युवा पीढ़ी अर्थहीन सरकारी प्रतिबंध बर्दाश्त नहीं करती

DENGUE-INDIAडेंगू मच्छर का अचानक इतना आतंक हो जाना चिंता की बात है. किसी ने भी यह उम्मीद नहीं की थी कि डेंगू फिर से इतने आक्रामक रूप से दिल्ली में पैर पसारेगा. मच्छर से संबंधित यह सबसे बड़ी चिंता का विषय है. डेंगू का मामला इसलिए भी अधिक चिंताजनक है, क्योंकि इसका मच्छर सा़फ पानी में पनपता है. यह मलेरिया के मच्छर की तरह गंदे पानी में नहीं पैदा होता. इससे मुश्किलें और बढ़ जाती हैं.

हालांकि, मुख्य समस्या स्वास्थ्य प्रणाली, अस्पतालों और सामान्य सा़फ-स़फाई का है, लेकिन केंद्र और दिल्ली सरकार को इसका जवाब देना है. भाजपा के दिल्ली चुनाव न जीत सकने के बाद से दिल्ली सरकार के प्रति केंद्र सरकार का रवैया कैसा है, यह सब जानते हैं. न स़िर्फ स्वास्थ्य सेवाओं, बल्कि पुलिस या क़ानून-व्यवस्था और नैतिक मूल्यों की राह में भी एक गंभीर बाधा है.

आप इस तरह से देश में संघवाद नहीं चला सकते और इस तरीके से शासन व्यवस्था नहीं चलती. इसके बजाय तो अच्छा यह होगा कि सभी राज्यों को भंग करके केंद्र सरकार पूरे देश पर राज करे. लेकिन यदि राज्य हैं, तो आपको याद रखना चाहिए कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टी सत्ता में हो सकती है. ज़ाहिर है, केंद्र की भाजपा सरकार के लिए यह शर्मनाक है कि ठीक नाक के नीचे दिल्ली विधानसभा में उसके तीन विधायक हैं.

केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह कम दु:खद बात नहीं है. मैं समझता हूं कि शायद इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब किसी राज्य में किसी एक पार्टी के सांसदों की संख्या उसके विधायकों की संख्या से ज़्यादा है. यह सचमुच एक हास्यास्पद आंकड़ा है.

लेकिन, मोदी को इन सब बातों से ऊपर उठना चाहिए. आ़िखरकार वह देश के प्रधानमंत्री हैं और वह इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं. इसलिए उन्हें अपनी पार्टी के क्षुद्र राजनीतिक खिलाड़ियों को प्रशासन और जनसमस्याओं के साथ खेलने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. मुझे यकीन है कि यदि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इस मामले को अपने हाथ में ले लेता है, तो इसे सुधारा जा सकता है.

यह कहा जा रहा है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पतालों को एक नोटिस भेजा है और जवाब के लिए एक महीने का समय दिया है. यह दु:ख की बात है. एक महीने क्यों? जवाब तो 24 घंटे के भीतर आना चाहिए. एक महीने में कई और लोगों की मृत्यु हो जाएगी. कुल मिलाकर यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. अपर्याप्त और मज़ाक जैसी स्थिति है. इसमें प्रधानमंत्री द्वारा प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की ज़रूरत है.

मुंबई, जहां मैं रहता हूं, वहां से एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा है. वहां जिन लोगों ने भाजपा को वोट देकर सत्ता तक पहुंचाया था, अब उनका मोहभंग हो रहा है. लोग अपने दैनिक जीवन में रोज़-रा़ेज के हस्तक्षेप से परेशान हो गए हैं. भाजपा को वोट देने वाले एक युवा मराठी लड़के ने मुझे एसएमएस भेजा. उस एसएमएस का अर्थ यही था कि मैंने बदलाव की बड़ी उम्मीदों के साथ भाजपा को वोट दिया था, लेकिन अपने जीवन में होने वाले हस्तक्षेप देखकर मैं निराश हूं.

मैं अपनी सरकार चुनने, क्या खाना है, क्या नहीं खाना है, क्या देखना चाहिए, क्या नहीं देखना चाहिए, इस सबका निर्णय करने में सक्षम हूं. दुर्भाग्य से ये लोग जनता की व्यक्तिगत पसंद में हस्तक्षेप कर रहे हैं. अब मैं अपनी जिज्ञासा का हल पा रहा हूं कि कैसे कांग्रेस सभी भ्रष्टाचार के बावजूद 60 वर्षों तक शासन कर सकी. वजह, उसने कभी लोगों के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया.

अब एक चरम प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन यह प्रतिक्रिया युवाओं की ओर से होगी. मैं 30 वर्ष या उससे कम उम्र के लोगों की बात कर रहा हूं. यह ठीक है कि 282 सीटों वाली अपनी खुद की सरकार के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) स्वाभाविक रूप से अपना एजेंडा लागू करने की कोशिश करेगा, लेकिन सरकार को यह सब समझना चाहिए. आरएसएस में भी युवा हैं. उन्हें एक सर्वे करना चाहिए कि अगली पीढ़ी क्या चाहती है. यहां तक कि आरएसएस समर्थक कट्टर हिंदू भी अपने जीवन में हस्तक्षेप पसंद नहीं करते हैं. हां, यदि कोई किसी को गोमांस खाने के लिए मजबूर कर रहा है, तो आप आपत्ति कर सकते हैं.

आपने मांस पर प्रतिबंध लगा दिया. यदि जैनियों का उत्सव है और कोई उस सोसायटी में मांस लाता है, तो आप मना कर सकते हैं, लेकिन ऐसे लोगों के भी मांस खाने पर प्रतिबंध क्यों, जिनका जैनियों से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है? इन चीजों को युवा पीढ़ी बर्दाश्त नहीं करेगी. युवा पीढ़ी जियो और जीने दो में यकीन रखती है. वह इस तरह का प्रतिबंध झेलने के लिए तैयार नहीं है. यदि मैं आपको प्रभावित नहीं कर रहा हूं, तो आप मुझ पर क्यों प्रतिबंध लगाएंगे?

यह एक दु:खद स्थिति है. बॉम्बे को-ऑपरेटिव सोसायटी ने मांसाहारी भोजन पर आपत्ति के ़िखला़फ अदालत का रुख किया है, लेकिन अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए. सोसायटी तो सोसायटी है. अगर वह एक प्रस्ताव पास करती है कि हमारे यहां केवल शाकाहारी लोग ही रहेंगे, तो आप उस पर आपत्ति नहीं कर सकते. लेकिन, आप यही नियम दूसरी बिल्डिंग्स के लिए या गली के हॉकर्स के लिए लागू नहीं कर सकते. आप अपनी सोच अन्य क्षेत्रों के लोगों के खाने, पहनावे या संगीत पर नहीं थोप सकते.

सरकार पांच या कहें कि साढ़े तीन वर्षों के लिए ही है. मैं समझता हूं कि प्रधानमंत्री को एक स्पेशल कमेटी बनानी चाहिए, जो हिंदुत्व की कल्चरल नेशनलिज्म के रूप में व्याख्या करे और बताए कि हिंदू संस्कृति क्या है? शाकाहार हिंदू संस्कृति का एक हिस्सा कभी नहीं था. 97 ़फीसद हिंदू मांसाहारी हैं. बाकी के लोग भी ऐसे नहीं हैं, जो आदतन शाकाहारी हैं. हो सकता है कि वे मांसाहार का खर्च उठाने में सक्षम न हों. आदतन केवल राजस्थान के शेखावाटी, गुजराती और कुछ तमिल ब्राह्मण ही शाकाहारी हैं. कई राज्यों में तो ब्राह्मण भी हार्डकोर मांसाहारी हैं.

इसलिए मुझे समझ में नहीं आता कि इस तरह का प्रतिबंध कैसे काम करेगा? कई विदेशी यात्रियों, जो भारत आए और जिन्होंने यहां के पांच सितारा होटल में बीफ खाया, ने मुझे बताया कि बेशक वह बीफ पश्चिम से आयातित था, लेकिन जिस तरह से उसे बनाया गया, उसका स्वाद पश्चिम से बेहतर था. आप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश चाहते हैं, विदेशियों को बुलाना चाहते हैं और दूसरी तऱफ दकियानूसी प्रतिबंध लगाते हैं. ऐसे कैसे काम चलेगा?

अब स्मार्ट सिटी की बात. सबसे पहले तो यह कि किसे नहीं मालूम कि यह स्मार्ट सिटी है क्या? लेकिन, आम तौर पर लोग यह समझ रहे हैं कि यहां पर सब कुछ बेहतर होगा. वाई-फाई होगा, तकनीक होगी. मेरे ख्याल से सरकार ने बहुत सारे शहरों का चयन कर लिया है. शुरुआत दस शहरों से करनी चाहिए थी. वह भी उन राज्यों के शहरों से, जो पहले से अच्छा कर रहे हैं. 100 शहरों को स्मार्ट शहर बनाना मुश्किल काम है.

अभी तक ऐसा ब्लूप्रिंट नहीं आया है, जिससे पता चले कि इसके लिए क्या आप ज़मीन का अधिग्रहण करेंगे या मौजूदा शहरों का ही विकास करेंगे. यह सब किसी को नहीं मालूम है. लेकिन, यदि सरकार इस सबको सफल करना चाहती है, तो उसके लिए विशेषज्ञों की ज़रूरत होगी. चार्ल्स कोरिया दुर्भाग्य से नहीं रहे, अन्यथा वह एक बेहतरीन टाउन प्लानर थे. वह बता सकते थे कि कैसे आगे जाना है. आपको उन्हीं के जैसा कोई और आदमी ढूंढना चाहिए, जो यह बता सके कि स्मार्ट सिटी का ब्लूप्रिंट क्या होना चाहिए. स्मार्ट शहरों को 12 या 18 महीने में विकसित नहीं किया जा सकता है.

इसमें समय लगेगा, कई साल लग सकते हैं. यदि काम की दिशा स्पष्ट हो, टाउन प्लानिंग स्पष्ट हो, तो यह वास्तविकता भी बन सकती है. मैं समझता हूं कि सरकार ने अपने हाथ में बहुत सारे काम ले लिए हैं, जैसे गंगा की स़फाई, स्मार्ट शहर और स्वच्छ भारत वगैरह-वगैरह. मुझे लगता है कि पर्याप्त योजना, सोच या पर्याप्त मानव संसाधन के बगैर उन्होंने बहुत सारे काम एक साथ शुरू कर दिए हैं. जितनी जल्दी वह इसे ठीक कर लें, परिणाम उतना ही अच्छा होगा.