क्या नेपाल का चीनीकरण हो रहा है

narendra modiकरीब महीना भर पहले भारत और नेपाल में जमकर तनातनी हुई थी. उस समय नेपाल ने भारत से कहा था कि अगर वह नेपाल को समानों की आपूर्ति में बाधा पहुंचाएगा तो वह चीन की ओर झुकने को विवश हो जाएगा. नेपाल के इस धमकी के जवाब में भारत ने यह साफ किया था कि उसका नेपाल के सामानों की आपूर्ति में बाधा पहुंचाने का कोई इरादा नहीं है.

भारत का कहना था कि बाधा उस देश में प्रदर्शन एवं अशांति की वजह से पहुंची है, क्योंकि भारतीय कंपनियों एवं ट्रांसपोर्टरों को अपनी सुरक्षा का डर सता रहा है. हालांकि नेपाल यह स्वीकार भी करता है कि सामान भेजने संबंधी परेशानियां हैं, लेकिन वह भारत को धमकी देने से बाज भी नहीं आता और कहता है कि अगर कोई विकल्प नहीं बचता है तो नेपाल चीन सहित अन्य देशों से संपर्क करेगा.

यह तो है एक महीना पहले की बात, लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या नेपाल की इच्छा चीन के करीब जाने की है? क्या नेपाल भारत से दूर होना चाहता है? क्या नेपाल और चीन में कुछ खिचड़ी पक रही है? क्या इसीलिए सप्ताह भर पहले चीन नेपाल के पक्ष में खेमेबाजी कर रहा था? ये सवाल अनायास नहीं हैं, बल्कि उन परिस्थितियों ने इन सवालों को जन्म दिया है, जो नेपाल के हावभाव में पिछले कुछ अर्से से देखने को मिल रहा है.

पिछले दिनों चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया था कि नेपाल के नए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन समर्थक हैं. वे चीन के साथ नजदीकी संबंध स्थापित करना चाहते हैं.

नेपाल में नई सरकार बनने के महज पांच दिन बाद इस समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख में नेपाली कांग्रेस की पूर्व सरकार को पारंपरिक तौर पर भारत समर्थक कहा गया है. साथ ही लिखा गया है कि नेपाल के नागरिक भी बीजिंग के साथ नजदीकी संबंध चाहते हैं.

खैर, मामला चाहे जो भी हो, उसे कूटनीति से हल किया जा सकता है, लेकिन उसके लिए जरूरी है कि दोनों देश शांति और संयम से काम लें. लेकिन वर्तमान हालात में कुछ बनता दिख नहीं रहा है. अब चर्चा करते हैं वर्तमान हालात की. नेपाल के बीरगंज में पुलिस फायरिंग में एक भारतीय की मौत और उसके बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उस घटना की निंदा के बाद भारत और नेपाल तनाव का सामना कर रहे हैं.

मधेशियों के मुद्दे पर भारत ने पहले ही स्पष्ट रूप से अपनी धारणा व्यक्त कर दी है कि अगर संविधान मधेश और अन्य असंतुष्ट पक्ष को लेकर नहीं लाया जाता है तो आगामी दिनों में दो देशों के बीच के सम्बन्धों पर असर पड़ सकता है.

दूसरी तरफ भारत ने मधेशी नेताओं को यह आश्वासन दिया था कि उनकी मांग जायज है और भारत उनके साथ है. कहीं न कहीं भारत के इसी रुख को देखते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री ओली यह तो नहीं कह रहे हैं कि भारत दोनों देशों की सीमा पर मधेसी समर्थित पार्टियों को उकसा रहा है. ओली ने आरोप लगाया कि भारत मधेसी दलों को 1751 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल की खुली सीमा पर नाकेबंदी के लिए उकसा रहा है.

ओली ने कहा कि आखिर भारत क्यों चार मधेसी दलों के ही पीछे खड़ा नजर आ रहा है? उन्होंने कहा कि यह नेपाल सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने देश के सभी समुदायों की बातों को सुने और उनकी शिकायतों को दूर करे. ओली भारत को लेकर इतना उग्र हो गए कि उन्होंने भारत द्वारा हमेशा से दी जा रही सहायता की तनिक भी परवाह नहीं की और उसके अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देने की चेतावनी भी भारत को दे डाली.

इसके बाद से दोनों ओर से स्पष्टीकरण और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. एक तरफ जहां भारतीय प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि उन्होंने नेपाल के नेताओं से अपील की है कि समस्या राजनीतिक है और इसे बल से नहीं सुलझाया जा सकता. मोदी ने कहा कि संघर्ष की वजहों पर नेपाल सरकार को विश्वसनीय और प्रभावी तरीक़े से विचार करना चाहिए.

वहीं नेपाल के गृह मंत्रालय के प्रवक्ता लक्ष्मी ढकाल के मुताबिक़, दो भारतीय नागरिकों को पुलिस के काम में बाधा डालने के लिए गिरफ्तार किया गया है. इससे पहले नेपाल की पुलिस ने भारत-नेपाल सीमा के एक अहम नाके से प्रदर्शनकारियों को हटाते हुए बीरगंज-रक्सौल सीमा चौकी को खोल दिया और नेपाल में एक महीने से फंसे 200 ट्रक भारत आ रहे हैं.

नेपाल के तराई इलाक़े के मधेसी प्रदर्शनकारी भारत की सीमा से लगे दो अहम नाकों पर कई हफ़्तों से प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच ट्रकों की आवाजाही बाधित हुई है. मधेसी समूह सितंबर में अपनाए गए नए संविधान का विरोध कर रहे हैं और उनका कहना है कि यह संविधान उनके हितों के ख़िला़फ है.

अगर नेपाल भारत से दूरियां बढ़ा रहा है तो नेपाल की स्थिति भारत के लिए चिन्ता का विषय हो सकती है, लेकिन उससे कहीं अधिक नेपाल के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए.

कहना गलत नहीं होगा कि अगर भारत का नेपाल पर प्रभाव कम हो रहा है तो स्पष्ट है कि चीन का नेपाल पर प्रभाव बढ़ रहा है. लेकिन नेपाल यह भूल गया है कि चीन से उसकी नजदीकियों से नेपाल की स्थिति चाइनीज समान की तरह हो जाएगी, जो ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकती.

सवाल यह भी है कि क्या नेपाल का चीनीकरण हो रहा है? सवाल यह भी है कि क्या चीन का पूर्ण समर्थन और भारत की उपेक्षा कर ओली नए नेपाल का निर्माण कर पाएंगे? मामला चाहे जो भी हो, हमें नेपाल से अपने संबंधों का गंभीरता से अवलोकन करना चाहिए.

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