मोबाइल मे दमकती स्टार्टअप की दुनिया

पिछले दिनों जब मैं अपने मित्र के साथ मुंबई में रात्रि भोज के लिए गया, तो लौटते वक्त काफी रात हो गई थी. रेस्टोरेंट से बाहर निकल कर हम घर जाने के लिए हाथ देकर टैक्सियां रोकने का प्रयास करने लगे, लेकिन कोई भी टैक्सी वाला रुकने के लिए तैयार ही नहीं था. किसी के पास सवारी थी या किसी का उस तऱफ जाने का मन नहीं था. तब मेरे मित्र ने अपना मोबाइल निकाला और उसके एक ऐप का बटन दबाया. कुछ ही क्षणों में न जाने कहां से एक गाड़ी वाला हमारे नज़दीक आकर खड़ा हो गया और गेट खोलकर बोला, सर, मैं उबेर टैक्सी से हूं. फिर उसने ससम्मान पूछा, आपको कहां जाना है? पुराने मित्र से बातें करते हुए समय का पता नहीं चला. उतरते वक्त उसने हमें धन्यवाद बोला और बिना पैसे लिए चला गया. मैं उबैर कंपनी के इस विचार से बहुत प्रभावित हुआ, जिसने यह सोचा, तकनीक के इस्तेमाल से संभव कर दिखाया और एक खाली टैक्सी को ज़रूरतमंद सवारी से मिलाकर पूरी दुनिया में एक नए व्यापार की शुरुआत की. मुझे मलाल हुआ कि मेरे दिमाग में यह विचार क्यों नहीं आया. बहरहाल, अब इस मलाल का ़फायदा नहीं, क्योंकि उबेर की टैक्सी अब पूरे विश्व में दौड़ रही हैं. इस बारे में जानकारी ली, तो पता चला कि यह कंपनी का स्टार्ट-अप है, जो कि आज दुनिया में सबसे बड़ी टैक्सी कंपनी के रूप में उभरा है. वर्तमान में उबेर कंपनी का मूल्यांकन 100 बिलियन डॉलर से ज़्यादा का है. इस सबके पीछे सबसे ज़्यादा ध्यान खींचने वाली ख़ास बात एक विचार ही है.

स्टार्ट-अप एक नए जमाने की परिकल्पना है, जिसमें एक व्यक्ति अपने अनूठे आइडिया को टेक्नोलॉजी से जोड़कर एक नया प्रोडक्ट बनाता है. अनूठापन, नवीनता एवं व्यापारिक समझ से भरा यह आइडिया बहुत ही अच्छा होता है, लेकिन इस आइडिया को अमलीजामा पहनाने के लिए बहुत बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है. तब इस आइडिया का मूल्यांकन होता है और तब कई सारे निवेशक आइडिया की पूंजी में रुपये की पूंजी से निवेश करते हैं. विश्व भर में कई स्टार्ट-अप ऐसे हैं, जिनका मूल्यांकन कई ख़रब रुपये है. भारत में भी हम देखते हैं कि 2007 में सचिन बंसल एवं बिनी बंसल मिलकर एक छोटे-से कमरे से ऑनलाइन पुस्तक विक्रय के लिए एक वेबसाइट की शुरुआत करते हैं. आज उनका मूल्यांकन 11 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है और उसे लोग फ्लिपकार्ट के नाम से जानते हैं. स्टार्ट-अप की संख्या भारत में बढ़ रही है. अभी भारत में स़िर्फ 1,000 स्टार्ट-अप ही अत्यधिक सक्रियता से काम कर रहे हैं, लेकिन एक सर्वे के मुताबिक, वर्ष 2019 तक उनकी संख्या बढ़कर 56,000 होने की उम्मीद है. ई-कॉमर्स, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा एवं वित्तीय निवेश आदि क्षेत्रों में हज़ारों और स्टार्ट-अप आने वाले हैं.

उपयोगकर्ता के प्रोफाइल एवं आचरण के मुताबिक, विज्ञापन सेवाएं प्रदान करने वाली इन-मोबाइल को स़िर्फ आठ साल पहले मोहित सक्सेना, अभय सिंघल, अमित गुप्ता एवं नवीन तिवारी ने एक कमरे से चालू किया था. आज वह ढाई बिलियन डॉलर तक पहुंच चुकी है. मनोरंजन के लिए डील लगाने वाली कंपनी स्नेपडील की स्थापना भी 2010 में हुई थी और आज वह दो बिलियन डॉलर की कंपनी है और ई-कॉमर्स का बाज़ार बनी हुई है. इन सबको पेमेंट गेटवे (भुगतान पथ) से जोड़ने वाली नोएडा की कंपनी पे-टीएम 1.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुकी है. 2010 में अंकित भट्ट एवं भावीश अग्रवाल ओला के नाम से कैब बुकिंग कंपनी खोलते हैं और स़िर्फ पांच सालों में ही उनकी कंपनी एक बिलियन डॉलर की हो जाती है. घर का पुराना सामान खरीदने-बेचने के लिए चालू की गई क्विकर भी एक बिलियन डॉलर तक पहुंच गई है. रियल एस्टेट का ऑनलाइन बाज़ार उपलब्ध कराने वाले राहुल यादव की हाउसिंग डॉट कॉम भी महज तीन-चार सालों में 650 मिलियन डॉलर की कंपनी हो चुकी है.
इस व्यापार की रातोंरात सफलता को देखकर कई लोग स्टार्ट-अप के समुद्र में कूद रहे हैं. हम जानते हैं कि स्टार्ट-अप की सबसे बड़ी पूंजी उसका आइडिया होता है, जिसकी नींव पर स्टार्ट-अप की पूरी इमारत खड़ी होती है. आज लाखों लोग स्टार्ट-अप जैसी चीज चालू करने की इच्छा रखते हैं, लेकिन उनका स्टार्ट-अप का आइडिया उम्दा नहीं होता. वे अपने स्तरहीन आइडिया और पुरानी तकनीक पर स्टार्ट-अप बनाकर सपने देखने लगते हैं. कई बार दावतों में कुछ अनजान लोग भी मुफ्त की दावत का मजा उठा लेते हैं और पूरी दावत का मजा बिगड़ जाता है. इस तरह चलने वाले स्टार्ट-अप के बड़े-बड़े वादे, अवास्तविक मूल्यांकन एवं आइडिया को देखकर पूरे स्टार्ट-अप से विश्वास उठ जाता है. एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है, लेकिन कुछ समय के लिए ही.
भारत में अभी स्टार्ट-अप को बहुत आगे जाना है. आज हमारा देश सातवें स्थान पर है और इजराइल पहले स्थान पर. हमें भारत में इस तरह का माहौल बनाना होगा कि स्टार्ट-अप खोलना बहुत आसान हो. भारत में बंगलुरू, पुणे, दिल्ली-एनसीआर, नवी मुंबई और हैदराबाद आदि स्टार्ट-अप शहरों के रूप में तेजी से उभर रहे हैं. स्टार्ट-अप शहरों का परितंत्र कुछ अलग ही होता है. जब सस्ता और बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल जनशक्ति, ऐसे युवा जो एक से एक नायाब विचारों से ओतप्रोत हों, उन विचारों को अमलीजामा पहनाने वाले डेवलपर्स और उन विचारों को समझ कर पैसा लगाने वाले लोगों की संख्या बहुतायत में होगी, तभी भारत के शहर स्टार्ट-अप के रूप में उभरेंगे. इसके लिए बड़ी तादाद में ऐसे व्यापारियों की ज़रूरत है, जो इन शहरों की संभावनाओं को पुष्पित-पल्लवित कर सकें. भारत सरकार भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्टार्ट-अप को लेकर काफी सकारात्मक रुख अपना रही है. आसान कर क़ानून, ढांचागत सुविधाओं में सुधार, उनके मूल्य में कमी और उचित निवेश से इसे काफी बढ़ावा मिल सकता है.
आज स्वस्थ, टिकाऊ एवं भरोसे से भरे स्टार्ट-अप का भारत और विश्व में बहुत स्कोप है. वह दिन दूर नहीं, जब भारत
स्टार्ट-अप नेशन के रूप में जाना जाएगा. स्टार्ट-अप खोलना कोई एक तरह का काम नहीं है. हमें मोबाइल ऐप ही दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे की मेहनत नहीं. आज भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति है. हमें उस युवा पीढ़ी पर विश्वास करना होगा कि वह इस सपने को पूरा करेगी. यह मुश्किल तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं. तभी नरेंद्र मोदी का स्टार्ट-अप का सपना साकार हो सकेगा.
(लेखक इन्वेस्टमेंट बैंकर एवं जेन एडवाइजर्स के सीईओ हैं.)

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