चुनौती सबके लिए है सत्ता बचाने की सत्ता पाने की

बिहार की चुनावी रणभूमि सज गई है. राजनेताओं के नाते-रिश्तेदारों और बागियों की भारमार के साथ राज्य विधानसभा के पहले चरण के चुनावी योद्धा अपने लाव-लश्कर के साथ मैदान में उतर चुके हैं. राज्य विधानसभा की 243 सीटों के लिए पांच चरण में मतदान होना है. बारह अक्टूबर को पहले चरण में दस जिलों की कुल 49 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे.

चार दर्जन से अधिक ये निर्वाचन क्षेत्र मिथिला की धरती समस्तीपुर से लेकर मगध की धरती तक फैले हुए हैं. महाकवि विद्यापति की कर्मभूमि कल्याणपुर से लेकर बिहार के सीमावर्ती निर्वाचन क्षेत्र रजौली के मतदाता पहले चरण में मतदान करेंगे. इस दोनों ध्रुवों के बीच अंगभूमि, भागलपुर-मुंगेर प्रमंडलों में भी इसी दिन वोट डाले जाने हैं. हालांकि ये विधानसभा वोटरों की अभूतपूर्व और तीखी राजनीतिक गोलबंदी के बीच हो रहे हैं.

लेकिन अपने राजनीतिक चरित्र में इसमें दो गठबंधनों के बीच सीधा मुक़ाबला है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) व राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल(यू) एवं कांग्रेस के महा-गठबंधन के घटक दलों ने आम तौर पर पूरे राज्य में सीधी टक्कर का ही माहौल बनाया है. पर, वास्तविकता यह भी है कि समाजवादी धर्मनिर्पेक्ष मोर्चा के नाम से स्वघोषित तीसरे मोर्चे और वामपंथी मोर्चा(जिसमें छह वाम दल शामिल हैं) के कई उम्मीदवारों ने अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में इस मुक़ाबले को त्रिकोणीय या बहु-कोणीय बना दिया है.

प्रथम चरण के मतदान में कई नेताओं की साख दांव पर हैं- कुछ स्वयं चुनाव मैदान में हैं, तो कुछ के नाते-रिश्तेदार. हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के नेता शकुनी चौधरी (तारापुर), भाकपा (मा) के बड़े नेता रामदेव वर्मा (विभूतिपुर), बिहार सरकार के ताकतवर मंत्री विजय कुमार चौधरी (सरायरंजन), कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति मेवालाल चौधरी (तारापुर) आदि बड़े नाम पहले चरण में ही मतदाताओं के आर्शीवाद की उम्मीद कर रहे हैं.

इनके अलावा, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के सुप्रीमो उपेन्द्र कुशवाहा के पुराने व पसंसदीदा क्षेत्र उजियारपुर में भी पहले चरण में ही मतदान होना है, और यहां एनडीए की तरफ से लोक समता दल के प्रत्याशी ही चुनावी मैदान में हैं. कुछ नामचीन बाहुबलियों की किस्मत का फैसला भी इसी तारीख को ईवीएम में कैद हो जाएगा. इनमें प्रह्लाद यादव (राजद, सूर्यगढ़ा), प्रदीप कुमार (जदयू- वारसलीगंज), राजवल्लभ प्रसाद (राजद, नवादा), कौशल यादव (जदयू-हिसुआ), रामलखन सिंह (भाजपा- तेघड़ा) नरेन्द्र कुमार सिंह (जदयू- मटिहानी) आदि प्रमुख हैं.

बाहुबलियों की पत्नी व अन्य रिश्तेदार भी कई विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव मैदान में हैं. राजनेताओं की अगली पीढ़ी तो सामने आ ही रही हैं, अन्य नाते-रिश्तेदारों को भी राजनीतिक खेल में उतरने का मौका दिया जा रहा है. लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने अपने भतीजे और सांसद रामचन्द्र पासवान के पुत्र प्रिंस राज (कल्याणपुर) को राजनीति के मैदान में उतार रहे हैं, तो उनकी ही पार्टी के नेता नामचीन बाहुबली सूरजभान ने अपने रिश्तेदार रमेश राय (विभूतिपुर) को मौका दिया है. भाजपा के नैतिकतावादी मुखर नेता-सांसद अश्विनी कुमार चौबे अपने पुत्र अर्जित शाश्वत के लिए भागलपुर से उम्मीदवारी हासिल करने में कामयाब रहे. इसी तरह हम के नेता शकुनी चौधरी इस चुनाव के जरिए अपने दूसरे पुत्र राजेश कुमार उर्फ रोहित (खगड़िया) को लॉन्च कर रहे हैं.

तारापुर की जद(यू) विधायक नीता चौधरी की जगह इस बार उनके पति और कृषि वैज्ञानिक मेवालाल चौधरी को उम्मीदवार बनाया गया है. कटोरिया (सु) के विधायक सोनेलाल हेम्ब्रम की बहु निक्की हेम्ब्रम इस बार अपने ससुर की इच्छा का पालन कर रही हैं, और कटोरिया से क्षेत्र से भाजपा की प्रत्याशी हैं. इस चुनाव के जरिए राजनीति में इन सभी की लॉन्चिंग हो रही है. नए राज-घरानों का विस्तार हो रहा है. लेकिन इनके अलावा और भी उम्मीदवार हैं जो अपने खानदान के राजनीतिक रूतबे और विरासत को आगे बढ़ाने के लिए दूसरी या तीसरी बार चुनाव मैदान में डटे हैं.

बिहार में होने वाले चुनाव हिंसा और रक्तपात के लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होते रहे हैं. यह अब इतिहास की बात हो गई है. इस तथ्य पर गौर करने के बावजूद, यहां बाहुबलियों के गैंगवार और नक्सली हिंसा की आशंका सदैव बनी रहती है, खासकर चुनावों के समय. प्रथम चरण में जिन निर्वाचन सीटों पर चुनाव होने हैं उनमें से तकरीबन चालीस प्रतिशत कमोवेश नक्सल प्रभावित हैं, इन क्षेत्रों में सदैव हिंसक घटनाएं होती रही हैं.

ये वे इलाके हैं जहां नक्सली हमले में एसपी मारे गए, पुलिस दल का अपहरण कर लिया गया और निर्माण कार्यों में लगे लोगों के अपहरण की घटनायें हमेशा होती रहती हैं. चकाई, जमुई, झाझा, रजौली, हिसुआ, नवादा, सूर्यगढ़ा, लखीसराय, कटोरिया, बेलहर, बांका, सिकन्दरा, जमालपुर, मुंगेर जैसे तकरीबन डेढ़ दर्जन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र नक्सलियों के सुरक्षित इलाके माने जाते हैं.

जबकि गोविंदपुर, वारसलीगंज, नवादा, सूर्यगढ़ा, लखीसराय, मुंगेर, मटिहानी, तेघड़ा, खगड़िया, गोपालपुर, बिहपुर, बेलदौर जैसे कई निर्वाचन क्षेत्र बाहुबलियों के क्रीड़ा केंद्र रहे हैं. इन क्षेत्रों में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराना की प्रशासन के लिए चुनौती रहा है. इस बार भी प्रशासन का दावा है कि नक्सली हिंसा समेत अन्य सभी हिंसाओं को नियंत्रित करने के सारे उपाय कर लिए गए हैं. केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल के दस्ते बिहार पहुंचने लगे हैं और उनकी तैनाती भी शुरू हो गयी है.

चुनाव अपने आप में उत्तेजक होते ही हैं, पर इस बार उत्तेजना पिछले चुनावों की तुलना में कुछ अधिक ही है. बिहार विधानसभा का यह चुनाव साम, दाम, दंड और भेद का उत्तम नमूना है. सत्ता के दोनों दावेदार(एनडीए और महागठबंधन) बागी उम्मीदवारों से त्रस्त हैं. यह सत्य है कि एनडीए के घटक दलों में बेटिकट लोगों की संख्या महा-गठबंधन के दलों की तुलना में काफी कम है. लोजपा और रालोसपा के कोई विधायक थे ही नहीं, हम के सभी विधायकों को जगह मिल ही गई है लेकिन, भाजपा ने अपने एक दर्जन से अधिक विधायकों को इस बार टिकट से वंचित कर दिया.

इनमें सबसे अधिक चर्चा ब्रह्मपुर (बक्सर) से बेटिकट दिलमणि देवी को लेकर हुई है. बिहार में भाजपा को खड़ा करने में दधीचि की भूमिका निभाने वाले कैलाशपति मिश्र की बहु के पराभव पर काफी कुछ कहा गया. इसी तरह चंद्रमोहन राय (चनपटिया), रश्मि वर्मा (नरकटियागंज), विक्रम कुंवर(रघुनाथपुर), आनंन्दी यादव (सिकटी), पद्‌मपराग राय वेणु (फॉरबिसगंज) आदि को भी बेटिकट कर दिया गया. पहले चरण में भाजपा ने तेघड़ा से ललन कुंवर, पीरपैंती(सु) से अमन कुमार और रजौली(सु) से कन्हैया कुमार को बाहर का रास्ता दिखा दिया. लेकिन महा-गठबंधन में तो इसकी तुलना काफी लोगों को बेटिकट किया गया और ऐसा कर लालू प्रसाद के पुत्रों सहित अनेक नेताओं के नाते-रिश्तेदारों को राजनीति में लॉचिंग का मौका दिया गया.

इसके बाद चुनावी समीकरण की गोटी फिट करने के ख्याल से भी कई विधायकों को बेटिकट कर नए प्रत्याशियों को टिकट दिए गए. बहुतों का आरोप है कि ऐसा केवल अपने खासम-खास को जगह देने के लिए ही किया गया. जहां जद(यू) के कुल 32 विधायक बेटिकट हुए, वहीं राजद के दस. जद(यू) ने स्वास्थ्य मंत्री रामधनी सिंह और मत्स्य पालन मंत्री बैद्यनाथ सहनी को टिकट नहीं दिया. पहले चरण में महा-गठबंधन के जिन नेताओं को बेटिकट होना पड़ा उनमें मंत्री बैद्यानाथ सहनी (मोरवा) सहित जदयू के रामचंद्र सदा (अलौली), नरेन्द्र कुमार नीरज (गोपालपुर), अनन्त कुमार सत्यार्थी (मुंगेर), गजानंद शाही (बरबीघा) व रामेश्वर पासवान (सिकन्दरा) और राजद के अजय कुमार बुल्गानिन (मोहिउद्दीन नगर), दुर्गाप्रसाद सिंह (उजियारपुर) आदि हैं.

दोनों गठबंधनों(एनडीए और महा-गठबंधन) के बेटिकट या उम्मीदवारी की दौड़ में उपेक्षित राजनेताओं का नया ठिकाना समाजवादी पार्टी, एनसीपी और पप्पू यादव की जअपा सहित कुछ अन्य दलों का समाजवादी धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बन गया है. इस मोर्चे के अलग-अलग दलों में शामिल होकर महा-गठबंधन या एनडीए के अलग-अलग दलों के ये बागी और बेटिकट अपने पूर्व दल को चुनौती देने को बेताब हैं.

बेटिकट व बागियों की ऐसी जमात सूबे के दोनों के राजनीतिक ध्रुवों के लिए परेशानी का सबब है. पहले चरण के चुनावों में बेटिकट व बागियों की यह जमात समस्तीपुर, उजियारपुर, मोरवा, मोहिउद्दीननगर, परबत्ता, भागलपुर, मुंगेर, रजौली, झाजा, चकाई सिकन्दरा आदि कई निर्वाचन क्षेत्रों में काफी महत्वपूर्ण हो जायेगी. चकाई की सीट तो एनडीए में लोजपा और हम के वीच विवाद का कारण बन गई. निवर्त्तमान विधायक व पूर्व क़ृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह के पुत्र सुमित सिंह को एनडीए के विद्रोही के तौर पर चुनाव में उतारना पड़ा है. यह सीट लोजपा, हम और नरेन्द्र सिंह के लिए मूंछ का सवाल बन गई है.

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में महा-गठबंधन की प्रतिष्ठा दांव पर है. गत विधानसभा चुनाव और उसके बाद के उप-चुनावों में इन 49 सीटों में से 37 पर
महा-गठबंधन के दल काबिज हुए. इनमें से 31 सीटों पर तो सत्तारुढ़ जद(यू) काबिज है जबकि चार सीटों पर राजद और दो सीटों पर कांग्रेस. हालांकि, पिछले संसदीय चुनाव में हालत बदल गई और इस हिस्से के समस्तीपुर, उजियारपुर, बेगूसराय, मुंगेर, जमुई, नवादा आदि संसदीय सीटों पर एनडीए क़ाबिज हुआ था, जबकि भागलपुर और बांका में राजद.

इस लिहाज से देखें तो दोनों राजनीतिक ध्रुवों के लिए विधानसभा चुनाव का यह चरण अग्निपरीक्षा जैसा है. महा-गठबंधन के सामने इन सीटों पर जीत का परचम लहराये रखने की चुनौती है तो एनडीए के सामने संसदीय चुनाव के अपने प्रदर्शन को दोहराने की. हालांकि चुनावी हवा का मौजूदा रूख एनडीए के पक्ष में दिखाई पड़ रहा है, लेकिन संसदीय चुनाव के प्रदर्शन को दोहराना उसके लिए असंभव जैसा ही है. समस्तीपुर, भागलपुर, बेगूसराय, खगड़िया, जमुई आदि जिलों में एनडीए आंतरिक रूप से बंटा हुआ है. हालांकि यह विभाजन नाराजगी के स्तर पर है.

यह नाराजगी बाहरी या वंशवादी उम्मीदवारों को टिकट दिये जाने को लेकर है. सामाजिक विभाजन भी अपना काम कर रहा है. बागियों की मार एनडीए के बनिस्वत महा-गठबंधन पर अधिक है. माय को छोड़कर अन्य कोई दबंग मतदाता समूह इसके साथ दिखाई नहीं पड़ रहा है. हालांकि अतिपिछड़ी जातियों के मतदाताओं में उसकी स्थिति एनडीए की तुलना में बेहतर है और महादलितों के एक समूह का वोट भी उसकी ओर जाता दिख रहा है.

लेकिन उसके लिए एक और परेशानी वाम मोर्चा है. समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, नवादा, जमुई आदि जिलों के कई निर्वाचन क्षेत्रों में महा-गठबंधन के लिए वाम दल संकट पैदा कर रहे हैं. वस्तुतः इन दलों के उम्मीदवारों को एनडीए विरोधी वोट ही मिल रहे हैं. लेकिन अब तक की हवा महा-गठबंधन को इतनी उम्मीद दे रही है कि संसदीय चुनाव की अपेक्षा इस बार उसकी हालत बेहतर रहेगी.