंह को एक कमरे में ले गई, जहां शैलेंद्र सिंह दो पुलिस वालों के साथ बैठा हुआ था और सिंह का इंतज़ार कर रहा था. दो घंटे लंबी पूछताछ के बाद पुलिस वाले सिंह को दूसरे कमरे में ले गए, जहां नीरा, करुणा और करण बैठे हुए थे. करुणा ने सिंह से कहा कि वे लोग इस बात को भूल जाना चाहते हैं, अगर सिंह समझौते के लिए तैयार हो जाएं. सिंह को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह के सेटलमेंट की बात ये लोग कर रहे हैं, आखिर उसे क्यों परेशान किया जा रहा है और वह भी तब, जबकि उसने नीरा के कहने पर करण को समझाने की कोशिश की थी?

करुणा ने सेटलमेंट शब्द का इस्तेमाल किया था. इसका मतलब था कि सिंह वे सारी फाइलें नीरा को सुपुर्द कर दें, जो एक साथ काम करने के दौरान सिंह के पास रह गई थीं. असल में सिंह के पास उन सभी कामों के कान्ट्रैक्ट पेपर्स थे, जो उन्होंने साथ किए थे. इसके अलावा करुणा ने यह भी कहा कि सिंह उन सारे लंबित भुगतानों को भूल जाएं, जो उन्हें नीरा से लेने हैं. सिंह बिल्कुल भौचक्के रह गए, लेकिन वह डिगे नहीं.

नीरा और करण जब जाने लगे, तो अंतिम बात उन्होंने यह कही कि अब इस केस में भुगतो. इस पूरी घटना के दौरान एक पुलिस वाला सिंह के हाथ बांधे रहा. पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की. पुलिस वालों ने सिंह के ऑफिस की तलाशी ली और वे कार्टून भर-भर के पेपर्स ले गए. 28 अप्रैल, 2003 को सिंह को जेल भेज दिया गया. उन पर करण का अपहरण करके उसकी मां से फिरौती लेने की आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया गया.

यह केस सेक्शन 364-ए, 365, 307, 120-बी/34 आईपीसी के तहत दर्ज किया गया, जिसके आधार पर सिंह क़रीब डेढ़ साल तक जेल में रहे और जमानत दिलाने में मेरी मदद के बाद वह रिहा हो सके. नीरा के प्रतिशोध का यह चरम था. उसने इसमें अपनी तमाम राजनीतिक, सामाजिक एवं व्यवसायिक ताकत और संपर्क का इस्तेमाल किया.

क्योंकि सिंह सब जानते थे
सिंह, जो नीरा के सबसे क़रीबी सहयोगी थे, उनके साथ नीरा ने ऐसा क्यों किया? क्यों उसने अपने परिवार के साथ मिलकर सिंह के खिलाफ  एक झूठा म़ुकदमा किया? कई बार उसने सिंह को अपने पति के तौर पर पेश किया था, उसकी पत्नी बनकर दस्ताव़ेजों पर हस्ताक्षर किए थे. फिर ऐसा क्यों हुआ? असल में नीरा सिंह को सबक सिखाना चाहती थी. दोनों में मतभेद थे. वजह, 1990 से 2003 के बीच जो भी डील दोनों ने मिलकर कराईं, उनमें से सिंह अपना हिस्सा मांग रहे थे. यह मांग ग़लत नहीं थी. सिंह अपना हक़ मांग रहे थे.

लेकिन, नीरा की ज़िंदगी में मानवीय संबंधों से अधिक पैसे का महत्व था. यह उसने कई बार साबित किया था. मैं यहां कुछ ऐसे बिंदुओं की चर्चा करूंगा, जो बताएंगे कि आ़िखर दोनों अलग क्यों हुए? दोनों के बीच ऐसी नौबत क्यों आई?

1– राडिया की अनंत कुमार के साथ हुई डीलिंग में सिंह को अलग रखा गया. यह पर्सनल और सीक्रेट डील थी.
2– नीरा सहारा एयरलाइंस के वरिष्ठ स्टाफर्स को तोड़ने की कोशिश कर रही थी. सिंह उसके खिलाफ  थे. सिंह मानते थे कि यह काम ठीक नहीं होगा, क्योंकि सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय ने हमेशा उनकी मदद की और खासकर तब, जब नीरा और सिंह का काम सही नहीं चल रहा था.
3- नीरा को अनंत कुमार से कैबिनेट मीटिंग के विवरण और अन्य निर्णय पहले ही मिल जाते थे और वह उन्हें बेचती थी. सिंह ने इसका विरोध किया था. नीरा ऐसे पेपर्स इच्छुक पार्टियों को दिखाकर डील के लिए तैयार करती थी या फिर विदेशी कंपनियों को दिखाकर यह जताती थी कि उसकी सरकार में कितनी पहुंच है.
4- सिंह को संदेह तो था, लेकिन वर्ष 2000 में यह यकीन हो गया कि नीरा और अनंत कुमार के संबंध घनिष्ठ हो चुके हैं. भावनात्मक रूप से नीरा अब सिंह से दूरी बनाने लगी थी.
5- सिंह ने अपनी बिजनेस डीलिंग नीरा से अलग करने का ़फैसला किया. सिंह ने नीरा के उस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया था कि वह नाम के लिए उससे शादी कर लें, ताकि नीरा दुनिया को और खासकर, तेजस्विनी (अनंत कुमार की पत्नी) को दिखा सके कि वह एक शादीशुदा महिला है और अनंत कुमार में उसकी दिलचस्पी स़िर्फ प्रोफेशनल कारणों से है.
6-मार्च, 2002 में सिंह ने गगन नामक महिला से शादी कर ली. नीरा ने झूठा ही सही, लेकिन खुद को सिंह की दोस्त दिखाते रहने की कोशिश की. उसने सिंह और उनकी पत्नी को अपने घर पर पार्टी में भी बुलाया. सिंह के ज़ोर देने पर नीरा ने उन्हें उनके हिस्से के बिजनेस शेयर देने का ़फैसला किया. यह पैसा चार किस्तों में देना तय हुआ था.
7- लेेकिन सिंह पहली किस्त मिलने से पहले ही तिहाड़ पहुंच चुके थे.

जारी…
(मशहूर वकील आर. के. आनंद क्लोज एनकाउंटर्स विद नीरा राडिया के लेखक हैं.)