बिहार विधानसभा चुनाव : अंतिम दो चरण निर्णायक होंगे

electionबिहार विधानसभा चुनाव के चौथे और पांचवें चरण में होने वाला मतदान फाइनल मैच की तरह है. अब तक संपन्न हुए दो चरणों में म़ुकाबला बिल्कुल बराबरी का प्रतीत हो रहा है.

तीसरे चरण के मतदान के बाद भी कोई यह दावा नहीं कर सकता कि बिहार में सरकार किसकी बनेगी. चौथे चरण में 55 और पांचवें चरण में 57 यानी कुल 112 सीटों के लिए मतदान होगा, जो विधानसभा की क़रीब आधी सीटें हैं.

इस लिहाज से देखें, तो अंतिम दो चरणों का मतदान ही राज्य विधानसभा की तस्वीर तय करने वाला साबित होगा. यानी इन दो चरणों में जिसने बाजी मारी, सरकार बनने की संभावना उसी दल की होगी.

पहले के दो चरणों के मतदान को लेकर न स़िर्फ मीडिया, बल्कि खुद राजनीतिक दलों के बीच भी संशय का माहौल है. कोई भी यह दावा कर पाने की स्थिति में नहीं है कि अब तक कौन आगे है और कौन पीछे?

पहले और दूसरे चरण में क्रमश: 57 और 55 प्रतिशत मतदान हुआ और कुल सीटें थीं 81. इन दोनों चरणों की खासियत यह थी कि इनमें पुरुषों के म़ुकाबले महिला मतदाताओं की भागीदारी ज़्यादा रही, वहीं मुस्लिम मतदाता भी बढ़-चढ़कर मतदान करते दिखे.

दूसरी तऱफ इन दो चरणों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धुंआधार सभाएं कीं और यह उम्मीद की जा रही थी कि मतदाता बड़ी संख्या में बाहर निकल कर वोट करेंगे, लेकिन 55 या 57 प्रतिशत मतदान को बड़ी संख्या में हुआ मतदान नहीं कहा जा सकता.

हालांकि, यह भी सच है कि बिहार के पिछले चुनाव के मुक़ाबले यह अधिक है, फिर भी उम्मीद के अनुरूप नहीं है. इससे भी असमंजस की स्थिति बनी है, जिसके चलते कोई भी दल इन दो चरणों को लेकर अपना दावा नहीं ठोक पा रहा है. ऐसे में, चौथा और पांचवां चरण महत्वपूर्ण हो जाता है.

ये चरण इसलिए भी महत्वपूण हैं, क्योंकि इन्हीं के दौरान महा-गठबंधन के माय समीकरण की परीक्षा होनी है, इन्हीं दो चरणों में पप्पू यादव एवं ओवैसी जैसे नेताओं की ताकत का आकलन भी होना है.

ये दो चरण महत्वपूर्ण त्योहारों यथा दीवाली और छठपूजा के ठीक पहले संपन्न होने हैं यानी बड़ी संख्या में प्रवासी बिहारियों के भी चुनाव के दौरान बिहार आने की संभावना है.

तिरहुत, सारण, सीमांचल एवं कोसी में होने वाले इन दो चरणों पर ही बिहार की नई सरकार की तस्वीर बनाने या बिगाड़ने का दारोमदार टिका हुआ है. सीमांचल और कोसी इलाके में पांचवें चरण में मतदान होना है.

कोसी इलाके में तीन ज़िले आते हैं, मधेपुरा, सहरसा एवं सुपौल. वहीं सीमांचल में चार ज़िले हैं, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज एवं अररिया. इन सातों ज़िलों की 37 सीटों के लिए मतदान पांच नवंबर को होना है. इनमें से सात सीटें सुरक्षित हैं, सिंहेश्वर, सोनवर्षा, त्रिवेणीगंज, बनमनखी, कोढा, मनिहारी एवं रानीगंज. शेष सीटें सामान्य कोटे की हैं.

सीमांचल वह इलाका है, जहां पिछली बार भाजपा को काफी फायदा हुआ था. इस बार यहां ओवैसी ने ताल ठोक रखी है. दूसरी तऱफ राजद के पूर्व नेता पप्पू यादव अपनी पार्टी बनाकर कोसी क्षेत्र में महा-गठबंधन को चुनौती देते नज़र आ रहे हैं.

अब यह अलग बात है कि ये दोनों नेता अपना कितना असर दिखा पाते हैं. वैसे ओवैसी की पार्टी स़िर्फ छह सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है. पहले बताया जा रहा था कि वह इस इलाके की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और माना जा रहा था कि इससे महा-गठबंधन को बड़ा ऩुकसान हो सकता है.

लेकिन, अब उनके स़िर्फ छह सीटों पर चुनाव लड़ने का क्या असर होता है, यह देखने वाली बात होगी. वैसे स्थानीय लोग ओवैसी को बाहरी के रूप में ही देख रहे हैं और संभव है कि एकाध सीट को छोड़कर उनकी पार्टी कोई विशेष करिश्मा न दिखा पाए. सीमांचल में पिछली बार भाजपा को काफी फायदा हुआ था, लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान इस इलाके से कांग्रेस, राजद एवं एनसीपी के सांसद चुनकर आए.

उधर चौथे चरण में तिरहुत एवं सारण प्रमंडल की 50 सीटों के लिए एक नवंबर को मतदान होना है. इन दोनों इलाकों में महा-गठबंधन, खासकर राजद पहले मजबूत स्थिति में था, लेकिन नीतीश कुमार और भाजपा के साथ चुनाव लड़ने से पिछले चुनाव तक यहां एनडीए का बोलबाला रहा है. मसलन, पिछली बार पूर्वी चंपारण की 11 विधानसभा सीटों में से एनडीए ने दस सीटें जीत ली थीं. शेष एक सीट ढाका पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहा था, जो अब भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है.

इस बार महा-गठबंधन के तहत राजद ने यहां की 11 में से आठ सीटें खुद के लिए ली हैं. लालू यादव अपना पुराना जनाधार फिर से पाने की कोशिश में जुट गए हैं. सारण प्रमंडल के गोपालगंज और सीवान ज़िले की जिन सीटों के लिए चौथे चरण में मतदान होना है, वहां का भी हाल चंपारण जैसा है. यह क्षेत्र भी नीतीश-भाजपा की जोड़ी बनने से पहले तक लालू यादव का गढ़ हुआ करता था.

पिछले दो चुनावों में ज़रूर भाजपा-जदयू गठबंधन ने यहां अपना परचम लहराया, लेकिन इस बार समीकरण फिर से उलट गया है. इस बार लालू और नीतीश एक साथ हैं. ऐसे में भाजपा पिछले चुनावों जैसा करिश्मा दिखा पाएगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है. ये दोनों वही क्षेत्र हैं, जहां शहाबुद्दीन का वर्चस्व हुआ करता था और यह लालू यादव का गृह क्षेत्र भी है.

दिलचस्प बात यह है कि सीवान, जहां मुसलमानों की आबादी 22 प्रतिशत है और पूर्व में यहां से राजद के टिकट पर मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं, लेकिन इस बार महा-गठबंधन ने सीवान ज़िले में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है. पड़ोसी ज़िले गोपालगंज में मुसलमानों की आबादी 18 प्रतिशत है और वहां महा-गठबंधन ने दो मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं. इस इलाके में वोट-कटवा उम्मीदवारों की भी चर्चा है.

दोनों गठबंधनों का खेल बिगाड़ने के लिए कई उम्मीदवार वोट-कटवा का रोल अदा कर सकते हैं. वैसे गोपालगंज में ब्राह्मणों की अच्छी-खासी संख्या है, जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है. इन इलाकों में भी जातिगत समीकरण वही है, जो बाकी बिहार में है.

बिहार की मौजूदा राजनीति में यह क़रीब-क़रीब सा़फ है कि एनडीए को सवर्ण मतदाताओं का समर्थन हासिल है, जो क़रीब 15 प्रतिशत हैं. इसके उलट महा-गठबंधन के मूल मतदाता समूह मुसलमान, यादव और कुर्मी हैं.

इन सबको मिला दें, तो ये क़रीब 34 से 35 प्रतिशत हैं. दलित, महादलित, पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं का आलम यह है कि इनके बारे में कोई भी राजनीतिक दल या राजनीतिक विश्लेषक सही-सही आकलन करने की स्थिति में नहीं है. यानी ये वे मतदाता हैं, जो चुनाव की दशा और दिशा तय करेंगे.

हालांकि, दोनों गठबंधनों के लिए चिंता के कुछ कारण भी हैं. यदि पिछले दो चरणों के मतदान का रुख समझने की कोशिश करें, तो हम पाते हैं कि महिला मतदाता बड़ी संख्या में बाहर निकल रही हैं. यह कहा जा रहा है कि महिला मतदाताओं ने ही पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को भारी जीत दिलाई थी. इसकी वजह है, पंचायत चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण और सरकारी नौकरियों में बढ़ी हिस्सेदारी.

इस बार भी जदयू ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया है. इसलिए महा-गठबंधन पिछले दो चरणों के दौरान हुई महिला मतदाताओं की भागीदारी को अपने पक्ष में मान रहा है. वहीं दूसरी तऱफ एनडीए के लिए फायदे की बात यह है कि युवा मतदाता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रभावित दिख रहे हैं.

मोदी की रैलियों का फायदा भाजपा-एनडीए को होता दिख रहा है, लेकिन जिस तरह चुनाव की शुरुआत में उन्होंने धुंआधार रैलियां की थीं, वैसा कमाल वह तीसरे चरण में करते नज़र नहीं आए.

कुछ जगहों पर उनकी रैलियां निरस्त कर दी गईं. इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी के लिए चिंता का विषय दाल की बढ़ती क़ीमत भी है. चुनाव से ठीक पहले देश में दालों की क़ीमत में ऐतिहासिक बढ़ोत्तरी हुई है. ग़रीब तो ग़रीब, मध्य वर्ग की थाली से भी दाल गायब हो चुकी है.

भारत के चुनावों में महंगाई सबसे मारक मुद्दा बनती है. इससे सरकारें बनती हैं और गिरती भी हैं. दाल की बढ़ती क़ीमत भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है.

नीतीश कुमार एवं लालू यादव के सामने यह चुनौती है कि चौथे और पांचवें चरण में वे पप्पू यादव-ओवैसी की जोड़ी का असर कैसे कुंद करेंगे. चौथे और पांचवें चरण का मतदान दोनों गठबंधनों के लिए अहम है. जो गठबंधन इन दोनों चरणों में बढ़त हासिल करेगा, वही बिहार की सत्ता पर काबिज होगा.

ओवैसी दिखा पाएंगे दम!

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एक नाम बहुत चर्चा में था, जिसके बारे में कहा जा रहा था कि यह स्थापित समीकरण बिगाड़ सकता है. यह नाम था, राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों को नेतृत्व देने का दावा करने वाली पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन  (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी का. एआईएमआईएम मुख्य रूप से हैदराबाद और तेलंगाना की पार्टी है.

पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतकर पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कहा जा रहा था कि ओवैसी यहां भी अपने उम्मीदवार उतार कर महा-गठबंधन का खेल बिगाड़ सकते हैं.

वह टीवी न्यूज शो में दिखने भी लगे थे. फिर पार्टी की तऱफ से घोषणा हुई कि वह मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र सीमांचल की 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. इसमें भी ध्रुवीकरण की संभावनाएं तलाश की जा रही थीं.

लेकिन, अब पार्टी के केवल छह उम्मीदवार मैदान में हैं और वह भी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में. अब सवाल यह उठता है कि ओवैसी ने इतने कम उम्मीदवार क्यों उतारे? दरअसल, ऐसी खबरें आ रही थीं कि सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव महा-गठबंधन की तऱफ है और वे ओवैसी को फिलहाल वोट नहीं देंगे. इसलिए ओवैसी ने मतदाताओं का मिजाज़ भांपते हुए केवल छह उम्मीदवार मैदान में उतारे.

इसमें एक दूसरा नज़रिया यह भी है कि उन पर आरोप लग रहे थे कि वह एनडीए से साठगांठ करके चुनाव लड़ रहे हैं और उनका मकसद एनडीए को फायदा पहुंचाना है. यह ऐसा आरोप है, जिसे वह किसी भी हालत में अपने सिर नहीं लेना चाहेंगे. फिलहाल उनकी नज़र उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर है. बहुजन समाज पार्टी के साथ उनकी पार्टी के गठबंधन की अटकलें भी लगाई जा रही हैं.

वह खुद भी महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में मुस्लिम-दलित समीकरण का सफल परीक्षण कर चुके हैं. इसलिए वह यह बिल्कुल साबित नहीं करने देना चाहते कि बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी वजह से भाजपा या एनडीए को फायदा पहुंचा. साथ ही छह उम्मीदवार खड़े करने से उन्हें यह अंदाज़ा भी हो जाएगा कि उत्तर भार्रींत के मुसलमानों का रुझान उनकी तऱफ है या नहीं.

नए पोस्टर, नए चेहरे

दूसरे चरण के मतदान से ठीक पहले एनडीए के चुनाव अभियान में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव नज़र आए. अब तक बिहार के हर नुक्कड़, हर चौराहे पर और सड़कों के किनारे जो बैनर और होर्डिंग्स लगे हुए थे, उनमें मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की तस्वीर थी.

लेकिन, अब ऐसे पोस्टर लग गए हैं, जिनमें भाजपा के राज्यस्तरीय नेताओं जैसे सुशील कुमार मोदी, सीपी ठाकुर, अश्विनी चौबे, हुकुम देव  नारायण यादव आदि के अलावा एनडीए के घटक दलों के नेताओं राम विलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की तस्वीरें हैं. साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बक्सर, हाजीपुर और पालीगंज में होने वाली रैलियां भी रद्द कर दी गईं.

चुनाव के ठीक बीच में एनडीए की रणनीति में अचानक हुए इस बदलाव को कई तरह से देखा जा रहा है. अब तक हुए मतदान में समीक्षक किसी भी गठबंधन को बढ़त लेते हुए नहीं दिखा रहे हैं. ऊंट किस करवट बैठेगा, यह भी अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो गया है. यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री की रैलियों में आने वाली भीड़ मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में नाकाम रही है.

इसलिए अगर नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं आते, तो प्रधानमंत्री को इसकी ज़िम्मेदारी से बचाया जा सके. एक नज़रिया यह भी है कि अमित शाह और मोदी के पोस्टरों को महा-गठबंधन स्थानीय बनाम बाहरी का रंग देने में कामयाब हो रहा है. इसलिए भाजपा ने बैंकफुट पर जाते हुए अपने पोस्टरों में स्थानीय नेताओं के साथ-साथ सहयोगी दलों के नेताओं की तस्वीरें लगवा दी हैं.

एक नज़रिया यह भी है कि भाजपा के अंदरूनी सर्वे में यह पाया गया कि जीतन राम मांझी एवं राम विलास पासवान दलित और महादलित वोटों को भाजपा में हस्तांतरित कराने में नाकाम रहे हैं. इसलिए भाजपा, जिसने पहले अपने चुनाव का ताना-बाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द तैयार किया था, अब उन्हें हटा रही है, क्योंकि वह अब यह सोचने लगी है कि राज्य के 15-20 प्रतिशत फ्लोटिंग वोटर्स (अस्थिर मतदाता) ही चुनाव में निर्णायक साबित होंगे.

ऐसे में, प्रधानमंत्री की साख दांव पर लगाना उचित नहीं है. बहरहाल, भाजपा की रणनीति में बदलाव के पीछे जो भी वजह रही हो और उसका चुनाव के नतीजों पर जो भी असर पड़े, लेकिन उसने विपक्षी खेमे को फिलहाल हमला करने का हथियार दे दिया है.

कितने असरदार साबित होंगे पप्पू 

बिहार में एक कहावत बेहद मशहूर है, रोम पोप का, मधेपुरा गोप (यादव) का. वजह, यह एक यादव बाहुल्य क्षेत्र है. फिलहाल इस क्षेत्र के सबसे चर्चित नेता पप्पू यादव हैं. पप्पू यादव कोसी में नेताजी के नाम से मशहूर हैं.

पिछले लोकसभा चुनाव में राजद के टिकट पर लड़ते हुए उन्होंने जदयू अध्यक्ष शरद यादव को हराया था. साथ ही उनकी पत्नी रंजीता रंजन ने उसी चुनाव में मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी.

फिलहाल वह राजद से अलग होकर अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी (जअपा) के साथ चुनाव मैदान में हैं. यह माना जाता है कि कोसी क्षेत्र में उनका एक मज़बूत जनाधार है. बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले वह एनडीए के क़रीब दिखे, लेकिन चुनाव नज़दीक आते-आते यह सा़फ हो गया कि एनडीए में उनके लिए गुंजाइश नहीं बन पाएगी.

बहरहाल, पप्पू यादव की अहमियत इस चुनाव में इस बात पर निर्भर करती है कि वह यादव मतदाताओं को लालू यादव से कितना दूर ले जाते हैं. भाजपा की नज़र भी यादव मतदाताओं पर है.

पहले तो पार्टी ने खुद यादव मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, लोकसभा चुनाव में उसे इसमें कामयाबी भी मिली. लेकिन, अगर मीडिया रिपोट्‌र्स की मानें, तो कम से कम इस चुनाव में यादव मतदाताओं का रुझान लालू यादव की ओर है.

इसलिए अब एनडीए भी पप्पू यादव की तऱफ देख रहा है, क्योंकि पप्पू यादव जितना अधिक यादव वोटों में सेंध लगाएंगे, एनडीए को उतना ही फायदा होगा और महा-गठबंधन का ऩुकसान.

हालांकि, पप्पू यादव की चुनावी सभाओं में भीड़ जुट रही है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि यह भीड़ वोटों में तब्दील हो पाएगी या नहीं. वैसे यह तय है कि कोसी के अलावा अगर दूसरे क्षेत्रों में भी वह यादव मतदाताओं को अपने पक्ष में करने अथवा यादव वोटों में सेंध लगाने में कामयाब हो जाते हैं, तो लालू यादव और नीतीश कुमार के महा-गठबंधन की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

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