बिखरता तिलिस्म, दरकती अर्थव्यवस्थाएं

Economyएक बहुत पुरानी ग्रीक कहावत है, योर ग्रेटेस्ट स्ट्रेंग्थ कैन बी योर ग्रेटेस्ट वीकनेस. यानी आपकी सबसे बड़ी ताकत ही सबसे बड़ी कमज़ोरी हो सकती है. यह कहावत आज की दुनिया में आउटसोर्सिंग मॉडल पर बिल्कुल सटीक बैठती है. 80-90 के दशक में सभी देशों ने अपनी सभी आर्थिक-सामाजिक समस्याओं का समाधान खोज लिया था. उस समय आर्थिक भूमंडलीकरण का बोलबाला था.

किसी देश के बाज़ार के लिए किसी अन्य देश में उत्पाद बनाना भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत ही समझा गया, जिसमें अमेरिका एवं दूसरे पश्चिमी देशों के उत्पादों का भारत एवं चीन जैसे देशों में उत्पादन करने की प्रक्रिया को आउटसोर्सिंग कहा गया. पश्चिमी देशों को अब उत्पादन के झंझट से छुटकारा मिल गया था और भारत एवं चीन जैसे देशों में बनकर वही सामान कम मूल्य पर पश्चिमी देशों में उपलब्ध होने लगा. भारत एवं चीन जैसे विकासशील देशों में रा़ेजगार, निवेश और ढांचागत सुधार को बढ़ावा मिलने लगा तथा इससे भारत जैसे देशों में ग़रीबी से छुटकारा पाने का एक साधन मिल गया.

भारत एवं चीन जैसे देशों ने स्वयं को इस मॉडल के प्रति समर्पित किया. चीन ने सभी प्रकार के उत्पादों की क्षमताएं विकसित कीं. भारत ने सेवा एवं सॉफ्टवेयर क्षेत्रों में अपने आपको ढाला. हमारे देश के करोड़ों युवाओं को सॉफ्टवेयर में प्रशिक्षित किया गया, रातोंरात हज़ारों इंजीनियरिंग कॉलेज खुले, अंग्रेजी भाषा के उच्चारण के लिए प्रशिक्षण केंद्र खुले और बंगलुरू, हैदराबाद, पुणे एवं गुड़गांव आदि शहरों में सेवाओं के केंद्र बने.

पश्चिमी देशों की कंपनियों में मुनाफा बढ़ने लगा, जिससे पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था तीव्र गति से ऊपर की ओर बढ़ने लगी. भारत एवं चीन जैसे देशों में तो नया देश गढ़ा जा रहा था. इस वजह से उनकी अर्थव्यवस्था लगातार दो अंकों में चल रही थी. यह मॉडल एकदम सही प्रतीत हो रहा था और काफी समय तक इस मॉडल ने काम भी किया. परंतु, जब हम देखते हैं कि पूरी दुनिया में शेयर बाज़ारों में अरबों डॉलर की पूंजी पलक झपकते ही कंप्यूटर की स्क्रीन पर गायब हो जाती है.

रुपया डॉलर के म़ुकाबले 76 को पार कर जाता है और 80-82 से पहले ठहरता ही नहीं है. तमाम प्रयासों के बाद भी शेयर बाज़ार उठ नहीं पाता. तब यह सवाल उठता है कि कहीं अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत आउटसोर्सिंग ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी तो नहीं बन गई?

आउटसोर्सिंग निर्यात की तुलना में बिल्कुल अलग चीज थी, क्योंकि निर्यात में आपका उद्देश्य अपने देश के बाज़ार से अच्छी क़ीमत की आशा में चीजें बाहर भेजनी होती हैं, जबकि आउटसोर्सिंग में आपका अपना बाज़ार कहीं होता ही नहीं और आप पूरी तरह से अनजाने (एलियन) बाज़ार की मांग पर निर्भर होते हैं. आउटसोर्सिंग के मॉडल पर आधारित इन फैक्ट्रियों में जो उत्पाद बन रहे थे, उनका स्थानीय बाज़ार से कुछ लेना-देना नहीं था. वे ऐसे उत्पाद बना रही थी या ऐसी सेवाएं दे रही थीं, जिनकी कोई भी स्थानीय मांग नहीं है.

पश्चिमी कंपनियों की अर्थव्यवस्था भी ऊपर की ओर चढ़ने लगी, लेकिन इसके साथ उन देशों से आम जनता की नौकरी के साथ-साथ क्रय शक्ति भी चली गई. भारत एवं चीन जैसे देशों में नौकरियां तो मिलीं, लेकिन कुछ ही लोगों को. पूरी दुनिया नौकरी-विहीन आर्थिक विकास (जॉबलेस ग्रोथ) की ओर बढ़ने लगी, जिससे अमीर-ग़रीब के बीच की आर्थिक खाई बढ़ने लगी. आम जनता की क्रय शक्ति कम होने के कारण इन उत्पादों और सेवाओं की मांग ़खत्म होने के कगार पर आ गई.

आज चीन में बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं. चीन में ऑरडोन जैसे घोस्ट टाउन यानी भूतिया शहर की तादाद बढ़ती जा रही है, जहां सारी सुविधाएं हैं, स़िर्फ रहने वाले ही नहीं हैं. भारत में भी नौकरियों की कमी, खाली पड़े फ्लैट, बैकों द्वारा दिए भारी-भरकम कर्ज, जिनका लौटना मुमकिन नहीं दिख रहा और औने-पौने दामों पर बिकती फैक्ट्रियां अर्थव्यवस्था के दरकने की कहानी बयान कर रही हैं.

हर बार हम जब शेयर बाज़ार में गिरावट देखते हैं, तो बाज़ार में सुधार की हमारी उम्मीद और बढ़ जाती है, लेकिन यह खेल वर्ष 2008 से चल रहा है. जब भी शेयर बाज़ार में गिरावट होती है, तो अर्थशास्त्री कहने लगते हैं कि जल्दी ही अर्थव्यवस्था में वी की आकृति में सुधार होगा. फिर वे अपनी भविष्यवाणी बदल देते हैं और कहने लगते हैं कि अभी सुधार में समय लगेगा और सुधार यू की आकृति में होंगे. लेकिन, फिर भी जब सुधार का कोई संकेत नहीं दिखता, तो उन्हें डब्ल्यू की आकृति में सुधारों की भविष्यवाणी करनी पड़ती है.

अभी हाल में विश्वविख्यात अर्थशास्त्री एवं रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने इंग्लैंड में बोलते हुए विश्व अर्थव्यवस्था के भयानक आर्थिक मंदी में जाने की आशंका व्यक्त की, परंतु अगले ही दिन सरकार की तऱफ से स्पष्टीकरण आया कि यह विचार भारत के रिजर्व बैंक के गवर्नर के नहीं हैं. तब हमें मानना पड़ेगा कि यह विचार एक निष्पक्ष एवं कुशल अर्थशास्त्री के हैं, जिन्होंने वर्ष 2008 की आर्थिक मंदी की समय रहते सटीक भविष्यवाणी की थी.

आशावाद अच्छा है, लेकिन अति आशावाद कभी-कभी हानिकारक होता है. हमारे नीति निर्माताओं की यह सोच है कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था के इस संकट से अछूता रहेगा, क्योंकि यहां की बड़ी आबादी और अंदरूनी मांग ही सब कुछ संभाल लेगी.ङ्क्ष इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत की अंदरूनी मांग है, लेकिन हम इसे कैसे सुनिश्चित करेंगे कि इस मांग को चीनी कंपनियां पूरा नहीं करेंगी या किसी और देश की कंपनियां इस पर निगाह नहीं गड़ाएंगी?

आप बड़ी चतुराई से अपने उत्पादों एवं सेवाओं को दूसरे देशों में आउटसोर्स कर सकते हैं, लेकिन आप अपनी समस्याओं को आउटसोर्स नहीं कर सकते. आज अगर भारत के सबसे संपन्न राज्यों में से एक में आरक्षण की मांग उठती है, तो हम यह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि सूरत जैसे शहर, जो हीरे की पॉलिश के लिए पश्चिमी देशों की आउटसोर्सिंग का हब बना हुआ था, की लाखों फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और लाखों लोग वहां नौकरियों से हाथ धो चुके हैं.

जिस आउटसोर्सिंग के मॉडल को विश्व की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता था, वह आज सवालों के घेरे में है! अर्थनीति निर्माताओं एवं अर्थशास्त्रियों के सामने यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि जिस आउटसोर्सिंग के आधार पर वैश्विक अर्थव्यवस्था का ताना-बाना बुना गया, कहीं वही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी तो नहीं बन गई है?

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