ओवैसी ने कर दी सब की नींद हराम

owaisiबिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से पहले यह आम चर्चा थी कि इस बार राजद, जदयू एवं कांग्रेस के महा-गठबंधन का सीधा मुक़ाबला भाजपा से होगा और इस सीधे म़ुकाबले में यकीनी तौर पर जीत की देवी महा-गठबंधन पर मेहरबान होगी. लेकिन, अचानक ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन के मुखिया ने घोषणा कर दी कि उनकी पार्टी बिहार चुनाव में हिस्सा लेगी, जिससे महा-गठबंधन के नेताओं के होश उड़ गए. वे ओवैसी के बारे में उल्टे-सीधे बयान देने लगे, जिससे लगने लगा कि उनके हार-जीत के खेल में ओवैसी की पार्टी एक बड़ी रुकावट बन गई है.

यूं तो जबसे ओवैसी ने किशनगंज में रैली की थी और उस रैली में जोश-ओ-खरोश के साथ बड़ी तादाद में लोगों ने शिरकत की थी, तभी से कयास लगने लगे थे कि ओवैसी की पार्टी बिहार चुनाव में उतरेगी, लेकिन वह अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं. लिहाजा, उन्हें चुनाव में न उतरने के लिए पूर्व राज्यसभा सदस्य मुहम्मद अदीब ने पत्र लिखा और गुजारिश की कि आप इस चुनाव में अपने उम्मीदवार न उतार कर, सेक्युलर पार्टियों के जो भी उम्मीदवार आपको पसंद हों, उनका समर्थन करके भाजपा के बढ़ते क़दम रोकने में मुसलमानों का असर साबित करें. इसके बाद कांग्रेस प्रवक्ता मीम अफजल ने भी ओवैसी को पत्र लिखा. लेकिन, ओवैसी ने इन पत्रों पर कोई तवज्जो नहीं दी और सीमांचल इलाके में चुनाव लड़ने की घोषणा करके महा-गठबंधन को परेशानी में डाल दिया.

ओवैसी ने सीमांचल का मैदान क्यों चुना, इसका अंदाज़ा भी लगा लीजिए. सीमांचल में चार ज़िले किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार हैं, जिनमें 24 विधानसभा सीटें हैं. आबादी के लिहाज से देखा जाए, तो 2011 की जनगणना के मुताबिक, किशनगंज में 78 प्रतिशत, कटिहार में 43 प्रतिशत, अररिया में 41 प्रतिशत और पूर्णिया में 37 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. इन आंकड़ों के ज़रिये आसानी के साथ अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के साथ-साथ सीमांचल स्वयंभू सेक्युलर पार्टियों का मजबूत किला है. ज़ाहिर है, यदि इस किले में कोई नई सियासी पार्टी सेंध लगाने की कोशिश करेगी, तो उसके सेक्युलर रक्षक उस पर टूट पड़ेंगे.

बिहार विधानसभा के इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि 1990 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल की 21 सीटों पर सेक्युलर पार्टियों ने कब्जा किया था, लेकिन वक्त ग़ुजरने के साथ-साथ सेक्युलर पार्टियों का किरदार बदलता चला गया. 2010 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल की 24 सीटों में से भाजपा ने 13 सीटें हथियाईं, जदयू के खाते में पांच सीटें आईं, कांग्रेस को चार सीटें मिलीं और राजद महज एक सीट पर सिमट गया. ध्यान रहे कि नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और उनके गठबंधन को यह ़फायदा बाकी पार्टियों के अलग-अलग चुनाव लड़ने की वजह से मिला था.

बिहार में कांग्रेस के बाद लालू प्रसाद की पार्टी ने हुकूमत की, उसके बाद नीतीश कुमार एवं भाजपा की मिलीजुली सरकार रही. आज भी नीतीश कुमार ही बिहार के हुक्मरां हैं, लेकिन सीमांचल की किस्मत नहीं बनी. यहां के पिछड़ेपन पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया. अब जरा इस इलाके के पिछड़ेपन का अंदाज़ा लगाइए. वैसे तो पूरा बिहार पिछड़ेपन का शिकार है, लेकिन सीमांचल बिहार का सबसे पिछड़ा हुआ इलाका है. यहां के लोग बुनियादी सहूलियतों से महरूम हैं. सीमांचल में शिक्षा के लिए स्कूल मयस्सर नहीं हैं. स्वास्थ्य के लिए हेल्थ सेंटर नहीं हैं. सरकार की तऱफ से हेल्थ सेंटर के तौर पर दी जाने वाली सहूलियत का लोगों को कोई ़फायदा नहीं है. अगर मरीज को यहां से बाहर किसी दूसरे अस्पताल ले जाने की ज़रूरत पड़े, तो यहां की टूटी-फूटी, कच्ची-पक्की सड़कें मरीज को अस्पताल के बजाय भगवान के घर पहुंचा देती हैं. रोज़गार के अवसर शून्य हैं. किशनगंज की जूट मिल बंद पड़ी है. बिजली की कमी का तो जिक्र ही मत छेड़िए. सीमांचल चारों तऱफ नदियों से घिरा हुआ है, इसलिए यहां सैलाब सबसे ज़्यादा आता है. नतीजतन, किसानों की फसलें सैलाब की भेंट चढ़ जाती हैं. धान की फसल तो किसानों के हाथ ही नहीं लगती. सीमांचल में जूट की खेती बहुत होती है. किसान अपनी फसल देखकर खुश होता है, लेकिन जब फसल बर्बाद हो जाती है, तो उसे लागत तक नहीं मिलती. इसके पीछे सरकारी उदासीनता है. 1994 के बाद से जूट की क़ीमत में कोई इजा़फा नहीं हुआ, जबकि लागत लगभग 10 गुना हो गई है, जिसके चलते किसान बदहाली के शिकार हैं. यही वजह है कि सीमांचल के 10-12 साल के मासूम बच्चे एवं नौजवान अपने माता-पिता और परिवार के पेट की आग बुझाने की ़खातिर देश के दूरदराज इलाकों में जाकर मेहनत- मज़दूरी करते हैं.
दरअसल, सेक्युलर पार्टियां आज तक मुसलमानों को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करके उनका शोषण करती रहीं. उन्होंने मुसलमानों के मसले हल करने और उन्हें सामाजिक इंसाफ दिलाने में कभी कोई रुचि नहीं दिखाई. इन स्वयंभू सेक्युलर पार्टियों ने हमेशा भाजपा और उसकी सांप्रदायिकता का खौफ दिखाकर मुसलमानों का वोट हासिल किया और फिर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. यही वजह है कि आज मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर हो गई है, जैसा कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में इशारा भी किया गया है. ओवैसी की पार्टी के सीमांचल से चुनाव में उतरने से यहां की चुनावी फिजा बदल गई है. सीमांचल की तरक्की के लिए ओवैसी संविधान के आर्टिकल 371 के तहत स्पेशल डेवलपमेंट कमेटी की बात कर रहे हैं, जिससे यहां के माहौल में तब्दीली नज़र आने लगी है. सेक्युलर पार्टियों से यहां की जनता का मोहभंग होता दिखाई दे रहा है. हैदराबाद में काम-धंधा करने वाले बिहारवासी ओवैसी की पार्टी का प्रचार करने के लिए घर का रुख कर रहे हैं. उनका कहना है कि सेक्युलर पार्टियों ने हमारा शोषण करते-करते हमें प्रवासी बना दिया. इस सूरतेहाल से महा-गठबंधन के नेता बौखला गए हैं और ओवैसी पर भाजपा और आरएसएस का एजेंट होने का इल्जाम लगा रहे हैं. वहीं ओवैसी इसकी सख्ती के साथ निंदा करते हैं और आरएसएस एवं भाजपा को सांप्रदायिक मानते हुए अपना दुश्मन नंबर एक बताते हैं. सियासी जानकारों का कहना है कि ओवैसी की पार्टी के चुनाव में उतरने से बिहार में मुस्लिम वोट बंटेगा और उसका सीधा ़फायदा भाजपा को होगा. कुछ लोगों का कहना है कि कब तक मुसलमान भाजपा से खौफ खाता रहेगा, सेक्युलर पार्टियों का वोट बैंक बना रहेगा और शोषण का शिकार होता रहेगा. इसलिए वक्त आ गया है कि अपना एक नया नेता बनाकर सेक्युलर पार्टियों के मकड़जाल से निकला जाए और तरक्की का रास्ता इख्तियार किया जाए.
इसमें कोई दो राय नहीं कि ओवैसी की पार्टी की वजह से बिहार में वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है, सेक्युलर वोट बंट सकता है और उसका ़फायदा भाजपा को मिल सकता है. तभी तो महा-गठबंधन के नेताओं की नींद हराम है. खास तौर पर कांग्रेस बहुत ज़्यादा बेचैन है. उसके वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने हाल में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और ओवैसी के आधे-आधे चेहरे मिलाकर ट्‌वीट करके यह ज़ाहिर करने की कोशिश की कि ये दोनों फिरकापरस्त भाई-भाई हैं और एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं. लेकिन, सवाल यह है कि क्या बिहार में मुलायम सिंह का तीसरा मोर्चा और वामदल सेक्युलर वोट नहीं बांट रहे हैं? क्या उनसे महा-गठबंधन को ़फायदा पहुंच रहा है? प