व्यक्तिगत आक्षेप ही हथियार

BIhar-Electionसत्ता-राजनीति की लीला अपरंपार है और बिहार विधानसभा चुनाव में इससे क़दम-क़दम पर साबका पड़ रहा है. सत्ता बचाने के लिए राजद, जद (यू) एवं कांग्रेस यानी महा-गठबंधन के नेता नीतीश कुमार और लालू प्रसाद कुछ भी करने को तत्पर हैं, तो वहीं सत्ता पर काबिज होकर विरोधियों को अपनी राजनीति का लोहा मनवाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कुछ भी बाकी छोड़ने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते.

बिहार ऐसी अहंवादी और वर्चस्ववादी राजनीतिक लड़ाई का पहला गवाह बन रहा है और वह पहली बार यह भी देख रहा है कि कोई प्रधानमंत्री चुनाव अभियान की लगाम अपने हाथ में रखकर सारा कुछ कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए उम्मीदवारों के पक्ष में दो दर्जन से अधिक सभाओं को संबोधित किया. पहले ही उन्होंने बिहार के चारों कोनों पर चार रैलियों और सरकारी आयोजन के नाम पर दो जनसभाओं को संबोधित करके माहौल सरगर्म कर दिया था.

मोदी के सबसे विश्वस्त एवं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह प्रत्येक प्रमंडल में कम से कम एक कार्यकर्ता सम्मेलन के साथ-साथ लगभग सौ विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी सभाओं में भाग ले रहे हैं. मोदी सरकार के बिहारी मंत्री महीनों से सूबे में जमे ही नहीं, बल्कि दरवाजे-दरवाजे खाक छान रहे हैं. यही नहीं, आधा दर्जन से अधिक ग़ैर-बिहारी केंद्रीय मंत्री प्रतिदिन यहां आते हैं, मतदाताओं के राजनीतिक रुझानों के बारे में आधिकारिक बयान देते हैं और फिर रात बिताने दिल्ली लौट जाते हैं. एनडीए के तीर्थयात्रियों में यहां के चुनावी यज्ञ में खुद को अग्निहोत्र साबित करने की होड़ लगी है. उन्होंने इसे अपने राजनीतिक अस्तित्व से जोड़ लिया है, सबहिं नचावत मोदी-शाह गुसाईं.

इस चुनावी परिदृश्य में महा-गठबंधन के दलों की स्थिति दयनीय लगती है. उनके मित्रों में वैसी पार्टियां नहीं हैं, जो बिहार के चुनावी समर में एनडीए को सीमित दायरे में ही सही, परेशानी में डालकर परोक्ष मदद कर सकें. जैसे कई दल और नेता उनके विरोधियों के लिए कर रहे हैं. वस्तुत: राजद और जद (यू) हर व्यवहारिक नज़रिये से बिहारी दल ही हैं. महा-गठबंधन में कांग्रेस एकमात्र पार्टी है, जो राष्ट्रीय है, लेकिन उसके मददगारों की संख्या सीमित है.

सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी के अलावा किसी अन्य नेता में कांग्रेसियों और आम जन की कोई विशेष रुचि नहीं है. राजद की सारी राजनीतिक कथा लालू प्रसाद या उनके घर से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाती है. राजनीति में रा़ेजगार तलाश रहे प्रमुख के साथ-साथ उनके घर से सभी (राबड़ी देवी, मीसा भारती, तेज प्रताप एवं तेजस्वी) दल के स्टार प्रचारक हैं. जद (यू) में तो राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव के अलावा और भी राष्ट्रीय नेता हैं, लेकिन नीतीश कुमार के सामने किसी में कोई चमक नहीं दिखती.

हालांकि, महा-गठबंधन ने बार-बार स्वयं को राजनीतिक तौर पर एनडीए से ज़्यादा सुगठित और समावेशी जताने की कोशिश की. मसलन, विधानसभा चुनाव की हवा बननी शुरू हुई थी, तभी नीतीश कुमार को महा-गठबंधन का नेता घोषित कर दिया गया, सीटों का बंटवारा चुनाव अभियान की शुरुआत के साथ हो गया और महा-गठबंधन के सभी दलों की सीटों एवं प्रत्याशियों के नाम भी एक साथ घोषित कर दिए गए.

हालांकि, उसने एक साथ या शामिल दलों ने पृथक रूप से चुनाव घोषणा-पत्र जैसा कोई दस्ताव़ेज जारी नहीं किया, पर एनडीए के दृष्टि-पत्र (विजन डॉक्युमेंट) जारी होने के एक माह पहले नीतीश कुमार ने सुशासन का सात सूत्रीय संकल्प-पत्र जारी कर दिया, जो उनका भावी कार्यक्रम है. राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने भी उसे ही अपना कार्यक्रम मान लिया, पर कांग्रेस मौन है. इसके अलावा समावेशी राजनीति कहीं और है या नहीं, इस बारे में सोचने पर निराशा होती है.

प्रचार अभियान हो या कोई दूसरा राजनीतिक कार्यक्रम, महा-गठबंधन के दलों के शीर्ष नेता बहुधा साथ नहीं दिखते. राजद प्रमुख का अपना कार्यक्रम चलता है, तो नीतीश कुमार का अपना. कांग्रेस के नेता अपने तरीके से काम करते हैं. होर्डिंग्स और अन्य प्रचार सामग्रियों में समन्वय का स्तर बढ़ा है, पर वह स्वाभाविक राजनीति का आभास नहीं देता. ऐसा लगता है, महा-गठबंधन के घटक दलों के नेताओं में नज़रें चुराने का खेल चल रहा है. चूंकि बिहार में मतदाता समूहों की राजनीतिक गोलबंदी काफी तीखी है और ऐसे उत्तेजक माहौल में इसे लोग ज़्यादा महत्व नहीं देते, लेकिन यह है तो नकारात्मक ही और इसका असर भी नकारात्मक हो सकता है.

इसके बरअक्स एनडीए ज़्यादा समावेशी और सुगठित होता जा रहा है. एनडीए में चुनाव अभियान ज़ोर पकड़ने के साथ-साथ एकजुटता की डोर मजबूत होती गई. यह अलग बात है कि कई मसलों और स्थितियों को लेकर भाजपा ने अपने राजनीतिक आचरण में चौधराहट दिखाई. एनडीए के प्रचार अभियान के कई आयाम हैं. भाजपा नेताओं के छह-सात समूह निर्वाचन क्षेत्रों में जाते हैं, कुछ प्रचारक सहयोगी दलों के साथ भी जाते हैं. सहयोगी दलों ने भी विशिष्ट अभियान चला रखा है.

लोजपा, रालोसपा और हम के नेता क्षेत्र में खास तौर पर एक साथ जाते हैं. पटना हवाई अड्डे से प्रतिदिन क़रीब डेढ़ दर्जन हेलिकॉप्टर उड़ान भरते हैं, जिनमें एक दर्जन से अधिक में एनडीए के नेता होते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभाओं के मंच पर एनडीए के सभी घटक दलों के नेता मौजूद रहते हैं और सभी को मा़ैका मिलता है. मोदी का प्रचार अभियान भाजपा उम्मीदवारों के निर्वाचन क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहता. वह मख्दुमपुर (जीतन राम मांझी का निर्वाचन क्षेत्र) गए और कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उनकी सभाएं हुईं. ऐसा ही अमित शाह के साथ है. कहने का मतलब यह कि भाजपा के नेतृत्व में एनडीए काम कर रहा है, कोई एक दल नहीं.

बिहार के चुनावी अखाड़े में मुख्यत: दो राजनीतिक धाराओं का ज़ोर है, बाकी सारे राजनीति समूह पांचवें सवार की तरह हैं. 243 विधानसभा क्षेत्रों में मुख्यत: महा-गठबंधन और एनडीए के उम्मीदवार ही आमने सामने हैं. कुछ सीटों, जिनकी संख्या पचास से अधिक नहीं है, को अपवाद मान लिया जाए, तो बाकी क़रीब दो सौ सीटों पर तीसरे या चौथे राजनीतिक ध्रुवों के उम्मीदवारों की भूमिका महा-गठबंधन और एनडीए के आभा मंडल को चमकाने या धूमिल करने तक सीमित दिख रही है.

समाजवादी पार्टी की पहल पर एनसीपी सांसद तारिक अनवर के नेतृत्व में गठित समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा के उम्मीदवार राजद प्रमुख लालू प्रसाद के माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं. ऐसे राजनीतिक तत्वों की उपस्थिति बिहार चुनाव में सदैव रही है. क़रीब तीन दर्जन से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में इस मोर्चे के उम्मीदवार चुनाव में तीसरा कोण बना रहे हैं. यह एनडीए के लिए खुश होने का एक बड़ा कारण है. एनडीए वामपंथी दलों के मोर्चे के चलते भी लाभ की स्थिति में है.

वामपंथी मोर्चे के दल भले कमज़ोर हों, पर सूबे के कई हिस्सों में उनकी उपस्थिति है. इस राजनीति के मतदाता समूह मूलत: लालू-नीतीश के नज़दीक रहे हैं. यह अनायास एनडीए के लिए लाभ वाली स्थिति हो गई है. वोट बैंक में इस सेंधमारी ने महा-गठबंधन की हालत पतली कर दी है, जिसकी कोई काट उसके पास नहीं है.

यही नहीं, महा-गठबंधन के नेता लालू प्रसाद की ज़ुबान भी अपना काम कर रही है. पहले वह चुनाव को अगड़ी और पिछड़ी जातियों में बांटने की कोशिश में फंस गए. फिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को नरभक्षी कहने की वजह से जांच के दायरे में आ गए. हिंदुओं के गोमांस खाने की चर्चा ने तो उन्हें राजनीतिक हमलों का केंद्र बना दिया. गोमांस प्रकरण ने उनके समर्थक हिंदू सामाजिक समूहों में भी हलचल पैदा कर दी है. हालात संभालने में महा-गठबंधन के नेताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है.

आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन में अमित शाह भी जांच के दायरे में हैं. उन्होंने लालू प्रसाद को चारा चोर कहा था. बहरहाल, चुनाव अभियान लगातार तल्ख होता जा रहा है. राजनीतिक दलों के पास मुद्दों का अभाव है. वे चर्चा भले विकास की करते हैं, पर सूबे के विकास की कोई रूपरेखा पेश करने में विफल रहे हैं. विकास के किसी मौलिक कार्यक्रम के बदले वे साइकिल, स्कूटी और लैपटॉप बांटने को ही विकास बता रहे हैं. कृषि विकास, औद्योगिक विकास या मानव विकास का कोई कार्यक्रम उनके पास नहीं है. ऐसे में प्रचार अभियान के दौरान दोनों राजनीतिक ध्रुवों के शिखर नेतृत्व से लेकर सामान्य नेता तक व्यक्तिगत आक्षेप की पूंजी से काम चला रहे हैं. बिहार को देने के लिए उनके पास इससे अधिक कुछ भी नहीं है.