सरकार की असंवेदनशीलता इन मौतों की वजह है

bosssअभी तक डेंगू के ऊपर सरकार कारगर ढंग से कोई कार्रवाई नहीं कर पाई है. जैसे डेंगू की दवाएं, प्लेटलेट्‌स की व्यवस्था. डेंगू जिन्हें हो चुका है, उनके लिए बिस्तर और डेंगू की जांच वैसी की वैसी महंगी चल रही है. सरकार के ऑर्डर को कोई नहीं मान रहा है. सरकार इनइफेक्टिव हो गई है. चाहे वह मोदी सरकार हो या केजरीवाल सरकार. इस बीमारी की वजह से जिनकी मृत्यु हो रही है, उनकी लाश तब तक अस्पताल नहीं दे रहे हैं, जब तक उन्हें इलाज का पूरा पैसा नहीं मिल जाता. टेस्ट किट अभी भी महंगी ही है.

दिल्ली के अस्पतालों में डेंगू के मरीज को दाखिल करने के लिए बिस्तर नहीं है. बड़े अस्पताल मैक्स हों, अपोलो हों या छोटे अस्पताल, हर जगह से लोगों को भगाया जा रहा है. एक बच्चे को लेकर 6 से 7 घंटे तक उसके मां-बाप अस्पताल-दर-अस्पताल घूमते रहे. उस बच्चे की मौत हो गई और अपने बच्चे को न बचाने के दुख में मां-बाप ने भी आत्महत्या कर ली और उसके बाद तो सिलसिला शुरू हो गया.

पर ये वो सिलसिला है, जो कैमरे की नजर में आ जाता है. बहुत सारे ऐसे बच्चे हैं, जो डेंगू से पीड़ित हैं, जो अस्पताल की तरफ जा ही नहीं पा रहे हैं, क्योंकि उनके पास ये खबर है कि अस्पताल बच्चों को अपने यहां भर्ती नहीं कर रहे हैं. सरकार कह रही है कि हमारे ऊपर सिर्फ एक हजार रुपये जुर्माना लगाने की ताक़त है, अधिकार है. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा साहब अस्पतालों को एक नोटिस भेजते हैं और कहते हैं कि एक महीने के भीतर इसका जवाब दीजिए. ये है संवेदनशीलता का आज का नमूना. दोनों सरकारें, केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार डेंगू जैसी बीमारी को लेकर असंवेदनशीलता दिखा रही हैं.

इसके अलावा दिल्ली वो जगह है, जहां पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी. साल भर में दिल्ली साफ नहीं हो पाई और सालभर में उन संस्थाओं की जिम्मेदारी भी तय नहीं हुई, जिनके ऊपर दिल्ली को साफ करने की जिम्मेदारी थी और जो सालभर के भीतर हम नागरिकों में भी ये भावना नहीं भर पाए कि किस तरीक़े से हम सफाई करें.

अभी हम डेंगू के बारे में कुछ नहीं कर पाए, सरकारें कुछ नहीं कर पाईं और एक नया खतरा स्वाइन फ्लू का आ रहा है. अ़खबारों और टीवी चैनलों ने स्वाइन फ्लू को लेकर चेतावनी दी है और ये चेतावनी सूचना के आधार पर सत्य साबित होती है. मुझे पूरा विश्वास है कि जब स्वाइन फ्लू फैल जाएगा, जब लोग मरने लगेंगे, तब सरकार चेतेगी और उसके बारे में कोई रणनीति बनाएगी. दरअसल, हमारे यहां प्रीकॉशन की या लोगों को चेतावनी देने की या लोगों को समझाने की या लोगों को सलाह देने की कोई व्यवस्था है ही नहीं. सरकार के सारे विभाग निकम्मे साबित हो रहे हैं.

सरकार नाम की संस्था चाहे मोदी सरकार हो या दिल्ली सरकार हो, हालांकि दिल्ली सरकार केन्द्र सरकार के अधीन ही है, पूरी तौर पर नकारा साबित हो रही हैं. मुझे कल एक बड़ी गंभीर बात किसी ने कही. उसने कहा आज से तीस साल पहले या चालीस साल पहले एक विभाग बना था मलेरिया डिपार्टमेंट, जिसके जिम्मे मच्छर मारने का काम था. आपमें से बहुत लोगों को याद होगा और दीवारों पर लिखते थे, न मच्छर रहेगा, न मलेरिया रहेगा.

थोड़े दिनों बाद वहां लिखना शुरू हुआ मच्छर तो रहेंगे, पर मलेरिया नहीं रहेगा. और मलेरिया कहां छूट गया पीछे, अब तो उससे बड़ी-बड़ी बीमारियां जैसे डेंगू, स्वाइन फ्लू आ गई हैं. कुछ ऐसे वायरल हैं, जिनका नाम हमें नहीं मालूम है. ये गंदगी और मच्छर की वजह से होते हैं. 67 साल की सफाई अभियान में लोगों की अरुचि, सरकार की काहिली, सफाई के ऊपर ध्यान देने वाले विभागों का बिल्कुल निष्क्रिय होना, हमारे सामने महामारी का खतरा देश में पैदा हो गया है. आबादी कम करने का अगर ये इलाज सरकार सोचती है, तो ये बहुत खतरनाक इलाज है, क्योंकि इसमें उनकी भी मौत हो सकती है, जो बड़े घरों के रहने वाले हैं. मुझे सनील दत्त जी याद हैं, जिनकी मौत ऐसी ही बीमारी की वजह से हुई थी.

सुनील दत्त के पास पैसे की कमी नहीं थी, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं पाए. इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि दिल्ली ही नहीं, सारे देश में, क्योंकि दिल्ली तो नमूना है, जहां कुछ हो ही नहीं रहा, सफाई, मच्छर, बैक्टीरिया को लेकर और आने वाली बीमारी के बचाव में क्या-क्या किया जा सकता है, इसको लेकर चुस्त और दुरुस्त होने की ज़रूरत है. अफसोस की बात यह है कि न सरकार चिंतित है न मीडिया चिंतित है. अब तो जब मैं आपसे बात कर रहा हूं, मीडिया ने अस्पतालों के हालात के ऊपर भी नजर डालना बंद कर दिया है, क्योंकि नजर डालेंगे, तो सरकार को थोड़ी परेशानी होगी, चाहे वो केजरीवाल सरकार हो या मोदी सरकार हो. परेशानी होगी तो टेलीविजन चैनल को परेशानी होगी, क्योंकि विज्ञापन नहीं मिलेंगे. यही हाल अ़खबारों का है.

लेकिन आप लोग सरकार में नहीं हैं. आप सरकार की इस काहिली के शिकार हैं या इन बीमारियों के सबसे ज्यादा शिकार हैं. आपसे मेरी अपील है कि आप लोग खड़े हों, खड़े होकर अपने आस-पास गंदगी के खिला़फ लड़ने की योजना बनाएं. अगर आप नहीं बनाएंगे तो निश्चित मानिए, जिनके पास साधन नहीं हैं, ज्यादा मौंते उनकी होती हैं. साधन का मतलब, जो अपोलो में नहीं जा सकते, मैक्स में नहीं जा सकते, मेदान्ता में नहीं जा सकते, ऐसे 90 प्रतिशत लोग हमारी दिल्ली में हैं और देश में हैं. बड़े अस्पतालों में भी जगह नहीं है और अगर जगह है, तो आधे घंटे के तीन-तीन लाख रुपये ले रहे हैं.

आपमें से पांच प्रतिशत शायद ये पैसा दे सकते हों, पर 95 प्रतिशत ये पैसा नहीं दे सकते और ज्यादा मौत इन 95 प्रतिशत लोगों के घरों में हो रही हैं. इसलिए निर्भरता छोड़िए, क्योंकि जान सबसे कीमती चीज है. अपने यहां टोलियां बनाइए. अपने ग्रुप्स बनाइए. सफाई के प्रति पूरे मोहल्ले को जागरूक कीजिए. गांव को जागरूक कीजिए और गंदगी के ढेरों को समाप्त कीजिए. मैं जानता हूं, सरकार के पास गंदगी के निपटारे की कोई योजना नहीं है. कूड़ा इकट्‌ठा होगा. वहीं सड़ता रहेगा, वो उठकर कहां जाएगा. ये किसी को नहीं पता.

पर फिर भी जितना कर सकते हों, जितना अपना दिमाग लगा सकते हों, उतना लगाइए. मैं जानता हूं कि आपमें से बहुत सारे नौजवान, खासकर छात्रों के दिमाग में अगर ये बात घर कर जाए कि कूड़े का हमको क्या इस्तेमाल करना है, तो ये समस्या हल हो सकती है. सरकार ये नहीं सोचेगी. सरकार मौत देने में ज्यादा रुचि रखती है, बजाय बचाने के. ये मैं क्यों कह रहा हूं, क्योंकि वह तब जागती है, जब मौंते शुरू हो जाती हैं. इसलिए मैं आपसे ये निवेदन कर रहा हूं, बल्कि अनुरोध कर रहा हूं कि आप जागें और आप खड़े हों, यह अतिआवश्यक है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.