व्यापमं घोटाला ऐसी सीबीआई जांच से न्याय नहीं मिलेगा

Vyapam-Scamभारत सचमुच अद्भुत देश है. यहां के घोटाले अद्भुत हैं. पानी, कोयला, हवा, तरंग, कुछ भी नहीं बचा है. इसी तरह यहां की जांच भी अद्भुत है. जैसे, सीबीआई जांच. कोयला घोटाला याद कीजिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, तोता पिंजरे में कैद है, तोते को आज़ाद कीजिए. सरकार बदल गई, लेकिन क्या पिंजरे का ताला खुला? इस सवाल का जवाब व्यापमं घोटाले की जांच से निकलता है. घोटाले की शुरुआती जांच देखकर तो लगता है कि तोता अभी भी पिंजरे में है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ढाई महीने बाद भी सीबीआई व्यापमं घोटाले की जांच पूरी तरह अपने हाथों में नहीं ले सकी है. खुद सीबीआई ने शपथ-पत्र देकर कहा है कि उसके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह डीमैट घोटाले की जांच कर सके.

व्यापमं घोटाले में 215 एफआईआर दर्ज हैं, 2,500 से ज़्यादा आरोपी हैं, जिनमें से 600 आरोपी फरार हैं. सीबीआई को उन्हें पकड़ना है, पूछताछ करनी है, लेकिन ढाई महीने बाद भी अब तक सीबीआई महज 107 मामले अपने हाथों में ले पाई है. अब आगे क्या होगा, इसका अनुमान लगाते रहिए. फिलहाल, इन्हीं तमाम सवालों के जवाब तलाश रही है चौथी दुनिया की यह विशेष रिपोर्ट:-

आपने नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली कहावत ज़रूर सुनी होगी. ऐसा ही कुछ व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) घोटाले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा की जा रही जांच में हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने नौ जुलाई, 2015 को इस मामले की जांच सीबीआई से कराने का निर्णय लिया था, लेकिन अब तक तक़रीबन ढाई महीने ग़ुजर जाने के बाद भी सीबीआई इस मामले को पूरी तरह अपने हाथों में नहीं ले सकी है. जिन बड़े लोगों को एसटीएफ और एसआईटी ने गिरफ्तार किया था, उनमें से कई को 90 दिनों में चार्जशीट दाखिल न किए जाने के कारण जमानत भी मिल गई है. मध्य प्रदेश सरकार भी येन-केन-प्रकारेण व्हिसिल ब्लोअर्स पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है. इसका सीधा-सा मतलब यह है कि शिवराज सरकार सीबीआई जांच से डरी हुई है और वह मामले को रफा-दफा करने की पूरी कोशिश कर रही है.

यह जांच सजा देने के लिए है या जमानत देने के लिए

नौ जुलाई, 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने व्यापमं मामले की जांच सीबीआई से कराने के आदेश दिए. सीबीआई ने 13 जुलाई को जांच अपने हाथों में ली. ज्वाइंट डायरेक्टर आरपी अग्रवाल के नेतृत्व में सीबीआई की 40 सदस्यीय टीम इस मामले की जांच कर रही है. शुरुआत में ही सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से एसआईटी/एसटीएफ द्वारा जांच जारी रखने की अपील की. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई तक एसटीएफ को जांच जारी रखने का निर्देश दिया. यदि एसटीएफ 23 जुलाई तक आरोपियों के ़िखला़फ चार्जशीट दाखिल न करती, तो 245 आरोपी छूट जाते.

इन 245 आरोपियों में सीबीआई ने बड़ी दिलचस्पी दिखाई, लेकिन डीमैट और व्यापमं मामले के सबसे प्रमुख आरोपियों में से एक योगेश चंद्र उपरीत से सीबीआई ने ग्वालियर जेल में आठ घंटे तक पूछताछ की. उसके दो दिनों बाद यानी चार सितंबर को उनके ़िखला़फ चालान पेश करने में असफल रहने के कारण कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी. यदि सीबीआई चाहती, तो पूछताछ के लिए उन्हें न्यायिक हिरासत में लेने की मांग कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.
योगेश उपरीत पहले ही यह बयान दे चुके हैं कि डीमैट के सारे सेलेक्शन पूर्व निर्धारित होते थे और हर साल राज्य के चिकित्सा शिक्षा मंत्री को 10 करोड़ रुपये डीमैट के किसी भी तरह के क्रियाकलापों पर आवाज़ न उठाने या किसी तरह की बाधा न पैदा करने के एवज में दिए जाते थे.

बावजूद इसके, उपरीत जैसे हाई प्रोफाइल आरोपी की सीबीआई ने जमानत हो जाने दी. लेकिन, जेल से बाहर आने के बाद उनकी जान भी खतरे में बताई जा रही है. व्हिसिल ब्लोअर आशीष चतुर्वेदी ने उपरीत की जान को ़खतरा बताते हुए उन्हें सुरक्षा दिए जाने की मांग सीबीआई के निदेशक से की है. आशीष का कहना है कि उपरीत पहले से ही कैंसर से पीड़ित हैं और उनकी उम्र भी तक़रीबन 70 वर्ष है. यदि उपरीत जैसे मुख्य आरोपी की किसी भी तरह से मौत हो जाती है, तो इस मामले के बहुत-से सुबूत जमींदोज हो जाएंगे. इसके अलावा व्यापमं और डीमैट घोटाले के बीच की एक मुख्य कड़ी हट जाएगी, जिसका सीधा असर मामले की जांच पर पड़ेगा और बहुत-से आरोपी इस वजह से क़ानून के फंदे से बच निकलेंगे. उपरीत को जमानत मिलने के मसले पर डॉ. आनंद राय का कहना है कि सीबीआई की साठगांठ के बगैर ऐसा होना संभव नहीं था. यदि सीबीआई का वकील विरोध करता, तो उन्हें जमानत न मिल पाती.

व्हिसिल ब्लोअर्स से लेकर आम लोग तक सीबीआई की जांच से संतुष्ट नहीं हैं. एसआईटी ने व्यापमं घोटाले में 185 एफआईआर दर्ज की थीं. पिछले ढाई महीने में सीबीआई केवल 107 एफआईआर अपने हाथों में ले सकी है. 78 प्रकरणों को हैंडओवर करने की प्रक्रिया जारी है, लेकिन अचानक एसआईटी द्वारा इस संबंध में दर्ज 30 अन्य एफआईआर भी सामने आ गईं, जिन्हें पहले जान-बूझ कर लोगों के सामने नहीं लाया गया था. ऐसे में एसआईटी की जांच पर भी सवाल उठ रहे हैं कि वह इन एफआईआर को अब तक क्यों दबाए बैठी थी? सीबीआई के हाथों में जांच जाने के बाद व्यापमं से जुड़े लोगों की मौत का सिलसिला पूरी तरह रुक गया है, यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है.

व्हिसिल ब्लोअर्स पर याचिका वापस लेने का दबाव

व्हिसिल ब्लोअर डॉ. आनंद राय ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में एक शपथ-पत्र दायर किया है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह उन पर व्यापमं मामले से हटने के लिए दबाव डाल रहे हैं. अपने शपथ-पत्र में आनंद राय ने कहा है कि 11 अगस्त को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें अपने घर बुलाया और उनसे व्यापमं और डीमैट के विरुद्ध चल रहा अभियान बंद करने के लिए कहा. दोनों के बीच मुलाक़ात एक भरोसेमंद व्यक्ति के ज़रिये तय हुई थी और रात 9.45 बजे का वक्त तय हुआ. दोनों के बीच यह मुलाक़ात एक घंटे पांच मिनट तक चली. इस मुलाक़ात में गोपनीयता का खास ख्याल रखा गया था. राय के सुरक्षाकर्मी को बाहर ही रोक लिया गया था.

इसके अलावा डॉ. आनंद के मुख्यमंत्री आवास आने की कोई एंट्री नहीं की गई. यहां तक कि सीएम हाउस के कर्मचारियों को भी इस मुलाक़ात की कोई भनक नहीं लगी. राय ने थोड़ी चालाकी दिखाई और सीएम का स्टिंग ऑपरेशन एक जासूसी घड़ी के ज़रिये कर लिया और इन सभी बातों को आधार बनाते हुए उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में शपथ-पत्र दिया कि 11 अगस्त, 2015 को रात 9.45 से 10.50 बजे तक उनका मोबाइल सीएम हाउस की सुरक्षा चौकी में रहा. मुख्यमंत्री ने उनसे मुलाक़ात कर उन्हें इंदौर वापस ट्रांसफर कराने समेत कई प्रलोभन दिए. इसके बाद हाईकोर्ट ने शिवराज सिंह को नोटिस जारी किया और उन्हें सात दिनों के अंदर अपना जवाबी शपथ-पत्र दाखिल करने का आदेश दिया, लेकिन शिवराज सिंह ने अदालत को कोई जवाब नहीं दिया.

जेल भेजने और मार डालने की साजिश
इस घटना के बाद डॉ. आनंद राय और उनकी पत्नी का अगस्त-सितंबर माह का वेतन भी रोक दिया गया. आनंद राय का कहना है कि भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित किए गए अधिकारी को निलंबन के दौरान आधी तनख्वाह मिलती है, लेकिन उन्हें और उनकी पत्नी को दो-दो माह से वेतन नहीं मिला है. यह सीधे तौर पर दबाव बनाने का खेल है. इससे सा़फ ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री डरे हुए हैं और केंद्र सरकार के दबाव में सीबीआई मुख्यमंत्री से पूछताछ नहीं कर रही है, जबकि वह व्हिसिल ब्लोअर्स पर याचिका वापस लेने का दबाव बना रहे हैं और जांच प्रभावित कर रहे हैं. हालांकि, बाद में मुख्यमंत्री ने आनंद राय से मुलाक़ात की बात मीडिया के समक्ष मान ली. साथ ही उन्होंने कहा कि मुलाक़ात के लिए खुद आनंद राय ने अनुरोध किया था. लेकिन, आनंद राय ने ऐसे किसी अनुरोध से इंकार किया.

उन्होंने कहा, यदि मुझे मुलाक़ात करनी होती, तो मैं लिखित में उनसे मुलाक़ात के लिए आवेदन करता, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है. इसके अलावा फॉरेंसिक एक्सपर्ट प्रशांत पांडे के ़िखला़फ जो म़ुकदमा भोपाल में दर्ज किया गया था, उसमें पुलिस ने 250 पृष्ठों की चार्जशीट दायर कर दी है. प्रशांत ने चौथी दुनिया को बताया कि यह उन पर दबाव बनाने की कोशिश है. सरकार को जिन मामलों में संजीदगी से जांच करनी चाहिए थी, उन्हें छोड़कर वह व्हिसिल ब्लोअर्स को क़ानून के जाल में फंसाने की कोशिश कर रही है. बकौल प्रशांत, मेरी पत्नी मेघना को 9.96 लाख रुपये के साथ 25 जुलाई को गिरफ्तार कर आरोप लगाया गया कि यह पैसा हवाला का है.

जबकि सच यह है कि मेरी पत्नी शनिवार होने की वजह से उन पैसों को बैंक में जमा नहीं कर पाई. हमें एक फ्लैट खरीदने के लिए बिल्डर को पैसे देने थे, लेकिन ईडी और आईटी के अधिकारियों ने हमारी मेहनत की कमाई हमसे छीन ली. यह क़ीमत हमें व्यापमं में व्हिसिल ब्लोअर होने की वजह से चुकानी पड़ रही है. ये लोग मुझे जेल भेजने या फिर मार डालने की फिराक में हैं.

सीबीआई ने डीमैट की जांच के प्रति अनिच्छा जताई
सुप्रीम कोर्ट ने डीमैट घोटाले की सीबीआई जांच के लिए आशीष चतुर्वेदी और डॉ. आनंद राय द्वारा दायर याचिकाओं पर सीबीआई से जवाब मांगा था. सीबीआई ने अपने जवाब में कहा कि डीमैट घोटाला व्यापमं घोटाले से बड़ा है और उसके पास जांच के लिए आवश्यक संसाधन नहीं हैं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से पूछा कि जब वह निजी मेडिकल कॉलेजों की राज्य कोटे की 42 प्रतिशत सीटों की जांच के लिए तैयार है, तो उसे डीमैट कोटे की 43 प्रतिशत सीटों की जांच से परहेज क्यों है? इस पर अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जवाब देने के लिए अदालत से दो सप्ताह का समय मांगा.

वहीं दूसरी तऱफ पारस सकलेचा और अजय दुबे ने सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर व्यापमं की जांच में सीबीआई के ढीले रवैये पर आपत्ति ज़ाहिर की. राज्य सरकार की ओर से पेश हुए एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने डीमैट की जांच सीबीआई से कराने का विरोध किया और कहा कि व्यापमं के मामले सीबीआई ले रही है, निजी कॉलेजों ने अपनी सीटों के लिए डीमैट कराई है, इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है. यह निजी मेडिकल कॉलेजों की निजी सीटों के लिए परीक्षा है.

सरकार का यह कहना सर्वथा अनुचित है, क्योंकि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहले ही टिप्पणी कर चुका है कि डीमैट घोटाले से दो पीढ़ियों का भविष्य खराब हो गया. सरकार की ज़िम्मेदारी लोगों को बराबरी का अधिकार सुनिश्चित करना है, लेकिन पैसे के बल पर बराबरी का अधिकार छीना जा रहा है. यदि कोई शिक्षण संस्थान राज्य में काम कर रहा है, तो वह ग़ैर-क़ानूनी तरीके नहीं अपना सकता. इसकी पूरी ज़िम्मेदारी सरकार की बनती है.

डीमैट की जांच से क्यों बच रही है सीबीआई
कांग्रेस ने कुछ दिनों पहले एक सूची जारी की थी और डीमैट से जुड़े कुछ रसूखदार लोगों के नाम उजागर किए थे, जिनमें कुछ पूर्व न्यायाधीश, आईएएस-आईपीएस अधिकारी, प्रदेश के मंत्रीगण और 100 से ज़्यादा सांसद-विधायक शामिल हैं. कुछ लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते सीबीआई को मजबूरी में मामले की जांच करनी पड़ रही है. यदि सीबीआई डीमैट की जांच अपने हाथों में लेती है, तो इस काले कारोबार की सारी सच्चाई सामने आए जाएगी. लोगों को सीबीआई की कम स्टाफ वाली बात भी हजम नहीं हो रही है. डीमैट घोटाले से न्यायाधीश, नौकरशाह, नेता, डॉक्टर और बड़े कारोबारी जुड़े हुए हैं, इसलिए शायद सीबीआई उन पर हाथ डालने से बचना चाहती है.

व्हिसिल ब्लोअर्स से आधिकारिक मुलाक़ात नहीं
सीबीआई ने पिछले ढाई महीने में व्हिसिल ब्लोअर्स के साथ आधिकारिक रूप से कोई मुलाक़ात नहीं की है. मध्य प्रदेश विधानसभा में व्यापमं के ़िखला़फ सबसे पहले आवाज़ उठाने वाले पूर्व विधायक पारस सकलेचा का कहना है कि उन्होंने सीबीआई द्वारा जांच हाथ में लिए जाने के बाद 100 पृष्ठीय दस्तावेज़ सहित कई सुबूत सीबीआई के निदेशक को दिए थे, लेकिन अब तक उनसे न तो किसी ने संपर्क किया और न उनसे किसी तरह की पूछताछ की गई. वहीं अन्य व्हिसिल ब्लोअर्स ने चौथी दुनिया से बताया कि सीबीआई उनसे मुलाक़ात करके अनाधिकारिक रूप से जानकारियां हासिल कर रही है.

सीबीआई के अधिकारियों का कहना है कि जब उन्हें यह आदेश मिल जाएगा कि इस मामले में वाकई कुछ करना है, तो वे उनसे आधिकारिक तौर पर मुलाक़ात कर लेंगे. इस तरह के बयानों से सा़फ ज़ाहिर है कि केंद्र सरकार जानबूझ कर जांच आगे नहीं बढ़ने दे रही है. हर किसी ने सीबीआई जांच की मांग की थी, जो पूरी हो गई. लेकिन, अब जांच कितनी तेजी से और किस दिशा में होगी, यह तो सरकार और अदालत को तय करना है. अभी भी आधिकारिक तौर पर मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नहीं हो रही है.

व्हिसिल ब्लोअर्स के वकील विवेक तनखा ने चौथी दुनिया को बताया कि सीबीआई बहुत धीमी गति से जांच कर रही है. पिछले दो-ढाई महीनों में उसने केवल मामलों को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया पूरी की, जांच के स्तर पर उसने अब तक कुछ नहीं किया है. दो महीने तक वह केवल मैन पॉवर और रिसोर्स की बात करती रही, इंवेस्टिगेशन की कोई बात नहीं हुई. बकौल तनखा, जब हमने अदालत से इंवेस्टिगेशन के बारे में कहा, तब अदालत ने सीबीआई से नौ अक्टूबर को इंवेस्टिगेशन की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने की बात कही. अब स्टेटस रिपोर्ट आने के बाद यह मालूम हो पाएगा कि एफआईआर हैंडओवर करने के अलावा सीबीआई ने क्या किया है.

जांच में सीबीआई को वक्त लगेगा. एसटीएफ/एसआईटी भी कई सालों से जांच कर रही थी, बावजूद इसके वह जांच में सफल नहीं हो सकी. हम चाहते हैं कि अच्छी तरह जांच हो जाए, यह सबसे बड़ी चीज है. इससे जो गुनहगार होंगे, उन्हें सजा मिल सकेगी. यहां सबसे बड़ी ज़रूरत उन मामलों की सही जांच होने की है, जिनमें पब्लिक सर्वेंट्स शामिल हैं.

सूत्रों का कहना है कि सीबीआई जांच के तरीके में बदलाव की तैयारी कर रही है. वह गिरफ्तार किए गए छात्रों एवं उनके अभिभावकों को गवाह बनाना चाहती है. सीबीआई का मानना है कि फिलहाल 2,600 लोग इस मामले में आरोपी हैं, जिनमें से 600 से अधिक फरार हैं. उसे लगता है कि जांच में इस संख्या में और भी इज़ाफा हो जाएगा. ज़ाहिर है, ऐसे में मामले की तह तक पहुंचने में बहुत वक्त लगेगा और मुख्य आरोपी उसकी पकड़ से बाहर हो जाएंगे. इसलिए वह बिचौलियों एवं दलालों को आरोपी बनाना चाहती है, जिससे इस घोटाले में शामिल बड़े अपराधियों पर मुक़दमा चले और उनके ़िखला़फ आरोप सिद्ध हो सके.

ग़ौरतलब है कि व्यापमं घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के बाद मध्य प्रदेश के कई ज़िलों में नगर निगम और नगर पालिका के चुनाव हुए थे, जिनमें शिवराज सिंह ने व्यापमं के बारे में लोगों के सामने अपना पक्ष रखा था. अंतत: भाजपा ने उक्त चुनावों को क्लीन स्वीप कर लिया. यदि व्यापमं घोटाले का असर निकाय चुनावों पर नहीं पड़ा, तो सीधा-सा मतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव पर भी उसका कोई असर नहीं होने जा रहा है. व्हिसिल ब्लोअर्स के बीच भी मीडिया में बने रहने और क्रेडिट लेने की होड़ चल रही है. ऐसे में लगता है कि सीबीआई जिस गति से जांच कर रही है, उससे तो किसी भी तरह का निष्कर्ष निकलने में सालों लग जाएंगे और समय के साथ यह मामला भी जमींदोज हो जाएगा.

सीबीआई के पास अधिकारियों की कमी
आम तौर पर सीबीआई में जांच का कार्य इंस्पेक्टर से लेकर एडिशनल एसपी रैंक के अधिकारी करते हैं. सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में रिक्त पदों को लेकर जो हल़फनामा पेश किया है, उसके अनुसार, देश भर में चल रही जांचों के लिए पर्याप्त अधिकारी नहीं हैं. इसलिए उसका व्यापमं के साथ-साथ डीमैट की जांच भी हाथ में लेना संभव नहीं है. फिलहाल सीबीआई में अधिकारियों के कुल 981 स्वीकृत पदों में से 283 यानी तक़रीबन 25 प्रतिशत पद रिक्त हैं. डीआईजी स्तर के 39 पदों में से 12 और एसएसपी स्तर के 10 पदों में से छह पद रिक्त हैं. सीबीआई के पास पर्याप्त संख्या में विधि अधिकारी भी नहीं हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को व्यापमं संबंधी मामलों के लिए अलग से प्रोसिक्यूटर नियुक्त करने के आदेश दिए हैं, लेकिन हालत यह है कि विधि अधिकारियों के कुल 340 स्वीकृत पदों के म़ुकाबले 228 यानी 33 प्रतिशत कम अधिकारी उपलब्ध हैं. व्यापमं मामले में विभिन्न अदालतों में जमानत की तक़रीबन एक हज़ार से अधिक याचिकाएं लंबित हैं, लेकिन सीबीआई प्रोसिक्यूटर्स की कमी का हवाला देकर लगातार समय मांग रही है.

ऐसे होनी चाहिए जांच
व्यापमं मामले में व्हिसल ब्लोअर्स के वकील विवेक तनखा का मानना है कि सीबीआई को एक छोर से मामले की जांच करनी चाहिए. इंदौर में व्यापमं से संबंधित पहली एफआईआर दर्ज हुई थी. उसके बाद ही मामले की परतें खुलनी शुरू हुई थीं. इसलिए सीबीआई को सबसे पहले उसी एफआईआर की जांच से शुरुआत करनी चाहिए. अगर सीबीआई यहां-वहां से मामले चुनकर जांच शुरू करती है, तो वह उलझती चली जाएगी. सीबीआई को एसआईटी की मदद लेनी चाहिए, क्योंकि उसे घोटाले से जुड़ी तमाम बारीकियां मालूम हैं. वैसे भी शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को अपनी जांच जारी रखने का आदेश दिया था.

इसके अलावा इस घोटाले की जांच भी 2-जी और कोयला घोटाले की तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से नौ अक्टूबर को स्टेटस रिपोर्ट देने के लिए कहा है. इसके बाद ही जांच की सही दिशा निर्धारित हो पाएगी.

-ढाई महीने बाद भी सीबीआई मामले को पूरी तरह अपने हाथों में नहीं ले सकी.
-ज्वाइंट डायरेक्टर आरपी अग्रवाल के नेतृत्व में सीबीआई की 40 सदस्यीय टीम कर रही है जांच.
-डीमैट के बड़े आरोपी उपरीत को मिली जमानत.
-एसआईटी ने 185 एफआईआर दर्ज की थीं.
-सीबीआई अब तक 107 एफआईआर अपने हाथों में ले सकी.
-आनंद राय ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में शपथ-पत्र दायर करके कहा, शिवराज मामले से हटने के लिए दबाव बना रहे हैं.
-सीबीआई ने कहा, डीमैट बड़ा घोटाला है और उसके पास जांच के लिए आवश्यक संसाधन नहीं हैं.
-सीबीआई में अधिकारियों के 283 पद रिक्त पड़े हैं.
-सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से नौ अक्टूबर को इंवेस्टिगेशन की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा.

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