स्मृति शेष आप हमेशा याद आएंगे वीरेन दा

भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद कानपुर में स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक की नौकरी चल रही थी और साथ ही यत्र-तत्र स्वतंत्र लेखन भी. अमर उजाला के लिए लिखने की बेहद चाह थी, जिसकी राह प्रशस्त की थी वीरेन दा यानी वीरेन डंगवाल ने. उस समय वह अमर उजाला कानपुर के स्थानीय संपादक थे. शुरुआत इस तरह हुई कि मैं एक दिन अमर उजाला के कालपी रोड स्थित कार्यालय में जा पहुंचा.

नीचे रिसेप्शन पर नवीन जी की ड्यूटी हुआ करती थी. मैंने नवीन जी से कहा कि महेंद्र नाम है मेरा, संपादक जी से मिलना है. जितने उत्साह के साथ मैंने अपना नाम बताया, उतनी ही तत्परता के साथ नवीन जी ने संपादक जी को इंटरकॉम पर यह सूचना दी. उसके बाद मुझे इंतज़ार करने के लिए कहा गया. रिसेप्शन रूम में सोफे थे, कुर्सियां थीं, अ़खबार-पत्रिकाएं थीं, चाय-पानी की भी व्यवस्था थी. मुझ जैसे नए-नए पत्रकार के लिए यह एक अलग अनुभव था.

खैर, पंद्रह मिनट के बाद नवीन जी ने मुझसे कहा, संपादक जी आपको याद कर रहे हैं. सेकेंड फ्लोर पर चले जाइए. मैं पहली बार अमर उजाला गया था. सो, मेरा संकोच देखकर नवीन जी ने एक चपरासी को मेरे साथ भेज दिया. संपादक जी के केबिन के पास पहुंच कर चपरासी बोला, अंदर चले जाइए. मैंने केबिन का दरवाजा धीरे से अंदर की ओर करते हुए सिर झुकाकर अभिवादन किया. जवाब में एक मधुर आवाज़ कानों में गूंजी, आओ-आओ महेंद्र, बैठो. तब तक चपरासी पानी के दो गिलास लेकर आ चुका था.

एक गिलास उसने पहले संपादक जी को थमाया और बाद में दूसरा मुझे. डंगवाल सर ने उसे चाय लाने को कहकर विदा किया और मुझसे बोले, बताओ क्या और कैसा चल रहा है? मैं हतप्रभ था. इतनी आत्मीयता! वह भी एक नितांत अपरिचित युवक के साथ! मैं कुछ बोलता, उससे पहले वह खुद बोले, लिखने-पढ़ने का शौक है? मैंने सिर हिलाया और फिर हिम्मत जुटाकर कहा, सर, मैं स्वतंत्र भारत में हूं, उप संपादक के पद पर. लिख तो 1992-93 से रहा हूं. अमर उजाला के लिए लिखना चाहता हूं, जुड़ना चाहता हूं.

तब तक चाय आ चुकी थी. चपरासी ने हम दोनों के आगे चाय के प्याले रखे और फिर वह चला गया. डंगवाल सर बोले, महेंद्र, चाय पियो. हाथ में चाय का प्याला था और मन में उथल-पुथल कि क्या जवाब मिलेगा डंगवाल सर की ओर से. क्या सोच रहे हो महेंद्र? तब तक डंगवाल सर ने खुद सवाल उछाल दिया और फिर बोले, लिखो विविध पेज के लिए. मेहनत से लिखना. छपेगा. मन में एक संतोष का भाव जगा कि चलो मुलाकात सार्थक हो गई. उसके बाद अमर उजाला कानपुर के विविध पेज के लिए लिखना शुरू हो गया.

विविध पेज नियमित था, जिसमें मुझ जैसे नए लोगों के आलेखों-फीचरों, वरिष्ठों के स्तंभ और लंबी प्रतिक्रियाओं का प्रकाशन होता था. डंगवाल सर ने मेरे कई आलेख-फीचर विविध पेज पर छापे और मानदेय भी भिजवाया. बीच-बीच में उनसे मुलाकात भी हो जाती थी. दरअसल, डंगवाल सर के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह मिलते सबसे थे, चाहे छोटा हो बड़ा. हां, कभी-कभी इंतज़ार करना पड़ता था, लेकिन वह कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि रिसेप्शन रूम में मौजूद सुविधाओं और नवीन जी के सद् व्यवहार के चलते वहां कोई बोर नहीं होता था.

अमर उजाला कानपुर का वह विविध पेज हम जैसे नए लोगों के लिए लेखन का एक बड़ा सहारा था. एक बार उसमें मेरे वरिष्ठ सहयोगी शैलेंद्र शर्मा की पहली कविता छपी, तो उनकी खुशी का पारावार न रहा. मैंने ही उन्हें वीरेन सर का हवाला देकर अपनी कविता भेजने को कहा था, पूरे भरोसे के साथ. वीरेन सर का कनिष्ठों-नवांकुरों के प्रति स्नेह उस भरोसे का आधार था. और, अंतत: मेरा भरोसा जीता भी.

पिछले काफी समय से बीमार चल रहे वीरेन सर के बारे में सोशल साइट्‌स पर साहित्यिक मित्रों के माध्यम से अक्सर खबरें मिल जाती थीं. इधर कुछ दिनों से व्यक्तिगत व्यस्तता और उलझनों के चलते उनकी कोई खबर मुझ तक नहीं पहुंच सकी. खैर, विधि के विधान के आगे किसकी चली है? जो आया है, उसका इस नश्वर संसार से जाना तय है. वीरेन सर हम जैसों के लिए प्रेरक थे, मार्गदर्शक थे और सबसे बड़ी बात यह कि वह इससे कहीं ज़्यादा अभिभावक थे. सबके लिए सुलभ थे. विशाल व्यक्तित्व एवं कृतित्व के धनी वीरेन सर हमेशा याद आएंगे. हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी पत्रकारिता जगत भी उन्हें कभी भुला न सकेगा.

महेंद्र अवधेश

महेंद्र अवधेश पिछले १८ वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय हैं.स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक,हर शनिवार, मेरी संगिनी, विचार सारांश में बतौर उप संपादक सेवाएं देने के बाद अक्टूबर २००९ से चौथी दुनिया में वरिष्ठ कॉपी संपादक के रूप में कार्यरत हैं.शुक्रवार, बिंदिया, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, हरिभूमि, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका आदि पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.
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महेंद्र अवधेश

महेंद्र अवधेश पिछले १८ वर्षों से प्रिंट मीडिया में सक्रिय हैं. स्वतंत्र भारत हिंदी दैनिक, हर शनिवार, मेरी संगिनी, विचार सारांश में बतौर उप संपादक सेवाएं देने के बाद अक्टूबर २००९ से चौथी दुनिया में वरिष्ठ कॉपी संपादक के रूप में कार्यरत हैं. शुक्रवार, बिंदिया, सरिता, मुक्ता, सरस सलिल, अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, हरिभूमि, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका आदि पत्र पत्रिकाओं में विविध विषयों पर आलेख भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.