दो पाटों के बीच फंस गए डाकू

journlistआज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं, बदल रहे हैं अथवा बदल दिए गए हैं, नतीजतन, उन पत्रकारों के सामने भटकाव जैसी स्थिति आ गई है, जो पत्रकारिता को मनसा-वाचा-कर्मणा अपना धर्म-कर्तव्य और कमज़ोर-बेसहारा लोगों की आवाज़ उठाने का माध्यम मानकर इस क्षेत्र में आए और हमेशा मानते रहे. और, वे नवांकुर तो और भी ज़्यादा असमंजस में हैं, जो पत्रकारिता की दुनिया में सोचकर कुछ आए थे और देख कुछ और रहे हैं.

ऐसे में, 2005 में प्रकाशित संतोष भारतीय की पुस्तक-पत्रकारिता: नया दौर, नए प्रतिमान हमारा मार्गदर्शन करती और बताती है कि हमारे समक्ष क्या चुनौतियां हैं और हमें उनका सामना किस तरह करना चाहिए. चार दशक से भी ज़्यादा समय हिंदी पत्रकारिता को समर्पित करने वाले संतोष भारतीय देश के उन पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं, जो देश और समाज से जुड़े प्रत्येक मुद्दे पर निर्भीक, सटीक, निष्पक्ष टिप्पणी करते हैं.

फूलन को आत्मसमर्पण करने से किसने रोका-3

घनश्याम तो 15 नवंबर की रात बारह बजे रामपुरा से निकल कर पचनदा के बीहड़ों में गायब हो गया, किंतु पुलिस अधिकारियों को इस बात पर यकीन नहीं हुआ. फलस्वरूप 17 नवंबर को रामपुरा के समरजीत इंटर कॉलेज में आत्मसमर्पण की पूरी तैयारी हो गई. पुलिस की ओर से तंबुओं, कनातों एवं 50 कुर्सियों का इंतजाम किया गया था. इधर 16 नवंबर की रात्रि को ही अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक आरपी गोविल कालपी के अतिथि गृह में आकर ठहर गए, किंतु जब उन्हें आत्मसमर्पण विफल होने का पता चला, तो वह काफी क्षुब्ध हुए.

अब उन्होंने एक नई रणनीति बनाकर सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वह प्रेस के समक्ष सा़फ इंकार कर दें कि आत्मसमर्पण की कभी कोई बात हुई थी. दूसरी ओर आत्मसमर्पण का तमाशा देखने के इच्छुक रामपुरा पहुंचे हज़ारों दर्शकों एवं अनेक पत्रकारों को निराश वापस लौटना पड़ा.इस संपूर्ण घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि जालौन पुलिस जहां एक ओर चुपचाप आत्मसमर्पण के लिए उतावली थी, वहीं राज्य सरकार के दृष्टिकोण को पूरी तरह समझने और समीपवर्ती ज़िलों को विश्वास में लेने की उसने कोई कोशिश नहीं की.

बताया जाता है कि 16 नवंबर की शाम को जब यह खबर लखनऊ पहुंची, तो उद्योग मंत्री वीर बहादुर सिंह एवं आबकारी राज्य मंत्री राम रतन सिंह ने राज्य के पुलिस महानिरीक्षक श्री दीक्षित से यह पूछा कि आ़िखर किस नीति के तहत वह आत्मसमर्पण करा रहे हैं. बताया जाता है कि श्री दीक्षित ने इन मंत्रियों से कहा कि उन्हें अभी तक इस आत्मसमर्पण कार्यक्रम की कोई जानकारी नहीं है तथा इस संबंध में वह तत्काल कोई कठोर क़दम उठाएंगे. फलस्वरूप 17 नवंबर को बहुत सवेरे ही एक हेलिकॉप्टर श्री गोविल को लेने कालपी पहुंच गया तथा दोपहर बाद तक श्री गोविल एवं जालौन के ज्येष्ठ पुलिस अधीक्षक लखनऊ आ गए. उन्होंने पुलिस महानिदेशक के समक्ष अपनी सफाई पेश की. इस घटना के बाद से उत्तर प्रदेश सरकार ने दस्यु उन्मूलन अभियान तेजी से शुरू करने का निर्णय लिया है.

उत्तर प्रदेश सरकार जहां विफल रही, मध्य प्रदेश पुलिस ने अपना काम वहीं से शुरू किया. जब उसे पता चला कि घनश्याम और फूलन के समर्पण की संभावना है, तो भिंड के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र चतुर्वेदी 19 नवंबर को चुपचाप उरई आए. वहां उन्होंने उन वकीलों से भेंट की, जिनके बारे में उन्हें मलखान का समर्पण कराने वाले एक पत्रकार ने सुराग दिया था कि वे घनश्याम से संपर्क रखते हैं. राजेंद्र चतुर्वेदी ने कुछ मुखबिरों और छोटे राजनीतिक नेताओं ने भी मुलाकात की.

किसे कितना इनाम मिलेगा, इसका भी सौदा होने लगा. लेकिन जैसी की आशा थी, जालौन पुलिस ने राजेंद्र चतुर्वेदी का बहिष्कार कर दिया. यहां तक कि उन्हें रात में ओढ़ने के लिए रजाई एवं कंबल तक उरई के वकीलों के यहां से मंगाने पड़े. जब राजेंद्र चतुर्वेदी भिंड लौटने लगे, तो गोपालपुरा से सटे पहुज नदी के किनारे एक स्थान पर उनकी भेंट मुसलिम से हुई, जिसकी योजना पहले से बनी हुई थी.

मुसलिम को उन्होंने कोई ऩुकसान न पहुंचाने और उसे ले जाने के लिए मलखान को भेजने का वादा किया.इसके साथ ही राजेंद्र चतुर्वेदी ने घनश्याम एवं फूलन के मध्य प्रदेश में बसे रिश्तेदारों को बुलाया और उनसे कहा कि वे दोनों को मध्य प्रदेश में समर्पण के लिए तैयार करें, क्योंकि उत्तर प्रदेश की पुलिस उन्हें धोखा ही देगी. उन्होंने घनश्याम के एक रिश्तेदार को बताया कि 16 नवंबर को यदि घनश्याम फरार न रहता, तो उसे निश्चित रूप से गोली मार दी जाती. उन्होंने सा़फ-सा़फ कहा कि मध्य प्रदेश पुलिस समर्पण की नीति पर भरोसा रखती है.

जब जालौन पुलिस को यह पता चला, तो वह बौखला गई. उसने घनश्याम के घर वालों को संदेश भिजवाया कि यदि घनश्याम ने मध्य प्रदेश में समर्पण किया, तो वह उन सबको दीवार में चिनवा देगी.22 नवंबर को मलखान मध्य प्रदेश पुलिस की एक बिना निशान वाली जीप में बैठकर उत्तर प्रदेश के इटावा ज़िले के गांव सनाबाई की गढ़िया में आया. यहां उसे मुसलिम, भजू एवं रचनौस के दो धानुक डाकू मिले, जिन्होंने उसके सामने हथियार डाल दिए. मलखान ने मुसलिम एवं बाकी तीनों को जीप में बैठाकर सिंध नदी पार करा दी तथा खुद पैदल पार गया.

इसके बाद जीप मुसलिम को लेकर भिंड चली गई, जहां राजेंद्र चतुर्वेदी के सामने उनका औपचारिक समर्पण हुआ. 24 नवंबर को मैनपुरी के भूरा ने, जो छविराम के बाद उसके गिरोह का सरदार बना था, भिंड जाकर राजेंद्र चतुर्वेदी के सामने समर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे शस्त्र अधिनियम के तहत चालान कर जेल भेज दिया. वस्तुत: घनश्याम के दिमाग में यह बात बैठ गई है कि उसका अपना क्षेत्र उत्तर प्रदेश है, इसलिए उसे यहीं समर्पण करना है. दूसरी तऱफ फूलन का कहना है कि जहां बाबा समर्पण करेंगे, वहीं वह भी करेगी.

इस समय उसके गिरोह में 17 डाकू हैं तथा घनश्याम के गिरोह में 45. राजेंद्र चतुर्वेदी ने इन दोनों के पास संदेश भिजवाया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने छविराम एवं अनार सिंह को समर्पण के बहाने ही बुलाकर मार डाला था. इसलिए उस पर बहुत भरोसा करना उनके लिए हानिकारक होगा.
जारी…