पर्दे के पीछे के योद्धा

bjpबहुत पुरानी कहावत है, प्यार और जंग में सब जायज है. बिहार विधानसभा चुनाव भी प्रत्याशियों के लिए किसी जंग से कम नहीं है, जिसे जीतने के लिए प्रत्येक दल हरसंभव प्रयास कर रहा है. चुनाव का शंखनाद होते ही सभी दलों के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तंत्र काम में लग जाते हैं. इनमें कई ऐसे चेहरे होते हैं, जो जंग में शामिल तो रहते हैं, लेकिन कभी दिखाई नहीं देते.

दरअसल, वे पर्दे के पीछे रहकर चुनाव जीतने के लिए जोर-आजमाइश करते रहते हैं और पर्दे के बाहर रहने वाले चेहरों की क़दम-क़दम पर मदद करते हैं.एक प्रत्याशी को चुनाव लड़ाने के लिए कितने लोग पर्दे के पीछे रहकर काम करते हैं, उसका जायजा लेने की कोशिश हमने की.

फोन की घन-घन-घन बजती घंटी, कंप्यूटर के की-बोर्ड पर चहलक़दमी करती उंगलियां और पार्टी के झंडे-बैनर पाने-बांटने की जद्दोजहद… कुछ ऐसा ही नजारा प्रत्येक राजनीतिक दल के कार्यालय में देखने को मिला. कई लोग एक कमरे में तो मौजूद हैं, लेकिन बातचीत बहुत कम हो रही है. सभी अपने काम में ऐसे लगे हैं, मानो कोई मिशन चल रहा हो. पूछे जाने पर पता चला कि यह वार रूम है.

अब एक चलन-सा हो गया है, वार रूम बनाने का. वार रूम में चुनाव से संबंधित आने वाली सभी छोटी-बड़ी जानकारियों का विश्लेषण कर आउटपुट निकाला जाता है. समय के साथ प्रचार-प्रसार के तरीकों में भी बदलाव आ रहा है. चुनाव की घोषणा होते ही प्रत्येक राजनीतिक दल में चुनाव अभियान समिति का गठन किया जाता है, महत्वपूर्ण लोगों की टीमें गठित की जाती हैं और अनुभव के आधार पर प्रत्येक नेता-कार्यकर्ता को ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है.

वार रूम के सदस्य क्षेत्र में तो नहीं जाते, लेकिन चुनाव की हर गतिविधि का वे बारीकी से विश्लेषण करते हैं, जिस पर आगे की रणनीति तैयार होती है. आधुनिक तकनीक ने शहरों ही नहीं, गांवों तक अपनी पैठ बना ली है. प्रत्याशी को कौन-सा मुद्दा उठाना है, कैसे प्रचार करना है और कब कहां जाना है आदि सारे कार्यों को वार रूम और विभिन्न टीमों के सदस्य ही अंजाम देते हैं.

कांग्रेस ने अपना वार रूम सदाकत आश्रम में बनाया है. वार रूम के संचालक प्रदीप चौधरी ने बताया कि उनकी टीम बंद कमरे से चुनाव का संचालन करती है. वार रूम के अंदर दो मेजर डिपार्टमेंट होते हैं, पहला लॉजिस्टिक और दूसरा कम्युनिकेशन. यहां दोनों को अलग-अलग रखा गया है.

लॉजिस्टिक के अंदर कंट्रोल रूम होता है और कम्युनिकेशन के अंदर रिसर्च, सोशल मीडिया, जनरल मीडिया और आईटी. प्रदीप कहते हैं, पोस्टर-बैनर से लेकर को-ऑर्डिनेशन तक सारा कार्य बहुत मुश्किल हो गया है, अब बहुत ज़्यादा ब्यूरोक्रेटिक प्रोसिजर से ग़ुजरना पड़ता है.

चुनाव आयोग से अनुमति लेने, पोस्टर-बैनर लगवाने से लेकर प्रत्याशियों के हर गतिविधियों पर हमारी टीम काम करती है. उम्मीदवार की दिक्कतों को लेकर चुनाव आयोग से बात करना, स्टार प्रचारक को कब आना है, उन्हें क्या बोलना है आदि तय करने की सारी ज़िम्मेदारी हमारी है. तक़रीबन सौ लोग रोज इसी काम में लगते हैं.

हर ज़िले में एक आईटी सेल है, जहां तीन-चार लोग उम्मीदवारों के लिए सोशल मीडिया पर काम करते हैं. फेसबुक और व्हाट्‌स-ऐप के ज़रिये प्रत्याशियों के संदेश जनता तक पहुंचाए जाते हैं. बैनर किसे लगाना है, हेलिकॉप्टर का प्रबंध कैसे होगा समेत प्रचार-प्रसार की सारी व्यवस्था हमें देखनी होती है.

हमारी टीम को दूसरे दलों की सारी गतिविधियों पर भी ध्यान रखना पड़ता है. सुबह नौ बजे से लेकर रात नौ बजे तक और कभी-कभी इससे भी ज़्यादा समय लग जाता है, काम निपटाने में. प्रदीप दिल्ली से आकर यह सारा काम देख रहे हैं. वह कहते हैं कि टीम के बीच को-आर्डिनेशन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है.

नेशनल मीडिया प्रभारी एवं महासचिव चंदन यादव ने कहा कि फिल्मों में हीरो परफॉर्म करते हैं, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस में जान डालने के लिए कई लोग पर्दे के पीछे से कार्य करते हैं, ठीक वही कार्य आज वार रूम का है. प्रत्याशी जनता के सामने होते हैं और उनकी रणनीति यहां तैयार की जाती है.

2010 तक प्रचार इतनी गहराई से नहीं किया जाता था, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद सोशल मीडिया का क्रेज बढ़ गया है. खासकर युवाओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए आज सोशल मीडिया का ज़्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है.

भारतीय जनता पार्टी का वार रूम प्रदेश कार्यालय के अंदर है, जहां किसी का आना-जाना प्रतिबंधित है. भाजपा की चुनावी रणनीति बिल्कुल अलग और गुप्त होती है. उसकी चुनाव अभियान समिति में तक़रीबन 50-60 लोग हैं और वार रूम में लगभग सौ लोग दिन-रात काम कर रहे हैं.

चुनाव प्रबंध समिति के अध्यक्ष सूरज नंदन कुशवाहा बताते हैं कि समिति में बहुत सारे सेल हैं, जो चुनाव से संबंधित विभिन्न कार्य देखते हैं. प्रोग्राम सेल में कार्यक्रम बनते हैं, हेलिकॉप्टर सेल हेलिकॉप्टर संबंधी काम देखता है, सेंट्रल लीडरशिप और स्टेट लीडरशिप के लिए अलग-अलग सेल हैं.

चुनाव आयोग सेल चुनाव आयोग संबंधी कार्य देखता है, मीडिया सेल मीडिया के लोगों के संपर्क में रहता है. एक सेल आने-जाने वाली ईमेल देखता है, विज्ञापनों के लिए अलग सेल है. लगभग 60 हज़ार बूथ कमेटियां ज़मीनी स्तर पर काम कर रही हैं. भाजपा की रणनीति दूसरे दलों से अलग है.

कुशवाहा कहते हैं, हमारे काम के तरीके में काफी अंतर है. जो भी लोग यहां कंप्यूटरों पर बैठे हैं, वे सब पार्टी के कार्यकर्ता हैं. सारे लोग रात दस बजे तक काम करते हैं और कार्यकर्ताओं को उनकी रुचि के हिसाब से काम दिया जाता है.

सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू का वार रूम पहले 7, स्ट्रेड रोड में हुआ करता था, जिसे अब बदल दिया गया है. प्रशांत किशोर जदयू के वार रूम के चीफ बनकर पूरे चुनावी क्रियाकलाप की देख-रेख कर रहे हैं. उनकी टीम में 10 आईआईटी एवं आईआईएम प्रोफेशनल हैं, जो चुनाव से संबंधित हर छोटे-बड़े काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं. इसके अलावा पार्टी कार्यकर्ताओं की टीम भी ज़मीनी स्तर पर काम कर रही है.

जदयू के लिए यह चुनाव कितना महत्वपूर्ण है, यह वार रूम की गतिविधियां देखकर सहज ही पता चल जाता है. राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद का चुनाव संचालन पार्टी के कार्यालय से हो रहा है, जहां पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की निगरानी में सारे काम संपादित किए जाते हैं. चाहे वह सोशल मीडिया का काम हो या फिर चुनाव क्षेत्र का, सभी जगह लालू प्रसाद के अपने क़रीबी लोग लगे हुए हैं.

चुनावी सभाओं में क्या बोलना है, क्या संदेश देना है, यह सब खुद लालू यादव तय करते हैं. आज हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल के पास एक वार रूम है, जहां उसकी चुनावी रणनीति तैयार की जाती है. वार रूम में दिन-रात मेहनत करने वालों को आम जनता नहीं जान पाती, जो भूख-प्यास और परिवार की चिंता छोड़कर स़िर्फ इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि चुनाव कैसे जीता जाए.