हो गया दिमाग़ का दही यह फिल्म हमें क्यों देखनी चाहिए

पहले कॉमेडी होती थी, उसमें ऊल-जलूल हरकतें भी होती थीं, लेकिन फूहड़ता का अंश कम रहता था. अगर दादा कोंडके को छोड़ दें, जो मराठी फिल्मों में द्वइर्थी संवादों के प्रणेता रहे और जिन्होंने अपनी फिल्मों में द्वइर्थी संवादों को लेकर हास्य पैदा करने की कोशिश की. कम से कम हिंदी में ऐसा कोई उदाहरण मुझे दिखाई नहीं देता. पिछले दिनों जितनी हास्य फिल्में हिंदी में आईं, वे सब द्वइर्थी संवादों और भौड़े एक्शन का उदाहरण बन गईं. हास्य फिल्मों में संवाद का कोई स्थान ही नहीं रहा और जिन फिल्मों में रहा भी, उनके संवाद ज़िंदगी से जुड़े हुए कभी नहीं रहे. हास्य फिल्मों में संगीत के ऊपर ध्यान ही नहीं दिया जाता. कुछ भी आयं-बायं-शायं बना दो, वह हास्य फिल्मों में चल जाता है, ऐसा कहा जाने लगा.

16 अक्टूबर को दर्शकों के सामने आने वाली फिल्म होगया दिमाग का दही बिल्कुल विपरीत उदाहरण है. कैसे एक स्वस्थ, मनोरंजक, हेल्दी कॉमेडी, फैमिली कॉमेडी फिल्म बनाई जा सकती है, इसका अगर कोई एकमात्र उदाहरण अभी हमारे सामने है, तो वह फिल्म होगया दिमाग का दही है. फिल्म होगया दिमाग का दही उन सारे प्रतिमानों पर खरी उतरती है, जिनकी अभी हम आलोचना कर रहे हैं. इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण कादर खान साहब का दोबारा सिनेमा में आना है. कादर खान साहब ने फिल्मों से तौबा कर ली थी, वह अपने एक तरह के रोल से ऊब गए थे. उन्होंने कहा, मैं तो प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई जैसे निर्देशकों के साथ काम करना चाहता था, पर जब वे दोनों नहीं रहे, तो बाद के निर्देशकों ने फूहड़ता की पराकाष्ठा पार कर ली. मैं पेट के लिए काम करता रहा, लेकिन मेरा मन कभी संतुष्ट नहीं हुआ.

जब उनसे पूछा गया कि आपने फिर फिल्म होगया दिमाग का दही में काम करना क्यों स्वीकार किया? जवाब में उन्होंने कहा, जब मैंने फिल्म की कहानी सुनी, स्क्रिप्ट सुनी, तो मुझे लगा कि फिल्म बनाने वाले शायद मेरे साथ न्याय करें. कादर खान साहब ने फिल्म की निर्देशक ़फौज़िया अर्शी के सामने एक सवाल रखा कि आप मुझे फिल्म के डायलॉग सुनाइए, तब मैं इस फिल्म में काम करने के बारे में हां या ना करूंगा. ़फौज़िया अर्शी ने डायलॉग लिखे और उन्हें जाकर कादर खान साहब को सुनाया. डायलॉग सुनकर कादर खान साहब को लगा कि उन्हें इस फिल्म में काम करना चाहिए और उन्होंने फिल्म में काम किया. इतना ही नहीं, फिल्म की शूटिंग की समाप्ति पर उन्होंने घोषणा की कि वह चाहते हैं कि उनकी बनाई और निर्देशित फिल्म शमा, जिसमें शबाना आज़मी लीड रोल में थीं, उसे डेली मल्टीमीडिया पुर्ननिर्मित करे और उसका निर्देशन ़फौज़िया अर्शी करें. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इतना भरोसा डेली मल्टीमीडिया लिमिटेड और ़फौज़िया अर्शी पर हो गया है कि उनके दिमाग में एक कहानी चल रही है, जिसके ऊपर वह फिल्म बनाना चाहते हैं, उसकी स्क्रिप्ट मैं लिखवाऊंगा और उसका शीर्षक होगा परछाईं. यह दादा और पोती की कहानी है.

कादर खान साहब का इस फिल्म में काम करना, बल्कि यह विश्वास दिलाना कि डेली मल्टीमीडिया लिमिटेड प्रकाश मेहरा एवं मनमोहन देसाई जैसे निर्देशकों की सोच और समझ को आगे बढ़ा सकता है, डेली मल्टीमीडिया के लिए एक बड़े गर्व का विषय बन गया. कादर खान साहब ने फिल्म में काम किया और उनके साथ इस फिल्म में ओम पुरी, राजपाल यादव, संजय मिश्रा, रज्जाक खान, चित्राशी रावत जैसे लोग हैं. इसमें तीन नए लड़के भी हैं, जिनकी यह पहली फिल्म है, अमित जे, दानिश भट्ट और बंटी चोपड़ा. इसमें तीन लड़कियां हैं, जिनमें चक दे इंडिया की सबको याद रहने वाली लड़की, जिसने चक दे इंडिया में हरियाणवी लड़की का रोल निभाया था यानी कोमल चौटाला, वह इस फिल्म में अपने पूरे ग्लैमरस अवतार में है, जिसका असली नाम चित्राशी रावत है. इसके अलावा इस फिल्म में भावना चौहान और नेहा कराद भी हैं.
यह फिल्म पांच बड़े कॉमेडियंस का गुलदस्ता है. फिल्म बनाने वाले कह रहे हैं कि यह फाइव ग्रेट कॉमेडियंस ऑफ द सेंचुरी का पहली बार पर्दे पर पदार्पण है. ओम पुरी साहब, राजपाल यादव, संजय मिश्रा, सुभाष यादव, रज्ज़ाक खान के साथ इस फिल्म में मराठी फिल्मों के मशहूर हास्य अभिनेता विजय पाटकर भी हैं. इस फिल्म के कैरेक्टर्स भी बड़े इंटरेस्टिंग हैं. मिर्जा किशन सिंह जोसफ, मसाला, एडवोकेट आशिक अली डायवोर्स स्पेशलिस्ट, पव्वा और एक अन्य कैरेक्टर है, जो कुत्ता है, जिसे फिल्म में गब्बर नाम दिया गया है. फिल्म की निर्देशक ़फौज़िया अर्शी के मुताबिक, इस फिल्म में एक बड़ी हवेली है, वह भी एक कैरेक्टर है.
दरअसल, यह फिल्म एक ऐसी कहानी है, जो बहुत आसान तरीके से कही गई है. इस कहानी में बाप है, उसके तीन बेटे हैं. फिल्म में एक गाना है, जो बताता है कि कहानी के आसपास कैसी बनावट है, जिसे मीका ने गाया है कि बाप होना पाप…अल्लाह मा़फ करे. हमारे दौर में पैंतालिस साल से बड़े हर शख्स की ऐसी ही कहानी है कि बेटे उनकी बात नहीं मानते, उम्र के अंतर को पीढ़ी गत अंतर बताते हुए अपने बाप को बेवकूफ समझते हैं. और, बाप अपना सिर पीटता है कि मैंने क्यों औलादें पैदा कीं, मैंने कोई पाप किया है शायद. इसे मीका ने बड़े खूबसूरत तरीके से बाप होना पाप…अल्लाह मा़फ करे गाने के रूप में गाया है.
हास्य फिल्मों का सबसे बड़ा सशक्त पक्ष उसके संवाद होने चाहिए और आज यही चीज फिल्मों में नहीं दिखाई देती. होगया दिमाग का दही इस अर्थ में अलग फिल्म है. इस फिल्म का हर संवाद हंसाता है, इस फिल्म का हर संवाद ज़िंदगी से जुड़ा है, इस फिल्म का हर संवाद लोगों के मन में सवाल खड़े करता है, चिंता पैदा करता है और उनका हल भी देता है. उदाहरण के तौर पर ओम पुरी साहब एक संवाद में कहते हैं, भूसे के ढेर पर बैठकर बीड़ी मत पी, खाक हो जाएगा. यह ज़िंदगी से जुड़ा हुआ संवाद है. हमने देखा कि इस फिल्म के सारे संवाद लोगों को हंसाते हैं, उनके चेहरे पर मुस्कान लाते हैं और ज़िंदगी की सच्चाइयों से भी जोड़ते हैं.
फिल्म का संगीत अनूठा है. इस फिल्म में चार गाने हैं, जिनमें पहला गाना कुणाल गांजावाला एवं रितु पाठक ने गाया है, दूसरा गाना मीका सिंह ने गाया है, तीसरा गाना खुद फिल्म की संगीत निर्देशिका ़फौज़िया अर्शी ने गाया है, जिसका मुखड़ा है, कभी तो सुन ग़ौर से…तेरी आवाज़ हूं…मना ले ज़रा प्यार से…ज़रा-सा नाराज़ हूं. हिंदी फिल्मों, विशेषकर हास्य फिल्मों से 100 प्रतिशत मैलोडी गायब हो चुकी है. यू-ट्यूब के ऊपर यह गाना वॉयरल हो चुका है और लोगों को बहुत दिनों के बाद एक मैलोडियस गाना सुनने को मिल रहा है. फिल्म का आ़िखरी सबसे बड़ा हाईलाइट उसकी कव्वाली है. खुद कैलाश खेर का कहना है कि उनकी यह कव्वाली उन्हें अवॉर्ड दिलाएगी. कैलाश खेर ने मौला-मौला गाया है और जिन लोगों ने इस मौला को सुना है, वे मंत्रमुग्ध रह गए और यही संगीत की ताकत है. यह मौला की ताकत है. जो इस गाने को सुनता है, सीधा अपने को ईश्वर से, अल्लाह से, खुदा से, वाहेगुरु से जोड़ लेता है. इस गाने को कई लोगों ने कई बार सुना और हर बार उनके रोंगटे खड़े हो गए. इस कव्वाली में फीमेल आवाज़ खुद ़फौज़िया अर्शी की है, जिन्होंने एक और गाना गाया है. जिन लोगों ने इसे सुना है, वे इसके दीवाने हो गए हैं.
खुद फिल्म के अभिनेता ओम पुरी ने कहा, अगर संभव होता, तो मैं इस कव्वाली को री-शूट कराता और खुद इसकी लिपसिंग यानी इस पर एक्ट करता. मशहूर अभिनेता शाहबाज़ खान ने इस कव्वाली में अपनी आवाज़ दी है और एक मशहूर रेडियो जॉकी माधुरी ने इसमें फीमेल आवाज़ पर एक्शन किए हैं. फिल्म हंसाती है, गुदगुदाती है, मुस्कराने पर विवश कर देती है, सीख भी देती है और संगीत के ज़रिये ईश्वर से जोड़ देती है. इस फिल्म की निर्देशिका ़फौज़िया अर्शी हैं और इस फिल्म का निर्माण डेली मल्टीमीडिया ने किया है. जो तर्क इस फिल्म के बारे में इतना लिखने के लिए मजबूर कर रहा है, वह तर्क है कि यह एक ट्रेंड सेट करने वाली फिल्म है. इस फिल्म में राजपाल यादव ने कमाल का काम किया है. मसाला के रूप में उन्होंने सारे चरित्रों को एक जगह जोड़ा है. संजय मिश्रा ने आशिक अली एडवोकेट डायवोर्स स्पेशलिस्ट के माध्यम से ज़िंदगी में आने वाली तकलीफों से कैसे लड़ा जाए, यह सीख देने की कोशिश की है. फिल्म देखने के बाद महसूस होता है कि तनाव से लड़ने के लिए किस तरह का सिनेमा चाहिए. टेंशन भगाने के लिए किस तरह की कहानी चाहिए, किस तरह का निर्देशन चाहिए और मन को प्रफुल्लित करने के लिए किस तरह का संगीत चाहिए. जब ये सारी चीजें मिल जाएं, तो फिल्म ट्रेंड सेटर हो जाती है और इसमें कोई दो राय नहीं कि होगया दिमाग़ का दही नामक यह फिल्म 16 अक्टूबर को जब पर्दे पर आएगी, तो हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक नया ट्रेंड सेट करेगी. इस फिल्म से लोगों को चार लड़कियों से इश्क फरमाने का संदेश नहीं मिलता, इस फिल्म से लोगों को एक ही लड़की के पीछे चार लोगों के लगे होने और उसे इम्प्रेश करने का संदेश नहीं मिलता. इस फिल्म से यह संदेश मिलता है कि हमारे पिता ने हमारे लिए जो सोचा, वह सही है और मेरा बाप सचमुच में सही आदमी है. बाप को भी आ़िखर में लगता है कि बच्चों का होना पाप नहीं है और बच्चों को भी आसान तरीके से सुधारा जा सकता है. फिल्म देखकर मुस्कान, खुशी, संतुष्टि का भाव दिखाई देता है, इसलिए हम कह सकते हैं कि यह फिल्म फिल्मी दुनिया में एक ऐसा नया ट्रेंड सेट करेगी, जिससे लोगों को ऐसी फिल्में बनाने की प्रेरणा मिलेगी, ताकि समाज में व्याप्त घटियापन, वहशीपन, धोखा देने की वृत्ति, आगे बढ़ने की होड़ में अपने साथी को टांग मारने की वृत्ति रुकेगी और एक स्वस्थ मनोरंजन लोगों को अच्छा संगीत सुनने के लिए प्रेरित करेगा.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.