जल की असुरक्षा का सवाल घातक है

waterजल की असुरक्षा का मामला काफी गंभीर रूप ले चुका है. ग्रामीण एवं शहरी, दोनों इलाकों के करोड़ों लोगों के पास पीने के लिए पानी नहीं है. आर्द्र भूमियों एवं भूमिगत जलधाराओं का कुप्रबंधन, वर्षा जल संचय करने वाले इलाकों का क्षरण, बार-बार सूखा, आबादी का अति संकेंद्रन, सतही एवं भूमिगत जलस्रोतों का प्रदूषण आदि इसके प्रमुख कारण हैं. इन समस्याओं के मूल में नीतियों की विफलता सबसे प्रमुख है. प्रबंधन, प्रदूषण एवं पानी के मूल्य से संबंधित नीतियों के अलावा जल संसाधनों पर महाकाय कॉरपोरेशनों और अभिजात्य तबके का कब्जा भी प्रमुख कारण है. भूमिगत पानी एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है.

खेती, उद्योगों एवं शहरी ज़रूरतों के लिए पानी का दोहन देश के कई भागों में इस स्तर तक पहुंच चुका है कि भूमिगत जलधाराएं तेजी से सूखती जा रही हैं. ग्रामीण भारत में आधी से ज़्यादा भूमिगत जलराशियों की भरपाई उतनी तेजी से नहीं हो रही है, जितनी तेजी से उनका दोहन हो रहा है. संसद के एक सवाल के जवाब में सरकार ने भी कहा था कि देश के एक तिहाई ज़िलों में भूमिगत पानी पीने के लायक नहीं है, क्योंकि उसमें लोहे, फ्लोराइड, आर्सेनिक और खारेपन की मात्रा बहुत ज़्यादा है.

देश के 20 राज्यों के 2.5 करोड़ लोग फ्लोरोसिस एवं अन्य जल विषाक्तता से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, फ्लोराइड और उससे होने वाली बीमारियों की गंभीरता की जानकारी सामने आए सात-आठ दशक बीत जाने के बावजूद न तो कोई प्रभावी कार्यवाही दिख रही है और न उसके निदान के लिए कोई ठोस कार्यक्रम लागू किए गए हैं. ऐसे में ज़रूरत इस बात की है कि हम बीमारियों से निपटने पर खर्च करने के बजाय पानी के प्रबंधन पर ध्यान दें. फ्लोराइड नॉलेज एंड एक्शन नेटवर्क एवं इंडिया वाटर पोर्टल की रिपोर्ट में जल में फ्लोराइड विषाक्तता से निपटने के लिए सुदूर इलाकों पर केंद्रित नीति पर ठोस कार्यक्रम बनाकर ज़मीनी स्तर पर उसे क्रियान्वित करने की ज़रूरत बताई गई है.

झाबुआ एवं अन्य आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में शोध करने वाले प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार सिकरवार ने बताया कि हाल के वर्षों में यह देखने में आया है कि फ्लोराइड की अधिक मात्रा गुर्दे के साथ ही कई प्रकार के उत्तकों एवं एंजाइम की क्रिया-विधि को भी प्रभावित करने लगी है. सबसे दु:खद बात यह है कि फ्लोरोसिस से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले सात से 12 वर्ष के बच्चे हैं, जो दांत संबंधी फ्लोरोसिस से ग्रस्त हैं.

रिपोर्ट में विशेषज्ञों मीनाक्षी अरोड़ा एवं केसर ने कहा कि आज से तीन-चार दशक पहले तक पानी का बंटवारा कम से कम कृषि जल, पेयजल, कच्चा पानी जैसे विभिन्न रूपों में नहीं होता था. कुओं, तालाबों, झीलों एवं नदियों में कचरा डालकर उन्हें गंदा करने का काम किया गया. पिछले तीस-चालीस वर्षों में हमारी निर्भरता भूजल पर हो चली है, जिसने भूतल स्थित लवण पेयजल में ला दिए हैं. आज भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, यूरेनियम, आयरन एवं नाइट्रेट आदि काफी मात्रा में पाए जा रहे हैं. इन तत्वों से युक्त पानी ही बच्चों में होने वाली अधिकतर बीमारियों का कारण है.

ग़रीब और विकासशील देशों में 80 ़फीसद से ज़्यादा रोग जलजनित हैं. एक शोध में पाया गया है कि झाबुआ एवं उससे लगे क्षेत्रों में फ्लोराइड की मात्रा 1.24 पीपीएम से 7.38 पीपीएम तक पाई गई है, जो सामान्य स्तर 1.5 पीपीएमी से बहुत ज़्यादा है. इंटरनेशनल स्टैंडर्ड जैसे अमेरिकन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन एवं इंडियन स्टैंडर्ड आदि ने पीने के पानी में फ्लोराइड की अधिकतम मात्रा 1.5 पीपीएम निर्धारित की है.जल से जुड़े विषयों पर काम करने वाले एन देवराज रेड्डी ने कहा कि जब पीने के पानी में 1.5 से तीन पीपीएम तक फ्लोराइड की मात्रा होती है, तो उससे डेंटल फ्लोरोसिस होता है. यह पीले धब्बों में परिवर्तित होने लगता है.

अंत में दांतों का टूटना शुरू हो जाता है. पीने के पानी में तीन से 10 पीपीएम तक की मात्रा में फ्लोराइड होने और कई वर्षों तक उसका निरंतर सेवन करने से स्केलेटल फ्लोरोसिस या अस्थि फ्लोरोसिस हो जाता है. इसके कारण शरीर के अंग साधारण तरीके से मोड़े नहीं जा सकते और रोगी स्वयं चल-फिर भी नहीं सकता. सामाजिक कार्यकर्ता सुंदरराजन कृष्णन के अनुसार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं बिहार समेत कई राज्यों में फ्लोरोसिस से लोगों के शरीर पर घातक प्रभाव पड़ रहा है. इससे बच्चों एवं बुजुर्गों की हड्डियां और दांत कमज़ोर हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि इसकी रोकथाम के लिए उठाए जा रहे क़दम कारगर साबित नहीं हो रहे हैं, क्योंकि संबंधित नीतियां और कार्यक्रम ज़मीनी हक़ीक़त को ध्यान में रखकर नहीं तैयार किए जा रहे हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में आर्सेनिक और देश के विभिन्न राज्यों के भूजल में फ्लोरिन-नाइट्रेट की बहुतायत है. अत: इस दिशा में समुचित प्रयास करने की ज़रूरत है. भारत में पानी का इस्तेमाल लगभग 750 अरब घनमीटर है, जो उपलब्ध जल भंडारों से लगभग 1969 अरब घनमीटर कम है. लेकिन, यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2025 तक हमारे जल भंडार और पानी की हमारी ज़रूरत, दोनों बराबर हो जाएंगे तथा वर्ष 2050 तक पानी का इस्तेमाल उपलब्ध पानी की मात्रा से ऊपर जा चुका होगा. यह स्थिति तब है, जब हम पानी के केवल मानवीय उपयोग की बात करते हैं. यदि हम इसमें प्राकृतिक पारिस्थितिकीय तंत्र और दूसरी प्रजातियों के लिए पानी की ज़रूरतों का हिसाब जोड़ दें, तो हम पहले ही संकट में पहुंच चुके हैं.

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