असुरक्षित आधी आबादी

protestबीते 24 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना में महिलाओं को लड़ाकू पायलट के रूप में शामिल करने के लिए मंजूरी दी गई. इस संबंध में रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यह प्रगतिशील क़दम भारतीय महिलाओं की आकांक्षाओं के मद्देनज़र उठाया जा रहा है, ताकि उन्हें अपनी क्षमता साबित करने का समान अवसर मिले. स्पष्ट है कि रक्षा मंत्रालय को भी देश की बेटियों के साहस एवं योग्यता पर पूर्ण विश्वास है.

जहां एक ओर भारतीय वायुसेना एवं भारत-तिब्बत सीमा पुलिस में महिलाओं को मौक़े दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं को सुरक्षा देने के मामले में सरकार के सारे प्रयास विफल साबित होते नज़र आ रहे हैं.

कहने को तो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, लाडली लक्ष्मी योजना एवं सुकन्या समृद्धि योजना जैसी अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, बावजूद इसके हम खुद के लिए एक सवाल बनकर रह गए हैं कि हमने लड़की होने का सौभाग्य पाया है या शाप?

हम खुद पर गर्व करें या बेटी होने का मातम मनाएं? हमारा समाज कितना भी आगे क्यों न चला गया हो, पर सोच आज भी वही पुरानी है. लड़कियां चांद तक पहुंच गईं, लेकिन वे उस समाज को नहीं बदल सकीं, जिसमें उनका जन्म हुआ. देश में दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म और उसके बाद हत्या की घटनाएं नित्य अ़खबारों की सुर्खियां बनती हैं.

यही नहीं, जब कोई लड़की अथवा महिला ऐसे किसी हादसे की शिकार बनती है, तो समाज और उसके सगे-संबंधी उसकी पीड़ा समझने के बजाय उसे ही दोषी ठहराते हैं. कई बार तो पीड़िता को घर से निकाल दिया जाता है, ताकि परिवार की इज्जत बरकरार रहे. अधिकतर मामलों में पीड़िता के पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता.

चंद मामले ऐसे देखने को मिलते हैं, जिनमें वे घर वालों के सहयोग से एक नई ज़िंदगी की शुरुआत कर पाती हैं. ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश के खंडवा ज़िले का एक परिवार है, जिसकी एक नाबालिग बच्ची दुष्कर्म की शिकार होने से गर्भवती हो गई, लेकिन समाज की परवाह किए बिना पूरी हिम्मत के साथ उसने बच्चे को जन्म दिया और फिर अपनी पढ़ाई पूरी करने में जुट गई.

उस मासूम के साथ जो हुआ, उसे वह भुला नहीं सकती, लेकिन माता-पिता से मिले समर्थन के बाद उसने खुद को संभाला. अगर हर माता-पिता इसी तरह अपनी बेटियों की ताकत बन जाएं, तो समाज उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि ऐसे हादसों के बाद अधिकतर माता-पिता अपनी पीड़ित बेटी से मुंह मोड़ लेते हैं. कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों के पीछे ऐसे हादसों की आशंका भी एक वजह है.

दुष्कर्म के अधिकतर मामले बदनामी के डर से अभिभावकों द्वारा दबा दिए जाते हैं और जो मामले बमुश्किल पुलिस तक पहुंचते भी हैं, उनमें न्याय पीड़िता के मरने के बाद ही मिलता है या फिर समाज में पूरी तरह बदनाम होने के बाद. दुष्कर्म की बढ़ती घटनाएं और आधी आबादी की सुरक्षा हमारे लिए चिंता का विषय हैं.

वर्ष 2013 में जब दिल्ली की एक विशेष अदालत ने निर्भया के गुनहगारों को सजा-ए-मौत का फरमान सुनाया, तो देश की जनता के बीच एक उम्मीद-सी बंधी थी, एक सार्थक संदेश पहुंचा था कि महिलाओं, युवतियों, किशोरियों एवं बच्चियों की अस्मत से खेलने वाले दरिंदे अब ऐसा कुछ करने से डरेंगे.

नेशनल क्राइम रिकॉड्‌र्स ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2014 में देश भर में सामूहिक दुष्कर्म के 2,300 मामले सामने आए, जिनमें से 570 मामले उत्तर प्रदेश के हैं. एनसीआरबी के मुताबिक, पूरे देश में दुष्कर्म के लगभग 37,000 मामले प्रकाश में आए, जिनमें 197 मामले पुलिस हिरासत में अंजाम दिए गए और उनमें भी 90 ़फीसद यानी 189 मामले उत्तर प्रदेश के हैं.

दुष्कर्म के मामले में मध्य प्रदेश अव्वल रहा, जबकि राजस्थान दूसरे पायदान पर. निर्भया प्रकरण के बाद एक नया क़ानून बना, वह अमल में भी आया, लेकिन कोई बदलाव देखने को नहीं मिला. स्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही हैं. पार्कों, सार्वजनिक शौचालयों एवं बाज़ारों में भी महिलाएं, युवतियां, किशोरियां और बच्चियां आएदिन वहशियों का शिकार बन जाती हैं. कामकाजी महिलाओं एवं छात्राओं को हर पल खतरा महसूस होता रहता है.

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने बंगलुरू में आयोजित महिला अधिवक्ताओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि महज सख्त क़ानून बना देने से महिलाओं के खिला़फ यौन हिंसा रोकना असंभव है.

इसे रोकने के लिए एक समग्र प्रक्रिया विकसित करने के साथ-साथ व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाना होगा, क्योंकि यह केवल क़ानून का मसला नहीं है. दरअसल, हमारे देश एवं समाज की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह समस्या के समाधान के लिए क़ानून को अंतिम विकल्प मानता है, जबकि क़ानून समाधान का अंतिम विकल्प नहीं है.

समस्याओं का समाधान समाज के स्तर पर भी हो सकता है, बशर्ते वह न्यायपरक हो. महिलाओं के खिला़फ हिंसा पूरे देश के लिए एक गंभीर समस्या है, वह चाहे यौन हिंसा हो, घरेलू हिंसा हो अथवा समाज के स्तर पर होने वाली किसी भी तरह की हिंसा. प (चरखा)