बागी बिगाड़ रहे दलीय उम्मीदवारों का खेल

jdu-rjdटिकटों के बंटवारे के बाद संभावित उम्मीदवारों की नाराज़गी कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार बिहार चुनाव में जो हो रहा है, वह यकीकन पिछली कहानियों से अलग है. लगभग सभी राजनीतिक दलों के आलाकमानों ने यह कल्पना नहीं की होगी कि टिकटों के बंटवारे के बाद पार्टी एवं शीर्ष नेताओं के खिलाफ संभावित उम्मीदवारों की नाराज़गी सार्वजनिक तौर पर इस वीभत्स रूप में सामने आएगी.

खैर, नाराज़गी तो पार्टी ने झेल ली, पर जो दमदार नेता बागी होकर निर्दलीय या फिर दूसरे दलों से चुनाव लड़ रहे हैं, उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी की जीत की गणित गड़बड़ कर दी है. चुनाव प्रचार चरम पर है, ऐसे में पार्टी के शीर्ष नेता प्रयास कर रहे हैं कि बागियों को किसी न किसी तरह मना लिया जाए, पर बागी मानने के लिए तैयार नहीं हैं.

एक मोटे अनुमान के अनुसार, बिहार विधानसभा की कम से कम 35-40 सीटों की गणित बागी अपने हिसाब से तय कर रहे हैं, जिनमें से कुछ जीतने की स्थिति में हैं, तो कुछ ऐसे हैं, जो खुद भले न जीत पाएं, लेकिन दूसरे की नैया ज़रूर डुबो देंगे. सबसे हाई प्रोफाइल सीट है, जमुई ज़िले की चकाई. यहां से बतौर निर्दलीय नरेंद्र सिंह के पुत्र सुमित कुमार चुनाव लड़ रहे हैं. उन्हें एनडीए से टिकट मिलने की उम्मीद थी, पर ऐसा हो नहीं सका. इलाके में मजबूत पकड़ के बल पर सुमित कुमार ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला लिया और चकाई के मैदान में उतर गए. नतीजा यह कि एनडीए प्रत्याशी काफी पीछे चले गए और सुमित का मुक़ाबला राजद की सावित्री देवी से है.

इसी तरह शेखपुरा में राजद के विजय सम्राट पप्पू यादव के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. विजय सम्राट के कारण जदयू प्रत्याशी को यहां यादव वोटों का खासा ऩुकसान हो रहा है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राम जतन सिन्हा इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने कुर्था से निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया. अब स्वाभाविक है कि राम जतन सिन्हा के फैसले से महा-गठबंधन उम्मीदवार का काफी ऩुकसान हो रहा है.

नीतीश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे राम धनी सिंह भी बागी होकर चुनावी अखाड़े में उतर चुके हैं. जदयू ने जब टिकट देने से मना किया, तो राघोपुर के विधायक सतीश कुमार ने बिना देर किए भाजपा का दामन थामा और लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव के खिलाफ  अखाड़े में कूद गए. इसी तरह महुआ में जब लालू ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप के नाम की घोषणा की, तो वहां के संभावित प्रत्याशी जुगेश्वर राय ने विद्रोह का बिगूल फूंक कर पप्पू यादव के टिकट पर चुनावी अखाड़े में उतरने का फैसला कर लिया. अमनौर से राजद के सुनील राय ने भी लालू की एक नहीं सुनी और बागी होकर चुनावी अखाड़े में उतर गए.

नतीजा यह हुआ कि जदयू प्रत्याशी मंटू सिंह की हालत पतली हो गई. सीतामढ़ी एवं शिवहर ज़िले के तक़रीबन एक दर्जन बेटिकट कार्यकर्ता पार्टी नेतृत्व को सबक सिखाने की तैयारी में लगे हैं. नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही संबंधित क्षेत्र की चुनावी तस्वीर अलग होने की चर्चा शुरू हो गई है. सीतामढ़ी विधानसभा क्षेत्र से वैश्य बिरादरी की लोजपा की पूर्व विधायक नगीना देवी बतौर वैश्य समर्थित स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. अगर उनकी चुनावी गणित सफल रही, तो सा़फ है कि वह एनडीए के भाजपा प्रत्याशी सुनील कुमार पिंटू और महा-गठबंधन के राजद प्रत्याशी सुनील कुशवाहा के लिए सिरदर्द बन सकती हैं.

रून्नीसैदपुर विधानसभा क्षेत्र की विधायक गुड्डी देवी ने जदयू पर विश्वासघात का आरोप लगाते हुए समाजवादी पार्टी का झंडा थाम लिया. भूमिहार बिरादरी की इस महिला प्रत्याशी को सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है. अगर यही आलम रहा, तो एनडीए और महा-गठबंधन की ऐंठन धरी रह जाएगी. ज़ाहिर है, एनडीए के रालोसपा प्रत्याशी पंकज कुमार मिश्रा और महा-गठबंधन की राजद प्रत्याशी मंगीता देवी की परेशानी बढ़ सकती है.

परिहार विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के मोहम्मद शम्स शहनवाज भी बागी रुख अख्तियार कर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर गए हैं. इसका असर महा-गठबंधन प्रत्याशी एवं राजद के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामचंद्र पूर्वे के चुनाव नतीजे पर पड़ने की संभावना है. इसी सीट से भाजपा की ज़िला परिषद सदस्य सरिता यादव जन अधिकार पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा करके एनडीए की स्वजातीय प्रत्याशी गायत्री देवी का खेल बिगाड़ने में लगी हैं. सुरसंड विधानसभा क्षेत्र से राजद के पूर्व विधायक जयनंदन प्रसाद यादव ने बतौर स्वतंत्र प्रत्याशी चुनाव लड़ने की घोषणा करके महा-गठबंधन प्रत्याशी सैयद अबु दोजाना का खेल बिगड़ने का रास्ता सा़फ कर दिया है.

बेलसंड विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के पूर्व विधान पार्षद बैद्यनाथ प्रसाद के चुनावी समर में उतरने की चर्चा ज़ोरों पर है. अगर इसमें सच्चाई है, तो एनडीए और महा-गठबंधन, दोनों को खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.

बाजपट्टी विधानसभा क्षेत्र में चुनावी समीकरण बदलते दिख रहे हैं. इस सीट से रालोसपा के रवींद्र कुमार शाही ने बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ने की घोषणा की है. उनके आगमन के बाद एनडीए की रालोसपा प्रत्याशी रेखा कुमारी गुप्ता की परेशानी बढ़ सकती है. शिवहर में भी चुनावी समीकरण बदलने की संभावना है. राजद के पूर्व विधायक अजित कुमार झा ने इस बार समाजवादी पार्टी का झंडा थामकर चुनावी समर में उतरने की घोषणा कर दी है.

वहीं दूसरी ओर राजपूत बिरादरी के ठाकुर रत्नाकर राणा ने भाजपा से खफा होकर जन समर्थन के बूते स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा की है. अगर दोनों चुनावी समर में डटे रहते हैं, तो इस सीट से जदयू विधायक सह प्रत्याशी की चुनावी राह आसान हो सकती है. वैसे चुनावी समीकरणों में जोड़-तोड़ की आजमाइश अभी थमी नहीं है. नाम वापसी के बाद ही सा़फ हो सकेगा कि किस क्षेत्र में कौन बागी निर्दल से हटकर दलगत का समर्थन करता है.

गोपालगंज ज़िले के कुल छह विधानसभा क्षेत्रों में टिकट बंटवारे को लेकर संबंधित दलीय कार्यकर्ता अपना विरोध जता रहे हैं. जहां तक उम्मीदवारों की बात है, तो विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा उतारे गए उम्मीदवारों को जनता नकारेगी या स्वीकारेगी, यह तो चुनाव के नतीजे बताएंगे, लेकिन बागियों के चुनाव मैदान में होने से नतीजे अप्रत्याशित होंगे, यह तय है. गोपालगंज में टिकट न मिलने से भाजपा को बागियों से सामना करना पड़ रहा है. भाजपा का दामन थामे कई नेता चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे हैं, जो चुनावी फिजा बदल सकते हैं.

अगर हथुआ विधानसभा क्षेत्र की बात करें, तो यहां का नजारा दिलचस्प है. एनडीए के सहयोगी हम के खाते में यह सीट जाने से भाजपा नेता राजेश कुमार सिंह ने बतौर निर्दलीय ताल ठोक दी है. हथुआ विधानसभा क्षेत्र से महा-गठबंधन से राम सेवक सिंह और एनडीए सहयोगी हम से महाचंद प्रसाद चुनाव मैदान में हैं. हथुआ कोयरी-कुर्मी बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है. इन्हीं वोटरों पर राम सेवक सिंह और राजेश कुमार सिंह की नज़र है तथा दोनों एक ही जाति के हैं.

राजेश कुमार सिंह के बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने से लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है. अनूप कुमार श्रीवास्तव गोपालगंज विधानसभा क्षेत्र से भाजपा से टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन भाजपा ने सुभाष सिंह को उम्मीदवार बनाया. अनूप पार्टी से नाराज़ होकर बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं.

बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा से टिकट के लिए एक दर्जन नेता आमने-सामने थे, लेकिन भाजपा ने मिथलेश तिवारी को उम्मीदवार बना दिया. टिकट न मिलने से क्षुब्ध पूर्व विधायक देवदत्त राय की पत्नी मनोरमा देवी बतौर निर्दलीय और अनूप कुमार तिवारी बसपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. ये दोनों एनडीए और महा-गठबंधन को ऩुकसान पहुंचा सकते हैं. बरौली विधानसभा क्षेत्र से राजू सिंह को जब कांग्रेस से टिकट नहीं मिला, तो वह सपा का दामन थामकर चुनाव मैदान में उतर गए.

गया ज़िले के दस विधानसभा क्षेत्रों में से पांच ऐसे हैं, जहां के चुनावी समीकरण बागी प्रत्याशियों के कारण बिगड़ सकते हैं. गया शहर विधानसभा क्षेत्र से जदयू के बागी राजकुमार प्रसाद उर्फ राजू वर्णवाल निर्दलीय प्रत्याशी बनकर महा-गठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी प्रियरंजन को चुनौती दे रहे हैं. राजू वर्णवाल गया महानगर जदयू अध्यक्ष थे और उम्मीद थी कि गया शहर विधानसभा क्षेत्र से जदयू उन्हें अपना प्रत्याशी बनाएगा. राजू से सबसे अधिक क्षति भाजपा प्रत्याशी प्रेम कुमार को होगी.

अतरी विधानसभा क्षेत्र से 2010 के चुनाव में जदयू के कृष्ण नंदन यादव विधायक बने थे. इस बार अतरी सीट महा-गठबंधन के घटक राजद के खाते में चली गई, नतीजतन कृष्ण नंदन यादव का टिकट कट गया. अब वह जन अधिकार पार्टी के प्रत्याशी बनकर राजद प्रत्याशी कुंती देवी के सामने हैं. हालांकि, विधायक रहते हुए भी अतरी के यादवों पर उनकी कोई मजबूत पकड़ नहीं थी, लेकिन वह राजद का ऩुकसान ज़रूर करेंगे.

शेरघाटी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा की सुषमा देवी उर्फ मंजू अग्रवाल बगावत कर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं. 2010 के विधानसभा चुनाव में यहां से एनडीए के जदयू प्रत्याशी विनोद यादव जीते थे. उस समय भी मंजू पार्टी से बगावत कर बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव लड़ी थीं और दूसरे स्थान पर रही थीं. इस बार उम्मीद थी कि भाजपा शेरघाटी से उन्हें प्रत्याशी बनाएगी, लेकिन यह सीट हम के खाते में चली गई. हम से कृष्ण यादव प्रत्याशी हैं.

बेलागंज विधानसभा क्षेत्र राजद के खाते में गया है. पूर्व विधायक महेश सिंह यादव के पुत्र संजय सिंह यादव राजद छोड़ सपा से टिकट लेकर चुनाव मैदान में हैं. संजय जो भी वोट झटकेंगे, उससे महा-गठबंधन प्रत्याशी डॉ. सुरेंद्र प्रसाद यादव को ही नुक़सान होगा. टिकारी विधानसभा क्षेत्र हम के खाते में है. यहां के निवर्तमान विधायक अनिल कुमार जदयू छोड़कर हम में शामिल हो गए, जबकि महा-गठबंधन से जदयू के अभय कुशवाहा प्रत्याशी हैं.

देखा जाए, तो बागियों की ताकत कई सीटों पर जीत-हार तय करने वाली है. बागियों के संकट को अमित शाह ने काफी गंभीरता से लिया है और अपने स्तर से उसे कम करने के लिए यथासंभव प्रयास भी किए. उनके प्रयास कितने सफल रहे, यह तो आठ नवंबर को नतीजे आने के बाद पता चल पाएगा.

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