विरोध का पाखंड पर्व

नयनतारा सहगल अंग्रेजी साहित्य का बड़ा नाम है. माना जाता है कि वह आजाद भारत की पहली भारतीय अंग्रेजी लेखिका हैं, जिन्हें इतनी शोहरत मिली. साठ और सत्तर के दशक में उन्होंने अपने स्तंभों से भारतीय राजनीति में अपनी पारिवारिक विरासत से इतर अपनी पहचान बनाई थी. नयनतारा सहगल जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं.

अभी हाल ही में उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान कर सुर्खियां बटोरी हैं. नयनतारा सहगल का मानना है कि इस वक्त देश का माहौल ठीक नहीं है और यहां आतंक का राज है. उनके शब्द हैं- रेन ऑफ टेरर. नयनतारा के मुताबिक, इस वक्त देश में असहमति के स्वर को साजिशन दबाया जा रहा है और विरोध की आवाज का कत्ल किया जा रहा है. नयनतारा सहगल ने अपने बयान में कहा है कि मौजूदा वक्त में असहमति के अधिकार की लड़ाई लड़नेवालों को भय के वातावरण में जीना पड़ रहा है.

भारत की बहुलतावादी संस्कृति पर आए इस खतरे के विरोध स्वरूप उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है. नयनतारा सहगल का कहना है कि साहित्य अकादमी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही है और साहित्य अकादमी की खामोशी उनको पुरस्कार लौटाने को मजबूर कर रही है. नयनतारा सहगल की अपेक्षा है कि साहित्य अकादमी मौजूदा हालात में लेखकों के पक्ष में खड़े होकर उसकी सियासत का हिस्सा बने. नयनतारा सहगल की इस चाहत पर आगे बात होगी, लेकिन पहले कुछ तथ्यों पर नजर डाल लेते हैं.

दरअसल, नयनतारा सहगल को उन्नीस सौ छियासी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था. यह सम्मान उनको उनकी अंग्रेजी में छपी किताब रिच लाइक अस पर दिया गया था. साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने के करीब तीन दशक के बाद नयनतारा सहगल की संवेदना जागी और उन्होंने देश की मौजूदा हालात के मद्देनजर विरोध दर्ज करवाने का फैसला लिया.

अब जरा कुछ और तथ्यों पर गौर करते हैं. उन्नीस सौ छियासी में नयनतारा सहगल को साहित्य अकादमी ने अपने पुरस्कार से नवाजा. उसके दो साल पहले उनकी ममेरी बहन और उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षा गार्डों ने गोलियों से भून डाला था. इंदिरा गांधी की हत्या के विरोध में दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे हुए थे. दिल्ली के सिख विरोधी दंगों में हजारों सिखों का कत्ल कर दिया गया था.

उनमें से कइयों को जिंदा जला दिया गया था. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों के बाद देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बयान दिया था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो आसपास की जमीन हिलती ही है. सिखों के नरसंहार और उसके बाद उस वक्त के प्रधानमंत्री के इस संवेदनहीन बयान के बाद भी नयनतारा सहगल जी की संवेदना नहीं जगी थी.

संभव है कि हाल में मिला साहित्यिक पुरस्कार और उससे मिल रहा यश उनकी संवेदना पर भारी पड़ गया हो. खैर, नयनतारा सहगल की संवेदना तो उनको पुरस्कार मिलने के तीन साल बाद भागलपुर में हुए सांप्रदायिक दगों के बाद भी नहीं जगी. भागलपुर दंगे में भी सैकड़ों लोग मारे गए थे. इस तरह के हादसों की बड़ी लंबी फेहरिश्त है. दो हजार दो के गुजरात दंगों के वक्त भी वो खामोश रहीं. अब पुरस्कार मिलने के उनतीस साल बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान करना सवाल खड़े करता है.

उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने के अपने बयान में दादरी हत्याकांड से लेकर नरेन्द्र डाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कालबुर्गी तक की हत्या पर चिंता जताई है. उनकी चिंता जायज है. किसी भी सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं होता है. विचारों की लड़ाई सिर्फ और सिर्फ कलम से लड़ी चली जानी चाहिए. उसमें गोली-बंदूक का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. गोली-बंदूक से विचारों की लड़ाई लड़ने का इतिहास या तो वामपंथियों के नाम है या फिर इन दिनों आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के नाम.

इसी तरह से हिंसा के बाद उस पर सियासत करना या उसको आधार बनाकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करना भी उचित नहीं है. नयनतारा सहगल ने अपनी संवेदना आहत होने की जो वजह बताई है, वो कम से कम उन्नीस सौ चौरासी के सिख दंगे और भागलपुर या गुजरात के सांप्रदायिक दंगे से कम भयावह है. उस वक्त देश का जो माहौल था, क्या अब उससे अधिक खराब है. अतीत को आधार बनाकर वर्तमान की गड़बड़ियों को सही नहीं ठहराया जा सकता है, लेकिन जब संवेदना जगने की बात होगी तो तुलनात्मक विश्लेषण होना तय है.

नयनतारा सहगल ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी निशाना साधा और दादरी से लेकर प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या तक पर उनकी खामोशी पर सवाल खड़े किए. सवाल खड़े करने के बाद भी वो नहीं रुकीं और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को अपनी विचारधारा को समर्थन करनेवाले शैतानों तक के खिलाफ नरमी बरतनेवाला करार दिया या कहें कि उन्होंने साफ कर दिया कि अगर शैतान भी मोदी की विचारधारा का समर्थन करता हो तो मोदी उसके खिलाफ कार्रवाई से आंखें मूंद लेंगे. दरअसल, नयनतारा सहगल का संघ विरोध पुराना है.

उन्नीस सौ उनहत्तर-सत्तर में उन्होंने अपने एक स्तंभ में जनसंघ के नारे-हिंदी-हिंदू-हिन्दुस्तान पर जमकर वार किया था और इसको भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा करार दिया था. उसके बाद भी उन्होंने लगातार जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अपने स्तंभों में हमले किए. कालांतर मे वो इंदिरा गांधी के विरोध में लग गईं थीं, जो कि एक अवांतर और बेहद लंबा प्रसंग है. अपने बयान में नयनतारा सहगल ने कहा है कि इस वक्त देश में आतंक का राज है. नयनतारा सहगल बहुत ही अनुभवी पत्रकार, स्तंभ लेखक और राजनीति को बेहद करीब से देखनेवाली रही हैं.

वो जब इस तरह के शब्दों या जुमलों का इस्तेमाल करती हैं तो हैरानी होती है. अचरच इस बात पर होता है कि इतनी वरिष्ठ लेखिका भारतीय लोकतंत्र को इतना कमजोर समझती हैं कि कोई भी शख्स पूरे देश में आतंक का राज कामय कर ले जाएगा. नयनतारा सहगल ने तो इमरजेंसी और उसके बाद के हालात को बहुत करीब से देखा है और उसपर एक किताब भी लिखी है. उन्हें इस तरह की गलतफहमी किस वजह से हो रही है ये समझ से परे है. नयनतारा सहगल और उनके एलान के बाद उनको लाल सलाम कर लहालोट होनेवाले उनके समर्थकों को यह समझने की आवश्यकता है कि हर घटना को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देखने का चुनिंदा फैशन बंद होना चाहिए. नयनतारा सहगल की संवेदना उस वक्त क्यों नहीं जागी, जब वामपंथी सरकार ने तसलीमा नसरीन के साथ अन्याय किया, वोटबैंक की खातिर उनको राज्य से बाहर का रास्ता दिखा दिया. कांग्रेस ने भी उसको कायम रखा.

हाल के दिनों में पुरस्कार लौटाने के पाखंड पर्व की शुरुआत जादुई यथार्थवादी कथाकार उदय प्रकाश ने की. काफी लंबे समय से उदय प्रकाश की लेखनी ठंडी पड़ी थी. ऐसे में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का दांव चलकर उन्होंने प्रचार तो हासिल कर ही लिया. साहित्य अकादमी से लेखकों की अपेक्षा है कि वो हत्या और हिंसा के विरोध में प्रस्ताव पारित करे. दरअसल, ऐसी मांग करनेवाले लेखक और लोग साहित्य अकादमी की परंपरा और उसके संविधान आदि से अनजान हैं. लेखकों से साहित्य अकादमी की अपेक्षा विशुद्ध राजनीतिक है और वो अपनी राजनीति को साहित्य अकादमी के कंधे पर चलाना चाहते हैं.

क्या ये संभव है? इन लेखकों को डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स ऑफ साहित्य अकादमी पढ़नी चाहिए, जिसमें उन्होंने विस्तार से अकादमी के गठन और उसकी परंपरा का उल्लेख किया है. यह अलहदा बात है कि वामपंथी विचारधारा के लोग कांग्रेस के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कर रहे थे. उस दौर में ही साहित्य अकादमी का पतन शुरू हुआ था. साहित्य अकादमी पर वाम विचारधारा के लोगों ने कब्जा जमाए रखा और उसके बाद भी ऐसी व्यवस्था कर दी कि लेखकों की बजाए विश्वविद्यालयों के शिक्षकों का कब्जा रहेगा.

विश्वविद्यालयों के उन शिक्षकों का, जिनका समकालीन साहित्य में कम से कम लेखन के माध्यम से कोई हस्तक्षेप नहीं है. अब उन लोगों से यह अपेक्षा करना कि वो सरकार के खिलाफ या किसी घटना विशेष के खिलाफ तनकर खड़े हो जाएंगे, बेमानी है, बचपना है. पुरानी कहावत है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय. साहित्य अकादमी के पतन के जिम्मेदार लोग आज अकादमी से उच्च मानदंडों की अपेक्षा कर रहे हैं. इसी अपेक्षा की बुनियाद पर खड़ा विरोध हवाई लगता है.