अभिव्यक्ति की आज़ादी की राजनीति

Freedam
कन्नड़ के साहित्यकार प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के बाद दक्षिण भारत, खासकर कर्नाटक में साहित्यिक विवाद लगातार गहराता जा रहा है. हिंदी जगत में भी जादुई यथार्थवादी कथाकार उदय प्रकाश ने भी इसे एक अवसर की तरह देखते हुए अकादमी पुरस्कार लौटाने का ऐलान करके गर्माने की कोशिश की. साहित्य से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि गर्माने की नहीं, भुनाने की कोशिश की.

इसी तरह से जनवादी लेखक संघ और चंद लेखकों ने भी इस पर एतराज जताते हुए आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन खास विचारधारा के इन लेखकों की साख इतनी नहीं है कि हिंदी जगत आंदोलित हो सके. खैर, यह मुद्दा नहीं है. मुद्दा यह है कि कालबुर्गी की हत्या के बाद कर्नाटक के जो तमाम छुटभैये संगठन हैं, जो हिंदुत्व के नाम पर अपनी दुकान चला रहे हैं, उन्होंने भी इसे एक अवसर की तरह देखा और प्रचार पिपासा ने उन्हें आक्रामक कर दिया.

ताजा मामला है, कथित तौर पर बजरंग दल से जुड़े एक कार्यकर्ता द्वारा दी गई धमकी. बजरंग दल से जुड़े होने का दावा करने वाले एक शख्स ने कर्नाटक के रैशनलिस्ट माने जाने वाले लेखक केएस भगवान को जान से मारने की धमकी देते हुए एक ट्‌वीट किया है. खबर के आम होने के बाद पुलिस ने केएस भगवान को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया करा दी. हिंदी जगत के कई उत्साही लेखकों ने इसे फासीवाद के आसन्न खतरे की तरह देखा और केंद्र सरकार से जोड़कर छाती कूटने लगे.

फासीवाद का राग बहुत लंबे समय से भारत में बजाया जा रहा है, लेकिन अब तक फासीवाद आ नहीं पाया है. दरअसल, फासीवाद-फासीवाद चिल्लाने वाले लोगों को भारतीय लोकतंत्र में आस्था और उसकी ताकत में भरोसा नहीं है. भारतीय लोकतंत्र अब इतना मजबूत हो चुका है कि उसे किसी भी तरह से भटकाना या भरमाना बहुत मुश्किल है. इंदिरा गांधी ने 1975 में एक कोशिश की थी, लेकिन देश की जनता ने दो साल में ही उन्हें सबक सिखा दिया था. अब शायद ही कोई ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाए.

कर्नाटक अथवा यह कहें कि पूरे दक्षिण भारत में साहित्यिक कृतियों के खिलाफ  इस तरह की घटनाएं पहले भी घटती रही हैं, धमकियां आदि भी दी जाती रही हैं, लेकिन प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या के बाद ़खतरा अवश्य बढ़ गया है. एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते यहां हर किसी को अपनी बात कहने का जितना हक़ है, उतना ही उस पर विरोध जताने का हक़ भी है, लेकिन हत्या करना या क़ानून को अपने हाथ में लेना बेहद आपत्तिजनक और घोर निंदनीय है.

अब अगर हम दक्षिण भारत में इस तरह की बढ़ती घटनाओं की वजहों की तह में जाएं, तो लगता है कि इसके लिए वहां की सामाजिक संरचना और कुरीतियां बहुत हद तक ज़िम्मेदार हैं. वहां के कई लेखकों ने सामाजिक विषमता के मद्देनज़र अपनी लेखनी से उस पर ज़ोरदार प्रहार किया. लेखकों ने समाज में व्याप्त विसंगतियों के लिए धर्म को ज़िम्मेदार मानते हुए विरोध की ध्वजा थामी. संभव है कि उन्हें यह बेहतर आधार लगा हो. धर्म के इस विरोध में कई बार तो लेखन की मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पार हो गई.

जैसे अगर हम केएस भगवान की ही बात करें, तो उन्होंने 1985 में एक किताब लिखी थी, शंकराचार्य एंड रिएक्शनरी फिलॉसफी. इस किताब में उन्होंने शंकराचार्य को जातिवाद की वकालत करने वाला साबित करने की कोशिश की थी. संस्कृत के श्लोकों के आधार पर उन्होंने प्रतिपादित किया था कि शंकराचार्य दलितों और स्त्रियों के खिलाफ थे. केएस भगवान का कहना था कि शंकराचार्य दलितों और स्त्रियों की शिक्षा के खिलाफ थे. उस वक्त जब उनकी किताब आई थी, तब भी उनका विरोध हुआ था, धरने-प्रदर्शन हुए थे.

उसके बाद भी प्रोफेसर भगवान अपने स्टैंड पर कायम रहे थे और यह सही भी था. उन्होंने फरवरी में एक सेमिनार में कहा कि भगवद् गीता के नवें अध्याय को जला दिया जाना चाहिए, क्योंकि उसमें स्त्री, वैश्य और शूद्र को पापी कहा गया है.

आरोप है कि अभी सितंबर में एक सेमिनार में प्रोफेसर भगवान ने कथित तौर पर कहा कि भगवद् गीता पढ़ने वाला आतंकवादी बन सकता है. उनके खिलाफ मुक़दमा करने वालों का इल्जाम है कि एक सेमिनार में उन्होंने राम और कृष्ण के बारे में भी आपत्तिजनक टिप्पणी की और कहा कि वे अपने जैविक पिता की संतान नहीं थे. इस तरह के वक्तव्य के बाद उनका विरोध हुआ और उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं भड़काने का मुक़दमा भी दर्ज किया गया.

भारत के संविधान में हर किसी को अपनी बात कहने का हक़ हासिल है, लेकिन उसी संविधान में अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा भी तय की गई है. दोनों के बीच एक बहुत बारीक-सी रेखा है, जिसे बहुधा जोश में लोग लांघ जाते हैं. परिणाम यह होता है कि परिधि पर बैठे लोगों को केंद्र में आने का मा़ैका मिल जाता है और वे उग्र-हिंसक होने लगते हैं, जो क़ानून सम्मत नहीं है तथा जिसकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है. विचारों की लड़ाई विचार से लड़ी जा सकती है, बंदूक से नहीं.

बंदूक से विचार को मानने के लिए बाध्य करने का सोवियत रूस और चीन का लंबा इतिहास रहा है, जो कि भारत के लिए मुफीद नहीं है. भारत की जनता बार-बार इसे ठुकरा भी चुकी है.

विचारों की लड़ाई का एक उदाहरण गांधी जी के हवाले से समझा जा सकता है. 1927 में एक अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने मदर इंडिया नाम से एक किताब लिखी थी, जिसमें भारत के बारे में बहुत ही ग़लत बातें लिखी गई थीं. उस किताब के प्रकाशन के बाद विंस्टन चर्चिल बेहद खुश हुए थे और उन्होंने अपनी खुशी का सार्वजनिक इजहार भी किया था. तब महात्मा गांधी ने उस किताब की समीक्षा लिखकर अपना तगड़ा एतराज जताया था. महात्मा गांधी ने तब लिखा था, अगर मिस मेयो भारत में स़िर्फ यहां की खुली नालियां और गंदगी देखने के नज़रिये से आई थीं, तो उनकी इस किताब के बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ होगा.

पर अगर वह अपने घृणित और बेहद आपत्तिजनक ग़लत निष्कर्षों को अपनी जीत और महान खोज की तरह देखती हैं, तो लेखिका की मंशा जानने के बाद कुछ कहने को शेष नहीं रहता. इस तरह से उन्होंने उस किताब को दो-तीन वाक्यों में खारिज कर दिया था और विंस्टन चर्चिल को भी जवाब दे दिया था. विचारों से लड़ने का यह तरीका ही सबसे अच्छा है. तर्कों को तर्कों से काटा जाए, तर्कों को अपने विचारों से खारिज किया जाए.

आज जो लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने की कोशिश करते हैं और आज़ादी के लिए खतरा बताते हैं, उन्हें एक और संदर्भ याद रखना चाहिए. संविधान में पहले संशोधन को लेकर बहुत ज़ोरदार बहस हो रही थी. मसला कुछ मौलिक अधिकारों को लेकर संशोधन का था. कई मसलों के अलावा संविधान के अनुच्छेद 19 में जो अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रावधान है, उस पर कुछ अंकुश लगाए जाने की बात हो रही थी.

जवाहर लाल नेहरू, सी राजगोपालाचारी एवं अंबेडकर समेत कई नेता इस पक्ष में थे कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पूर्ण नहीं होनी चाहिए. बहस के दौरान जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि आज़ाद प्रेस युवाओं के दिमाग में ज़हर भर रहा है. तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी अकेले ऐसे शख्स थे, जिन्होंने यह लड़ाई लड़ी थी और कहा था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पर किसी भी तरह का अंकुश जायज नहीं होगा. कालांतर में यह तथ्य बेहद चालाकी से दबा दिया गया. दरअसल, इसके पीछे की पृष्ठभूमि यह थी कि 1950 में क्रास रोड नामक पत्रिका में नेहरू की नीतियों की जमकर आलोचना हुई थी और नेहरू उससे खफा होकर प्रेस पर अंकुश लगाना चाहते थे.

तत्कालीन मद्रास सरकार ने क्रास रोड पर पाबंदी लगाई थी. आज़ाद भारत में यह पहली पाबंदी थी. क्रास रोड उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई थी और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोमेश थापर का केस अब भी कई मामलों में नजीर बनता है. अब वक्त आ गया है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर एक बार फिर से राष्ट्रव्यापी बहस हो, जिसमें तथ्यों को समग्रता में रखकर देखा जाए और देश किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे, तभी विचारों की लड़ाई में खून खराबा नहीं होगा.