लंबित मामले लाटरी के ज़रिये निपटाए जाएं

justiceछह से दस साल के तीन बच्चों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल करके पटाखों की वजह से होने वाले प्रदूषण के ़िखला़फ केंद्र और राज्य सरकारों को कार्रवाई का आदेश देने की अपील की है. क्या यह संभव है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन बच्चों से यह कहा जाए कि 3.5 करोड़ मामले पहले से लंबित हैं, इसलिए आप भी कतार में सबसे पीछे लग जाइए? आम तौर पर सिविल के मुक़दमों का फैसला 20 साल और फौजदारी के मुक़दमों का फैसला 30 साल में आता है.

अगर इस लिहाज़ से देखा जाए, तो जब तक इन बच्चों को न्याय मिलेगा, तब तक इनकी उम्र के इनके बच्चे हो जाएंगे. भारतीय लोगों को म़ुकदमेबाजी पसंद है. यह जानकर आप हैरान होंगे कि अंग्रेजों द्वारा न्याय व्यवस्था स्थापित करने से पहले 5,000 वर्षों तक भारत के लोगों ने छोटी-छोटी बातों पर अदालत का दरवाज़ा खटखटाए बिना जीवन गुज़ारा. अगर पांडव अदालत चले गए होते और उन्हें अपने पुरखों की संपत्ति में से न्यायोचित हिस्सा मिल गया होता, तो महाभारत की आवश्यकता ही न पड़ती.

लेकिन, उस ज़माने में भी मामलों को निपटाने में आज जैसी ही देरी होती, तो शायद उन्हें अपने जीवनकाल में न्याय न मिल पता. न्याय मांगना बुनियादी मानव अधिकार है, लेकिन अदालतें पीआईएल से भरी पड़ी हैं.

बेशक, अंग्रेज उपनिवेशवादियों की मेहरबानी से हम आज यह दावा कर सकते हैं कि चीन के विपरीत भारत में क़ानून का राज है, लेकिन इसके साथ एक समस्या है. जैसा कि प्रधानमंत्री को कैलिफोर्निया में बताया गया व्यवसायिक मुक़दमों के फैसलों में देरी निवेशकों की नज़र में भारत का नंबर कम कर देती है. यह तो आयकर अधिकारियों के साथ किसी मामले में उलझा कोई करदाता ही इससे जुड़े आतंक की कहानी सुना सकता है.

इसके लिए कर-आतंकवाद उचित शब्द होगा. यह कोई ढकी-छिपी बात नहीं है, बल्कि यह एक खुला हुआ स्कैंडल है और जिसमें हर सरकार शामिल रही है. राष्ट्र के तीनों स्तंभ यानी विधायिका, कार्यपालिका एवं न्याय पालिका सभी इसके लिए दोषी हैं. 10 लाख आबादी पर 10.7 जजों की संख्या किसी भी सभ्य देश की न्यूनतम संख्या है. सोने पे सुहागा यह कि हर तीन पदों में से एक पद खाली है. दरअसल, जजों की संख्या घटती जा रही है, लेकिन न्याय पालिका भी राजनीति की तरह पारिवारिक व्यवसाय बनती जा रही है. क्या यह उम्मीद करना अतिशयोक्ति होगा कि देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वर्ष 2027 तक भारत में एक सुचारू न्याय व्यवस्था स्थापित हो जाएगी?

इस समस्या से निपटने के लिए लोकतंत्र के सभी स्तंभों को आपस में समन्वय स्थापित करके काम करना होगा. खास तौर पर कार्यपालिका को अगले कई वर्षों तक संसाधन मुहैया कराने के साथ-साथ लगातार यह मुहिम जारी रखनी होगी, ताकि इस समस्या को नियंत्रित किया जा सके. ़िफलहाल तो जजों की संख्या पांच गुना बढ़ाने की ज़रूरत है, जो समय के साथ क्रमबद्ध तरीके से ही संभव हो सकेगा. इसके लिए विधि की शिक्षा का विस्तार करना होगा, न्याय पालिका की नौकरी को प्रोत्साहन देना होगा और किसी न किसी तरह बकवास मुक़दमे समाप्त करने होंगे. ऐसा भी किया जा सकता है कि जो लोग शिक्षित एवं काबिल हैं, लेकिन वकील नहीं हैं, उन्हें भी फास्ट ट्रैक प्रोग्राम में शामिल करके जज बनाया जा सकता है.

दरअसल, लंबित पड़े मामले निपटाने के लिए कुछ सशक्त उपाय करने होंगे. न्याय व्यवस्था लाटरी की तरह है, फर्क़ स़िर्फ इतना है कि इस में ड्रा के नतीजे कभी-कभी आते हैं. मेरा सुझाव यह है कि जिन लोगों ने पांच वर्ष या अधिक समय तक नतीजे का इंतज़ार किया है, उनसे पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अपने म़ुकदमे के फैसले के लिए लाटरी ड्रा का नियम मानेंगे? अगर विषम संख्या आई, तो मुद्दालेह (प्रतिवादी) जीत गया और अगर सम संख्या आई, तो मुद्दई (वादी). यह सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन उस व्यवस्था से अजीब नहीं होगा, जो ़िफलहाल हमारे यहां मौजूद है. इसके ज़रिये त्वरित न्याय मुमकिन हो सकेगा.