तीसरा मोर्चा : खुद भले न जीते, दूसरों का खेल बिगाड़ेगा

बिहार विधानसभा चुनावों का मुकाबला और भी ज्यादा दिलचस्प हो गया है. दो गठबंधनों के बीच अब तीसरे मोर्चे ने भी दस्तक दे दी है. मुलायम सिंह की अगुवाई में 6 पार्टियों ने मिलकर समाजवादी सेक्लुयर फ्रंट बनाया है. यह मोर्चा प्रदेश की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगा. राजनीतिक समीक्षक इसका सीधा असर महा-गठबंधन के वोट बैंक पर पड़ने के आसार जता रहे हैं. इसके साथ ही विरोधी दलों का आरोप है कि सपा बिहार में भाजपा की मदद कर रही है. अभी तक के चुनावी सर्वे के मुताबिक जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के महागठबंधन और एनडीए गठबंधन के बीच कांटे का मुकाबला चल रहा था, लेकिन तीसरे मोर्चे के मैदान में उतरने के बाद चुनावी गणित के बदलने के आसार प्रबल हो गये हैं.

2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत से भारतीय राजनीति में गहमागहमी बढ़ गई थी. विपक्षी दलों को लगने लगा था कि तात्कालिक परिस्थितियों में वे अकेले भाजपा का मुक़ाबला नहीं कर सकती हैं. इसके लिए विपक्षी दलों को एकजुट होकर भाजपा का मुक़ाबला करना होगा. उसी समय विघटित जनता दल को एक बार फिर से नये स्वरूप में लाने की कवायद शुरू हुई.

इस कवायद में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव मुख्य रूप से शामिल थे. इन सभी ने कई दौर की बातचीत के बाद अपनी-अपनी पार्टियों के विलय के बाद एक नई पार्टी के गठन पर सहमति जताई और एक झंडा एक निशान की मंत्रणा में लग गये. इसके लिए मुलायम सिंह को अधिकृत किया गया.

बातचीत का केंद्र बिहार चुनाव था. इसलिए सभी निर्णय आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किये जा रहे थे, लेकिन चुनाव के करीब आते-आते किसी तरह की सहमति नहीं बन पायी. खासकर सपा, जद(यू), और राजद के बीच मतभेद गहरा गये. हालांकि इन मतभदों को किसी तरह दूर करने की कोशिश की गयी. अंततः जब बात सीटों के बंटवारे की आई तो 243 सीटों में से राजद और जद(यू) ने 100-100 सीटें आपस में बांट लीं.

40 सीटें कांग्रेस को दे दी गईं और सबसे कम 3 सीटें सपा को दी गईं. सीटों के बंटवारे के विषय में महागठबंधन के प्रमुख मुलायम सिंह यादव से किसी तरह विचार-विमर्श किया गया. सीटों के बंटवारे की घोषणा के समय सपा का कोई नुमाइंदा भी उपस्थित नहीं था, जबकि कांग्रेस की ओर से सीपी जोशी उपस्थित थे. यह बात सपा को नागवार गुजरी और उसने महागठबंधन से अलग चुनाव लड़ने का निर्णय कर लिया.

सपा पहले भी बिहार में अलग से चुनाव लड़ती रही है. सपा के कई उम्मीदवार विधायक भी रहे हैं. ऐसे में उन्हें केवल पांच सीटें देना गलत था. इसके बाद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने एनसीपी के साथ चुनाव लड़ने की बात कही. धीरे से उनके साथ 4 और दल भी शामिल हो गये, जिसमें सबसे प्रमुख जन-अधिकार मोर्चा के संयोजक पप्पू यादव हैं. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि की समरस समाज पार्टी(एसएसपी), पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव का समाजवादी जनता दल(एसजेडी), पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पी ए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) शामिल है.

तीसरा मोर्चा सोशलिस्ट सेक्युलर मोर्चा के नाम से चुनाव लड़ेगा, जिसकी कमान एनसीपी सांसद तारिक अनवर को सौंपी गई है. हालांकि तीसरा मोर्चा बिहार में अपनी जड़ें तलाश रहा है. ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्रचार में भूमिका प्रमुख होगी. अखिलेश यादव ने पिछले साढ़े तीन सालों में उत्तर प्रदेश के विकास के लिए जो प्रयास किये हैं, वह उसे बिहार के लोगों के सामने रखेंगे. सपा नेताओं का कहना है कि यदि बिहार में तीसरे मोर्चे की सरकार बनती है तो यहां उत्तर प्रदेश मॉडल को अपनाया जाएगा.

अखिलेश का कहना है कि यदि उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेस वे बन सकता है तो बिहार में क्यों नहीं. तीसरे मोर्चे का मुख्य फोकस है यादव और मुस्लिम वोट बैंक. जिस माय वोट पर आरजेडी बिहार में अपना आधिपत्य बताती रही है, तीसरा मोर्चा उसी वोट बैंक पर सेंध लगाने की फिराक में है. पप्पू यादव का कहना है कि बिहार में लालू यादव व नीतीश कुमार के कुनबे के सफाये की शुरुआत हो गयी है. चुनाव के बाद पूरा कुनबा साफ हो जाएगा. बिहार में नयी ताकत के रूप में तीसरा मोर्चा उभर रहा है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव जी के मार्गदर्शन में बिहार में तीसरी ताकत ने आकार ग्रहण किया है.

लोकसभा सांसद और एनसीपी के महासचिव तारिक अनवर ने कहा है कि नीतीश व लालू का गठबंधन सुविधा का गठबंधन है, जिसे जनता नकार देगी. जनता गैर-कांग्रेस व गैर-भाजपा गठबंधन को स्वीकार करेगी. सांसद पप्पू यादव का कहना है कि बिहार में लालू यादव व नीतीश कुमार के घमंड को तोड़ने के लिए तीसरे मोर्चे का गठन किया गया है. भाजपा की भी नहीं चलने दी जाएगी. तीसरा विकल्प भारत निर्माण का है और मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में नए भारत के सपने को साकार करेगा. बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से सपा 85, जन अधिकार पार्टी 64 सीटों पर, जबकि एनसीपी 40, नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) तीन, समरस समाज पार्टी 28 और समाजवादी जनता दल राष्ट्रीय 23 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

तीसरे मोर्चे के एलान से न तो बीजेपी गठबंधन फिक्रमंद है और न ही महागठबंधन, लेकिन तीसरे मोर्चे के गठन से दूसरे दलों के टिकट न मिलने की वजह से असंतुष्ट
उम्मीदवारों के पास चुनाव लड़ने के लिए एक नया विकल्प खड़ा हो गया है. ऐसे नेताओं ने तीसरे मोर्चे का दामन थामना भी शुरू कर दिया है. राजद के दिग्गज नेताओं में शामिल रहे रघुनाथ झा औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी में शामिल हो गये. सपा में शमिल होने के बाद उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जनता दल में उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा था. ऐसे में तीसरे मोर्चे को अपने लिए उम्मीदवार तलाशने में कोई परेशानी नहीं होेगी. इसके साथ ही दूसरे दलों के बागी उम्मीदवार अपने पुराने दल के लिए निश्चित तौर पर परेशानी खड़ी करेंगे.

तारिक अनवर को तीसरे मोर्चे ने बिहार में अपना चेहरा इसलिए भी बनाया है, ताकि मुस्लिम वोट को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके. इसका सीधा असर महागठबंधन पर पड़ेगा. कई बार पप्पू यादव कह चुके हैं कि तीसरा मोर्चा यदि बिहार में जीत हासिल करता है तो प्रदेश का मुख्यमंत्री कोई मुस्लिम बनेगा. हालांकि सपा ने पप्पू यादव के इस बयान से खुद को अलग कर लिया है, लेकिन तीसरा मोर्चा मुस्लिम वोट बैंक पर सेंध लगाने की पूरी तैयारी में है.

नीतीश-लालू को ठेंगा दिखाने के बाद बने तीसरे मोर्चे का दारोमदार भी सपा की यूपी सरकार की उपलब्धियों पर टिका है. ऐेसे में अखिलेश द्वारा उत्तर प्रदेश में साढ़े तीन साल में किए गए विकास को आधार बनाकर बिहार में पोस्टर लगाये जा रहे हैं और यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि तीसरा मोर्चा यूपी की तरह बिहार में भी विकास को तवज्जो देगा.

हालांकि तारिक अनवर और पप्पू यादव जमीनी नेता हैं, लेकिन बिहार में उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित है. ऐसे में इन दोनों नेताओं का असर बहुत ज्यादा नहीं पड़ेगा. तीसरे मोर्चे को उन्हीं सीटों पर जीत हासिल होगी, जहां नेताओं की जमीनी पकड़ होगी. कुल मिलाकर लोग तीसरे मोर्चे को वोटकटवा पार्टी के रूप में देख रहे हैं, जो भले ही जीत हासिल न कर सके, लेकिन दूसरे दलों का खेल निश्चित तौर पर खराब करेगी.