भारतीय लोकतंत्र को किसने कमज़ोर किया

modiजिस पार्टी से मैं पिछले 44 वर्षों से जुड़ा हुआ हूं, उस पार्टी ने अभी-अभी अपना नया नेता चुना है. मई 2015 में लेबर पार्टी के चुनाव हारने के अगले ही दिन पार्टी नेता एड मिलिबैंड ने त्यागपत्र दे दिया था. नए नेता के चुनाव की एक प्रकिया है, जिसके तहत पार्टी के सांसद उम्मीदवारों का नामांकन करते हैं.

इस बार चार उम्मीदवारों का नामांकन हुआ था. उपनेता के चुनाव में भी बिल्कुल यही प्रक्रिया अपनाई जाती है. इन उम्मीदवारों ने पूरे देश में पार्टी सदस्यों की 35 सभाएं कीं, आपसी वाद-विवाद के साथ-साथ सदस्यों के सवालों के जवाब दिए.

इस बार लेबर पार्टी ने जेरेमी कोबिन को नेता चुना. वह पार्टी के अति वामपंथी विचारधारा के लोगों में से हैं. उन्होंने अक्सर पार्टी अनुदेश (व्हिप) का उल्लंघन किया है. (ब्रिटेन में भारत के विपरीत एक सांसद को अपनी पार्टी लाइन से अलग हटकर अपने विचार रखने की आज़ादी है.) कोबिन को कुल चार लाख मतों में से 60 प्रतिशत मत हासिल हुए, यह हालिया कुछ वर्षों में किसी पार्टी नेता पद के उम्मीदवार को मिले सर्वाधिक मत हैं.

यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया जेरेमी कोबिन को एक वैधता प्रदान करती है. यह वैधता अगले आम चुनावों में उनके नाकाम होने की आशंकाओं को भी ख़ारिज करती है. इस चुनाव में केवल 10 प्रतिशत सांसदों ने कोबिन को वोट दिया.

दरअसल कोबिन ने उन पुराने समाजवादी विचारों का सहारा लिया, जो जनता का वोट हासिल करने में रुकावट साबित हुए हैं. अब इसे देख कर कहा जा सकता है कि या तो दुनिया बदल गई है और कोबिन उस जनता का वोट हासिल करके सबको हैरान कर देंगे, जो पहले ऐसे विचारों के प्रति उदासीन थी या लेबर पार्टी 2020 में एक बार फिर हार जायेगी. साथ में ये संभावना भी है कि पार्टी के सांसद चुनाव से पहले ही अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दें.

ब्रिटेन में पार्टी के नेता चुने जाने की प्रक्रिया और भारत में पार्टियों के नेता चुने जाने की प्रक्रिया में बहुत फर्क है. भारत के लगभग सभी राजनीतिक दल वंशवाद के इर्द-गिर्द घूमते हैं.

पार्टी नेता के चुनाव में न तो कोई सार्वजनिक बहस होती है, न किसी तरह का चुनाव होता है और न ही सदस्यों की भगीदारी होती है. यहां तक कि पिछले दिनों माकपा (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) में नेतृत्व परिवर्तन हुआ था. यह नेतृत्व परिवर्तन मतदान से नहीं हुआ था. ग़ौरतलब है कि सीताराम येचुरी, प्रकाश करात की जगह पार्टी के महासचिव बने थे. भाजपा में वंशवाद नहीं है.

पार्टी के पास एक अनौपचारिक प्राइमरी है, जिसने नरेन्द्र मोदी को लोकसभा चुनावों में अपना नेता घोषित किया था. लेकिन वहां भी किसी प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार को नहीं उतारा गया था, ताकि आगे के कार्यक्रमों में पार्टी के नेता पद के उम्मीदवारों के बीच वाद-विवाद हो सके. यहां भी पार्टी के सदस्यों को अपना नेता चुनने का अधिकार नहीं है.

हालांकि भारतीय चुनाव प्रणाली एक जीवंत लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली है, लेकिन यहां पार्टी उम्मीदवारों और पार्टी के नेता का चुनाव बिल्कुल अलोकतांत्रिक तरीके से होता है. इस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को दलबदल विरोधी कानून से और भी मजबूती मिलती है.

इस कानून के मुताबिक एक सांसद पार्टी अनुदेश से अलग अपनी राय नहीं रख सकता. यहां जनप्रतिनिधि मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं, लेकिन वे अपने पार्टी के नेता के हितों को साधने का काम करते हैं. दरअसल, उन्हें भेड़-चाल चलने पर आसानी से मजबूर किया जा सकता है.

वे तार्किक रूप से किसी को अपनी बात मनवा सकें या अपने मतदाताओं का प्रतिनिधित्व कर सकें, भारत में ऐसा नहीं होता है. 1950 के दशक में भारत में एक जीवंत राजनीतिक और लोकतांत्रिक सोच विद्यमान थी.

उस समय यहां कद्दावर सांसद थे, जिन्होंने नेहरू सरकार से जवाब-तलब किया. वह जीवटता कहां गुम हो गई? भारतीय लोकतंत्र को किसने कमज़ोर किया? क्या नेहरू के वारिस इसके लिए ज़िम्मेदार हैं?

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