आधी आबादी : मतदान में आगे, भागीदारी में पीछे

electionअाज़ादी के साढ़े छह दशकों के बाद भी महिलाओं को वह सम्मान नहीं मिल सका है, जिसकी वे हक़दार हैं. हर जगह अपनी ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाने वाली महिलाएं देश की राजनीतिक धारा में आज भी उपेक्षित हैं. अपने चुनाव घोषणा-पत्र में सभी राजनीतिक दल महिलाओं के लिए आरक्षण, उनकी सुरक्षा एवं उनके विकास को मुद्दा बनाते हैं, लेकिन जब उन्हें भागीदारी देने का मा़ैका सामने आता है, तो स़िर्फ खानापूर्ति कर दी जाती है. हर चुनाव में महिलाओं के वोटों पर कब्जा करने के लिए तरह-तरह की रणनीतियां बनाई जाती हैं, लेकिन जब उन्हें प्रत्याशी बनाने की बारी आती है, तो हर बड़ा-छोटा, राष्ट्रीय-क्षेत्रीय दल अपने क़दम पीछे खींच लेता है. 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा के पिछले और आगामी चुनाव के लिए मैदान में उतरीं महिला प्रत्याशियों की संख्या इसका जीता-जागता प्रमाण है. वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में जदयू-भाजपा ने मिलकर स़िर्फ 35 महिलाओं को प्रत्याशी बनाया.

वहीं कांग्रेस ने 23 और राजद-लोजपा ने मिलकर 17 महिलाओं को मैदान में उतारा. जब बड़ी राजनीतिक पार्टियों का महिलाओं को टिकट देने के मामले में यह हाल है, तो छोटी पार्टियों में महिलाओं की स्थिति का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है. इस बार भी महिलाओं को निराशा हाथ लगी है. एनडीए के घटक दलों ने अभी तक मात्र 23 और महा-गठबंधन ने 25 महिला प्रत्याशी उतार कर बिहार की महिलाओं की कर्तव्यनिष्ठा पर सवाल खड़ा किया है. एनडीए में भाजपा ने 14, हम एवं लोजपा ने चार-चार और रालोसपा ने मात्र एक महिला प्रत्याशी मैदान में उतारने की जहमत उठाई. वहीं महा-गठबंधन कोटे से जदयू एवं राजद ने 10-10 और कांग्रेस ने पांच महिलाओं को टिकट दिए.

बिहार में आधी आबादी के सशक्तीकरण की बात हर राजनीतिक दल करता है, लेकिन जब चुनाव आते हैं, तो महिलाओं को पिछली कतार में भेज दिया जाता है. इस बार तो कई प्रबल दावेदार महिलाओं को टिकट से वंचित कर दिया गया. यहां तक कि पिछले चुनाव में जीत दर्ज करने वाली महिला विधायकों के भी टिकट काट दिए गए. इस बार के विधानसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी में आई गिरावट से महिला नेताओं-कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष देखा जा रहा है. रालोसपा की राष्ट्रीय सचिव सीमा सक्सेना महिलाओं को कम टिकट मिलने से आहत हैं. वह कहती हैं कि आरक्षण और बराबरी का दर्जा जैसी बातें स़िर्फ ज़ुबानी जमा-खर्च है. इन पर अमल किसी स्तर पर नहीं हो रहा है. आज महिलाएं हर क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं, इसलिए उन्हें भी सत्ता और सरकार में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र से पार्टी प्रत्याशी अमिता भूषण कहती हैं कि इस बार कांग्रेस कम सीटों पर चुनाव लड़ रही है, इस वजह से महिला उम्मीदवारों की संख्या कम है. अमिता कहती हैं कि कई जगह कांग्रेस की स्थिति मजबूत है, लेकिन वे सीटें पार्टी के हिस्से में नहीं आईं. यह भी एक वजह है. चूंकि लड़ाई बड़ी है, इसलिए इस बार कम टिकटों पर भी पार्टी संतुष्ट है, लेकिन कम से कम 10-15 महिलाओं को टिकट मिलने चाहिए थे, जिससे बिहार में कांग्रेस का जनाधार मजबूत होता.
पिछली बार ब्रह्मपुर विधानसभा क्षेत्र से बतौर भाजपा प्रत्याशी जीतकर आईं दिलमणि देवी का टिकट काट कर सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर को दे दिया गया. दिलमणि देवी ने कहा कि सुखदा पांडेय और उनका टिकट काट कर यह साबित कर दिया गया कि भाजपा में महिलाओं की कितनी इज्जत है. दिलमणि देवी कहती हैं, मैं 2010 में चुनाव नहीं लड़ना चाहती थी, लेकिन मेरे घर आकर मुझे टिकट देने की बात कही गई. चुनाव जीत कर भी दिखाया. लेकिन, इस बार मेरा टिकट काट दिया गया. भाजपा जैसी बड़ी पार्टियों को कम से कम 25-30 महिलाओं को मैदान में उतारना चाहिए. बक्सर से भाजपा विधायक और मंत्री रह चुकीं सुखदा पांडेय अपना टिकट काटे जाने से खासी आहत हैं. लोजपा नेता नीलम सिन्हा ने कहा कि बिहार में महिलाओं को आधी आबादी कहकर उनके वोट ठगने का काम चल रहा है. घर से लेकर बाहर तक, हर जगह महिलाओं की उपेक्षा हो रही है. मंच से बराबरी की बात कही जाती है, लेकिन जब हक़ देने का मा़ैका आता है, तो उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है.

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