सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की पहल

parliamentअाज की तारीख में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 193 सदस्य देश (एवं 2 आब्जर्वर सदस्य) हैं, जबकि सुरक्षा परिषद की सदस्य संख्या आज भी वही है, जो 1963 में थी, यानी 15 सदस्य.

इसका मतलब यह हुआ कि अब सुरक्षा परिषद में कुल सदस्यों का मात्र 7.77 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है, जबकि स्थायी सदस्य मात्र पांच हैं अर्थात वीटो धारक मात्र 2.59 प्रतिशत. इस पक्षपात का परिणाम यह हुआ कि दुनिया संघर्ष व बिखराव की तरफ खिसकती चली गई.

इसलिए सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत जैसे देश को स्थायी सदस्य बनाना आज की जरूरत है. पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने आम सहमति से सुरक्षा परिषद में सुधार और विस्तार पर चर्चा के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी.

कूटनीतिज्ञों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र का यह कदम भारत के लिए ब़डी कूटनीतिक जीत है. देखा जाए तो आज के दौर में विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र प्रभावी नजर नहीं आ रहा है.

कुछ देशों ने इसे पंगु बनाकर रख दिया है, जिसके कारण इसकी पहचान नखदंतविहीन संगठन के रूप में बन गई है. ऐसे में भारत जैसे देशों को इसमें जगह देने से संयुक्त राष्ट्र के उन उद्देश्यों को साकार करना आसान हो जाएगा, जिसकी कल्पना इसकी स्थापना के समय की गई थी.

सुरक्षा परिषद में सुधार और विस्तार की मांग काफी लंबे समय से चली आ रही है, जो शीत युद्ध खत्म होने के बाद 1992 से तेज हो गई थी. उसी समय से भारत विश्वभर से स्थाई सदस्यता के लिए सर्मथन जुटाता रहा, जिसमें इसे 23 साल बाद सफलता मिली है. भारत के लिए यह खास उपलब्धि इसलिए है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में यह पहला मौका है, जब विभिन्न सदस्य राष्ट्रों ने इसके लिए अपने लिखित सुझाव दिए हैं.

हालांकि स्थाई सदस्य देश चाहते हैं कि भारत को स्थाई सदस्यता मिलने पर भी वीटो पावर नहीं मिले, जबकि भारत वीटो पावर भी चाहता है, इसीलिए विस्तार पर चर्चा लंबे से टलती रही. स्थाई सदस्यता पाने की दौड़ में जर्मनी, जापान और ब्राजील भी शामिल हैं. हालांकि भारत के पक्ष में एशिया, यूरोप, अफ्रीका व खाड़ी के अधिकतर देश हैं.

इसके अलावा भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है. इसकी किसी दूसरे देश पर पहले हमला नहीं करने की नीति है. 1971 के युद्ध के दौरान भारत के कब्जे में 90 हजार पाकिस्तानी सैनिक थे.

अगर भारत उदार देश नहीं होता तो निर्णय कुछ और होता, लेकिन भारत ने बांग्लादेश की धरती को रक्तरंजित नहीं करना चाहा और पाकिस्तानी फौजियों को वापस कर दिया. द्वितीय विश्व युद्ध भारतीय जवानों ने अपने लिए नहीं लड़ी थी, बल्कि उसका मकसद दुनिया की शांति से जुड़ा था. ऐसे में भारत से अच्छा उदारवाद और लोकतांत्रिक कोई और देश कैसे हो सकता है. भारत विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ सबसे तेज गति से विकास करने वाला देश भी है.

हालांकि भारत को कुछ देशों का समर्थन प्राप्त है, तो मुश्किलें भी कम नहीं हैं. भारतीय राजनेता, शिक्षाविद् और मीडिया मानते हैं कि स्थायी सदस्यता पाने में चीन सबसे बड़ी बाधा है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर बीजिंग ने कभी भी खुलकर नई दिल्ली की संयुक्त राष्ट्र में उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया है. चीन ने हाल ही में सुधार वाले मसले पर अड़ंगा डालने की कोशिश की भी थी, लेकिन इस मसले पर उसे दूसरे मुल्कों का साथ नहीं मिला.

इसे भारत की बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है. भारत की सबसे बड़ी गलती जापान, जर्मनी और ब्राजील के साथ मिलकर गठबंधन बनाना है. इन तीनों देशों के इस क्षेत्र में विराधी मौजूद हैं.

चीन और दक्षिण कोरिया जापान की उम्मीदवारी का निश्चित तौर पर कड़ा विरोध करेंगे. रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए भारत को अपना समर्थन देने का आश्वासन दिया है.

रूस ने यह आश्वासन ऐसे समय में दिया है, जब पिछले दिनों रूस, अमेरिका और चीन ने यूएनएससी सुधारों पर बातचीत के अंतिम मसौदे में योगदान से इनकार कर दिया था, जिसे सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता हासिल करने की कोशिशों को नाकाम करने का प्रयास माना जा रहा.

अमेरिका का कहना है कि परिषद के सुधार की प्रक्रिया के मुद्दे पर उसके भारत के साथ मतभेद हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य के तौर पर शामिल किए जाने की बात पर वो पूरी तरह कायम है. ओबामा इस मसले पर भारत को समर्थन देने की बात कई बार कह भी चुके हैं.

हालांकि सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया पूरी होने में एक साल का समय लगेगा. 193 सदस्य देश सुधार के विभिन्न बिंदुओं पर अपने सुझाव देंगे. मसौदा तैयार हो जाने के बाद महासभा में उसे वोटिंग के लिए रखा जाएगा.

वहां पास होने के लिए दो-तिहाई वोट की जरूरत होगी. ऐसे में भारत को 129 से अधिक देशों का सर्मथन हासिल करना होगा. सरकार को अभी से इस मुहिम में जुट जाना चाहिए.

कुल मिलाकर सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता हासिल करने की भारत की उम्मीदें बरकरार हैं. भारत का कहना है कि शक्तिशाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की प्रक्रिया अनंतकाल तक लंबित नहीं रह सकती और ठोस परिणाम के लिए ये ज़रूरी है कि इसे परिणाम पर आधारित समय सीमा में पूरा किया जाए.

संयुक्त राष्ट्र महासभा कि कार्यसूची में ये मामला 23 साल से लंबित है और इसे और लटकाए रखने के लिए लगातार बढ़ रहे दवाब और चुनौतियों के संदर्भ में ये कदम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

अगर संयुक्त राष्ट्र ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि उसकी विश्वसनीयता कैसे बढ़े, उसका सामर्थ्य कैसे बढ़े, तो आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता भी खतरे में पड़ सकती है. हालांकि यह बात भी ध्यान रखना होगा कि वर्ष 1963 में सुरक्षा परिषद में जब सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई थी, तब अस्थायी सदस्य 11 थे, जिसे बढ़ा कर 15 किया गया था.

यह निर्णय भी महासभा ने स्थायी सदस्यों की मर्जी के खिलाफ लिया था. बहरहाल, भारत के राजनय की यह उपलब्धि सराहनीय है. यद्यपि सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट तक पहुंचने की राह काफी लंबी है, लेकिन उम्मीद है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के सुधार की ओर उठे ये कदम अब पीछे नहीं हटेंगे.