बिहार विधानसभा चुनाव वाम दलों के अस्तित्व की लड़ाई

इस बार बिहार विधानसभा चुनाव का एक दिलचस्प पहलू यह है कि छह वाम दल गठबंधन करके पहली बार किसी चुनाव में एक साथ उतरे हैं. इस गठबंधन में भाकपा, माकपा, भाकपा (माले), फॉरवर्ड ब्लॉक, आरएसपी और सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया शामिल हैं. यह गठबंधन राज्य की सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का मन बना रहा है.

हालांकि, भाकपा (माले) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य यह मानते हैं कि उनका लक्ष्य भाजपा को हराना है, लेकिन वह यह भी कहते हैं कि लोग नीतीश और लालू से भी नाराज़ हैं. इसलिए जो लोग एनडीए या महा-गठबंधन को वोट नहीं देना चाहते, वे वाम-गठबंधन के उम्मीदवारों को वोट देंगे. गौरतलब है कि इस चुनाव में जहां एक तरफ नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला महा-गठबंधन है जिसमें राजद, जद(यू) और कांग्रेस शामिल हैं, वहीं दूसरी तरफ भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन. जिसमें भाजपा, लोजपा, रालोसपा और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) आदि पार्टियां शामिल हैं.

यह माना जा रहा है की मुख्य मुक़ाबला इन्हीं दो गटबंधनों के बीच है. तीसरा मोर्चा, वाममोर्चा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को खेल बिगाड़ू के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन जहां तक वाम मोर्चे का सवाल है तो दीपांकर भट्टाचार्य इस आशंका को सिरे से ख़ारिज करते हैं. वह कहते हैं कि वामदलों के महा-गठबंधन में शामिल नहीं होने का फायदा भाजपा को नहीं मिलेगा. उनका मानना है कि नीतीश कुमार और भाजपा पिछले 10 वर्षों से सत्ता में रहे हैं और वामपंथी पार्टियां आम जनता के मुद्दों पर राज्य में संघर्ष करती रही हैं. यदि अब वे तथाकथित महा-गठबंधन में केवल भाजपा को रोकने के लिए शामिल हो जायें तो, इससे भाजपा को और अधिक मजबूती मिलेगी.

बहरहाल, यह तो समय ही बतायेगा कि चुनाव में वाममोर्चा किसे नुकसान पहुंचाता है और किसे फायदा. लेकिन सच्चाई यह भी है कि बिहार के कुछ पॉकेट्‌स ऐसे हैं जहां इन दलों का एक आधार मौजूद है. इन्हीं जगहों पर वह महा-गठबंधन और एनडीए को न केवल नुक़सान पहुंचाने की स्थिति में है बल्कि चुनाव जीतने की स्थिति में भी है.

बावजूद इसके राज्य के अधिकांश क्षत्रों में वामपंथी पार्टियां काफी कमजोेर हैं और फ़िलहाल किसी गठबंधन को फायदा या नुक़सान पहुंचाने की स्थिति में नहीं है. यदि बिहार विधान सभा चुनावों में वामपंथी पार्टियों के प्रदर्शन को देखा जाया तो यह आसानी से कहा जा सकता है कि उनके एक साथ आने से किसी की तरह के उलटफेर की उम्मीद, केवल दिल बहलाने का ख्याल ही साबित होगी. पिछले चुनाव में केवल भाकपा एक सीट जीतने में कामयाब हुई थी. अन्य वामदलों का खाता भी नहीं खुल पाया था.

लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है. राज्य में वामपंथ का एक बड़ा आधार था. सोवियत संघ के ज़माने में बेगुसराय के क्षेत्र को पूरब का मास्को और चंपारण को लेनिनग्राद कहा जाता था.यदि पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डाली जाए तो यह साफ़ हो जाएगा कि राज्य में वामपंथ का बड़ा आधार था, लेकिन चुनाव में किसी भी वामपंथी दल को कोई सीट नहीं मिली थी. यहां तक की 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लिए चल रही सहानुभूति लहर में भी वामपंथी पार्टियों को 13 सीटें मिली थीं. लेकिन साल 2000 के आते-आते राज्य में वामदलों का प्रदर्शन बद से बदतर होता चला गया.

अब ऐसी स्थितियां निर्मित हो गई हैं कि उन्हें अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है. वाम दलों के आधार में गिरावट पूरे देश में दर्ज की जा रही है. पश्चिम बंगाल जो कि उनका गढ़ था, वहां से ये ख़बरें आ रही हैं कि वाम दलों के कार्यकर्ता अब भाजपा का दामन थमने लगे हैं. लोकसभा चुनाव में वाम दलों को मिली करारी हार ने उन्हें एक साथ आने और अपनी रणनीति पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया.

ध्यान रहे कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने कहा था कि वाम दलों को केजरीवाल से सीख लेनी चाहिए. वहीं दूसरी तरफ माकपा-भाकपा के जनता दल और राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन ने उन्हें राज्य में तात्कालिक फायदा तो जरूर पहुंचाया लेकिन दोनों दलों के बीच की वैचारिक दूरी ने उन्हें काफी नुकसान पहुंचाया.

राजनीतिक समीक्षक वाम दलों के खस्ताहाल के लिए विपरीत वैचारिक दृष्टिकोण वाली पार्टियों के साथ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर किए गठबंधन को जिम्मेदार ठहराते हैं. हालांकि बिहार चुनाव में महा-गठबंधन के साथ नहीं जाने पर पर यह सवाल भी उठा कि जब पश्चिम बंगाल में स्थानीय निकाय के चुनावों में वाम दल कांग्रेस के साथ एक समन्वय बना सकते हैं तो बिहार में कांग्रेस, जद(यू) और राजद वाले महा-गठबंधन में क्यों शामिल नहीं हो सकते? इस सवाल के जवाब में माकपा के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने कहा कि बिहार में तथाकथित महा-गठबंधन के साथ जाने और कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल में गठबंधन का कोई सवाल ही नहीं है.

बहरहाल, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा कि वाम दलों ने महा-गठबंधन का नुकसान पहुंचाया या एनडीए को फायदा. लेकिन सबसे महतवपूर्ण सवाल यह है कि क्या वामपंथी पार्टियों का यह गठबंधन बिहार के ध्रुवीकृत मुक़ाबले में अपनी खोई हुई ज़मीन हासिल करने में सफल हो पायेगा? हालांकि बिहार की मौजूदा राजनीतक परिस्थिति में ऐसी उम्मीद करना किसी चमत्कार की उम्मीद करने के बराबर है. यदि वामदलों को राज्य में और देश में अपने अस्तित्व को बचाना है तो उसे किसी भी तरह के अवसरवाद से प्रेरित राजनीति से परहेज़ करना चाहिए.