असहिष्णुता का विरोध या कोरी राजनीति

munawar ranaपहले कर्नाटक में कन्नड़ साहित्यकार प्रोफेसर एमएम कलबर्गी और उसके बाद उत्तर प्रदेश के दादरी में इखलाक अहमद की हत्या को साहित्यकारों ने देश में बढ़ती असहिष्णुता माना.

इसके विरोध में उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने को अपना हथियार बनाया. सबसे पहले साहित्यकार उदय प्रकाश ने प्रो. कलबर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की.

इसके बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की भांजी व साहित्यकार नयनतारा सहगल ने यह कहते हुए सम्मान लौटाने की घोषणा की कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि लेखकों को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए. इसके बाद तो जैसे पुरस्कार लौटाने वालों की झड़ी लग गई.

विरोध के बीच तमाम संवेदनशील, प्रगतिशील, जनवादी लेखक शायद अब तक हुए दंगों और दादरी की घटना में फर्क करना भूल गए, जहां अब तक हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद महीनों माहौल में खौफ की बू आती रहती है, वहीं दादरी में घटना के तुरंत बाद ही गांव के हर तबके को इस बात का अहसास हो गया था कि कुछ अनर्थ हो गया है. हर तरफ से मदद के लिए हाथ बढ़ने शुरू हो गए. घटना के तुरंत बाद ही न कोई हिंदू बचा और न कोई मुसलमान.

रह गए तो सिर्फ उस गांव के आम दुखी बाशिंदे. तकरीबन 300 मुसलमानों की आबादी वाले गांव के हिंदुओं ने अपने सुख-दुख के साथियों को भरोसा दिलाना शुरू किया कि उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है. जो हुआ वो भावावेश में हुआ. उन्हें गांव छोड़कर कहीं जाने की जरूरत नहीं है. इसके बाद एक मुस्लिम परिवार की दो बेटियों की शादी में हिंदुओं ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई और देखते ही देखते माहौल शांत हो गया.

इस घटना के बाद अलग-अलग पार्टियों के कुछ नेताओं ने इस आग को सुलगाए रखने की नाकाम कोशिश की. रही बची कसर लेखकों ने पूरी कर दी. जब दादरी के गली-कूचे, तालाब-पोखर, हिंदू-मुस्लिम और यहां तक कि जानवर भी उस घटना को भुलाकर सामान्य जीवन जीने लगे थे, तो लेखकों ने सोशल मीडिया पर मुहिम चला कर और अपने पुरस्कार वापस कर इस मसले को तूल ही नहीं दिया, देश में नई बहस भी छेड़ दी.

हालांकि, सच्चाई यह भी है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी को, कभी भी, किसी भी मसले पर, किसी भी लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने का पूरा अधिकार है. लेखकों ने समाज में बढ़ रही असहिष्णुता का विरोध अपने अंदाज में किया. हालांकि, उनके विरोध को जहां देश भर से समर्थन हासिल हुआ, वहीं उनका विरोध भी हुआ.

लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए कि क्या देश में पहली बार ऐसी घटनाएं हुई हैं? क्या अब से पहले ऐसा माहौल नहीं बना था, जब लेखकों की संवेदनशीलता के धरातल ने भूकंप के झटके महसूस किए हों?

शायर मुनव्वर राणा का एक न्यूज चैनल कार्यक्रम में सम्मान और एक लाख रुपये का चेक लेकर पहुंचना और फिर लाइव कार्यक्रम में सम्मान वापसी की घोषणा ने कई सवाल खड़े कर दिए.

दरअसल, दो दिन पहले तक मुनव्वर राणा जी सोशल मीडिया पर कह रहे थे कि उनकी कलम अभी थकी नहीं है. वह अपनी कलम के जरिये घटनाओं का विरोध करने की बात करते हुए कहीं ज्यादा तार्किक नजर आ रहे थे. वह खुद सम्मान लौटाने को सही मान रहे थे. फिर अचानक क्या हुआ कि लाइव कार्यक्रम में उन्होंने सम्मान लौटा दिया. इसके अगले ही दिन वह प्रधानमंत्री के कहने पर सम्मान वापस लेने की बात करने लगे. इस पूरे घटनाक्रम से राजनीति की गंध आ रही है.

साहित्यकार महाराष्ट्र में कांग्रेस शासन के दौरान हुई नरेंद्र दाभोलकर की हत्या, कांग्रेस शासित कर्नाटक में प्रो. कलबर्गी की हत्या और समाजवादी पार्टी शासित उत्तर प्रदेश के दादरी में हुई इखलाक की हत्या का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ रहे हैं. जबकि इन सभी घटनाओं में सबसे पहली जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की बनती है, जिनके विरोध में अब तक किसी साहित्यकार ने एक शब्द भी कहना मुनासिब नहीं समझा है.

तो कैसे उन लोगों को गलत साबित किया जा सकता है जो कह रहे हैं कि लेखक, कवि, शायर, साहित्यकार सुनियोजित तरीके से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ साजिश कर रहे हैं. मौजूदा हालात में तो साहित्यकारों की मंशा, नियत और उनके लक्ष्य को लेकर सवाल उठना लाजमी है.

अब तक सम्मान लौटाने वाले और साहित्य अकादमी से इस्तीफा देने वाले साहित्यकारों की तादाद तकरीबन तीन दर्जन हो गई है. इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि पिछले कुछ समय में चित्त को अस्थिर कर देने वाली घटनाएं भी हुई हैं और उनका विरोध भी होना चाहिए.

लेकिन हमें यह भी विचार करना होगा कि हर घटना के लिए एक ही व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना कहां तक उचित है. साथ ही कुछ घटनाओं में मौन साध लेना और कुछ घटनाओं पर मुखर होकर घटना विशेष का चुनाव करना कहां तक ठीक है. सोशल मीडिया और खबर के विभिन्न माध्यमों के दौर में इस तरह का चयन और विरोध साहित्यकारों के लिए आत्मघाती कदम ही साबित होता है और हुआ भी.

पिछले कुछ दिनों में सम्मान लौटाने वाले साहित्यकारों की ऐसी-ऐसी रचनाएं सबसे ज्यादा पढ़ी गई हैं, जो शायद लिखने के बाद उन्होंने खुद भी ज्यादा नहीं पढ़ी होंगी. पहले सम्मान वापसी को लेकर लेखकों की नियत पर सवाल उठे और अब उनकी रचनाओं के स्तर पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं.

आरोप लगे कि साहित्यकार पिक एंड चूज और चूज एंड हिट की नीति अपना रहे हैं. इस सब के बीच विरोध का सभी को हक है. बेशक साहित्यकारों के विरोध पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं और उनका विरोध करने वालों के विरोध पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन किसी को भी किसी का विरोध करने से रोका जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगा. हालांकि, साहित्यकारों से उम्मीद थी कि वे विरोध के लिए कहीं ज्यादा सुविचारित, तार्किक तरीका अपनाते.

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