मोदी मैजिक पर एनडीए की नैया

narendra-modiभाजपा के स्टार प्रचारक और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं में उमड़ रही भीड़ को अगर पैमाना मान लिया जाए, तो यह कहने में जरा भी हिचक नहीं होनी चाहिए कि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की नैया पार लगाने की पूरी ज़िम्मेदारी नरेंद्र मोदी के कंधों पर है. बिहारी वोटरों की भारी भीड़ तपती गर्मी में भी नरेंद्र मोदी को सुनने आ रही है और सभा के बाद उनके द्वारा कही गई बातों पर ग़ौर कर रही है.

चूंकि एनडीए अपना चुनाव नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे रखकर ही लड़ रहा है, इसलिए स्वाभाविक है कि सबसे ज़्यादा उम्मीद उन्हीं से है और नरेंद्र मोदी इस मामले में एनडीए को निराश भी नहीं कर रहे हैं. अपनी ताबड़तोड़ रैलियों में नरेंद्र मोदी अब सा़फ कर रहे हैं कि बिहार का चुनाव विकासराज और जंगलराज के बीच है और निर्णय बिहार की महान जनता को करना है. जनता से सवाल-जवाब की शैली में नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में आई भारी भीड़ से पूछते हैं, आपको जंगलराज दोबारा चाहिए कि विकासराज? वह कहते हैं, आप एक निर्णय कीजिए, मैं बिहार के भाग्य को बदल कर रख दूंगा.

नरेंद्र मोदी को यह एहसास है कि बिहार की जंग जीतने के लिए यदुवंशियों का दिल जीतना बेहद ज़रूरी है. इसलिए वह अपनी लगभग सभी सभाओं में स्थानीय मुद्दों का उल्लेख करने के बाद सारा फोकस यदुवंशियों को रिझाने में कर रहे हैं. उनका सीधा-सीधा निशाना लालू प्रसाद पर है. सभा में उमड़ी भीड़ की ओर मुखातिब होते नरेंद्र मोदी कहते हैं, अब लालू प्रसाद की नौटंकी नहीं चलेगी. यह 1990 नहीं है, अब साल 2015 चल रहा है. लालू प्रसाद को बिहार की जनता को यह बताना चाहिए कि देश के क़ानून ने उन्हें चुनाव लड़ने से क्यों रोक दिया.

गुस्से में पता नहीं, वह क्या-क्या खाने की बात कर रहे हैं और बाद में कहते हैं कि मेरे मुंह में शैतान घुस गया. अब यह सोचने की बात है कि करोड़ों लोगों को छोड़कर शैतान ने लालू जी का ही ठिकाना क्यों चुना?

नरेंद्र मोदी को नज़दीक से जानने वाले बताते हैं कि नरेंद्र मोदी की गणित यह कहती है कि अगर यादवों के वोटों में 25 से 30 ़फीसद भी बंटवारा हो गया, तो बिहार में अकेले अपने दम पर भाजपा की सरकार बन सकती है. अगर यह विभाजन ज़्यादा हुआ, तो दो तिहाई बहुमत से भी सरकार बन सकती है. इसलिए अपने भाषणों में नरेंद्र मोदी सबसे अधिक आलोचना लालू प्रसाद की कर रहे हैं और यदुवंशियों को यह भरोसा दिला रहे हैं कि उन्हें सत्ता में सम्मानजनक भागीदारी मिलेगी.

नरेंद्र मोदी बार-बार जंगलराज का ज़िक्र कर रहे हैं. भीड़ से वह पूछते हैं, आपको विकासराज चाहिए या जंगलराज? जंगलराज ने बिहार में बस फिरौती उद्योग लगाया. विकास की जब बात आती है, तो वह कहते हैं, सूबे की सभी सरकारों ने यहां की दो ताकतों की अनदेखी कर दी. पहली ताकत यहां का पानी और दूसरी यहां की जवानी. यही दो ताकतें न केवल बिहार, बल्कि पूरे भारत का भाग्य बदल सकती हैं. बिहार के कुछ इलाकों में इतना पानी है कि जिसके लिए हिंदुस्तान के कई इलाके तरसते हैं. यहां के युवा दूसरे राज्यों का भाग्य बदल रहे हैं. अगर इन दोनों ताकतों का ही बिहार में उपयोग कर लिया जाए, तो बिहार को कहीं दूसरी जगह ताकने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी.

अपनी सभाओं में नरेंद्र मोदी महा-गठबंधन पर निशाना साधने से भी नहीं चूक रहे हैं. वह कहते हैं, लालू, नीतीश और कांग्रेस ने महा-गठबंधन नहीं, बल्कि महा-स्वार्थबंधन बनाया है. कांग्रेस ने बिहार में 35 साल, बड़े भाई लालू ने 15 साल और छोटे भाई नीतीश कुमार ने दस साल राज किया. इन तीनों की वजह से बिहार की तीन पीढ़ियां बर्बाद हो गईं, लेकिन अब यह नहीं होगा. बिहार को बढ़ाना होगा, उसे पढ़ाना होगा.

नरेंद्र मोदी आरोप लगाते हैं कि ये तीनों केवल कुर्सी के लिए एक हुए हैं, इसके अलावा इनका कोई मकसद नहीं है. नरेंद्र मोदी की सभाएं जिन इलाकों में हो रही हैं, वहां तो एनडीए में जोश बढ़ ही रहा है, पर इसका दूसरा फायदा यह हो रहा है कि टीवी और अ़खबारों के माध्यम से पूरे बिहार के लोगों तक उनका संदेश प्रमुखता से पहुंच रहा है. इससे दूसरे इलाकों में भी नरेंद्र मोदी के भाषणों पर बहस छिड़ती जा रही है. नरेंद्र मोदी बिना लाग लपेट अपनी बात कह रहे हैं, जो लोगों को अच्छी तरह समझ में आ रही है.

नरेंद्र मोदी की सभाओं का एक ़फायदा यह भी दिख रहा है कि भाजपा के भीतर जो अंतर्विरोध कई सारी सीटों को लेकर स्थानीय स्तर पर उभर आया था, वह स्वत: खत्म होता जा रहा है. पक्ष हो या विपक्ष, सारी बहस उनके बयानों और सवालों पर आकर सिमटती जा रही है. नरेंद्र मोदी की सभाओं में जिस तरह भीड़ आ रही है, उससे सा़फ है कि उनके प्रति बिहार के लोगों का आकर्षण बरकरार है.

जहां तक महा-गठबंधन का सवाल है, तो लालू प्रसाद स्टार प्रचारक के तौर पर उभरे हैं. उनकी सभाओं में भी अच्छी भीड़ आ रही है और वह भी अपना संदेश बहुत सा़फ शब्दों में देे रहे हैं. लालू अपने माय यानी मुसलमान और यादव समीकरण को ही दुरुस्त करने में पूरी ताकत लगा रहे हैं. लालू यादव को भी एहसास है कि भाजपा की पूरी ताकत यादवों के वोट बांटने में लगी है, इसलिए वह अपनी हर सभा में उन्हें सतर्क कर रहे हैं.

लालू प्रसाद कहते हैं, मंडलराज को फिर से लाना है, तो सभी पिछड़ों को साथ देना होगा. जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है, तो उनके भाषणों में दो बातों पर विशेष ज़ोर रहता है, नरेंद्र मोदी की आलोचना और बिहार का स्वाभिमान. नीतीश कहते हैं, अगर बिहार की जनता मुझे वोट नहीं देगी, तो लूजर वह होगी, मैं नहीं. मेरा तो पूरा फोकस बिहार के विकास पर है और यह आगे भी जारी रहेगा. नीतीश कुमार कहते हैं, मुझे कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है, मैं तो टेस्टेड हूं.

अब अनाप-शनाप वादे करने वाले समझें कि जनता उन पर कैसे भरोसा करेगी? उधर कांग्रेस का प्रचार अभियान बिखरा-बिखरा लग रहा है. सोनिया और राहुल गांधी की सभाओं का बहुत कम असर जनता पर हो रहा है. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि कांग्रेस के प्रत्याशी भी लालू और नीतीश के भरोसे ही चुनावी अखाड़े में अपना भाग्य आजमा रहे हैं. नरेंद्र मोदी, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार तो अपने-अपने खेेेेेेमे के लिए ज़ोर लगा रहे हैं. अब यह जनता को तय करना है कि उसे किसकी बात सबसे ज़्यादा रास आई.