गंगा आज भी मैली है

gangaपर्यावरण बचाव और वन संरक्षण और अन्य प्राकृतिक संसाधनों सहित पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी मामले के प्रभावशाली और तीव्र गति से निपटारे के लिए गठित नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) या राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने गंगा सफाई को लेकर केंद्र सरकार से सख्त लहज़े में अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है. एनजीटी ने सरकार से पूछा कि वह गंगा नदी के 2500 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में कोई एक जगह बताये जहां गंगा सा़फ है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी से गंगा को प्रदूषित कर रहीं औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा था. बहरहाल न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली एनजीटी की पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि 5000 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि खर्च करने के बाद भी गंगा की हालत बद से बदतर होती जा रही है. गंगा सफाई के प्रति सरकार के सुस्त रवैये की आलोचना करते हुए एनजीटी ने कहा कि गंगा की सफाई के सिलसिले में कुछ भी होते हुए नहीं दिख
रहा है.

इसमें कोई शक नहीं कि गंगा नदी उत्तर भारत की जीवन रेखा है. गंगा न केवल एक नदी का नाम है बल्कि एक संस्कृति और तहजीब का भी नाम है. इस नदी से करोड़ों लोगों के जीवन और मृत्यु, आशा और निराशा, ख़ुशी और गम का सिलसिला जुड़ा हुआ है. करोड़ों लोगों की यह आस्था है कि इस में एक डुबकी लगाने मात्र से उसके जन्म-जन्मान्तर का कल्याण हो जाता है.

लेकिन फिलहाल इस नदी का वजूद खतरे में हैं. ज़ाहिर है यदि नदी का वजूद खतरे में है तो इसके किनारे रहने वाले लोग भी खतरे में हैं. यह खतरा कितना संगीन है इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. हज़ारों साल से जीवनदायिनी साबित होती आ रही गंगा का पानी अब पीने योग्य तो दूर, नहाने और सिंचाई के योग्य भी नहीं बचा है.

कन्नौज से लेकर कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक जहां एक तरफ गंगा के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घटती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ खतरनाक रसायनों की मात्रा बढ़ती जा रही है. बड़े-बड़े बांध और गंगा के किनारे बसे चमड़ा एवं रासायनिक कल-कारखानों और शहरों से निकलने वाला कचरा गंगा के पानी को ज़हर बना चुका है.

ऐसा नहीं है की गंगा की सफाई की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई थी. और उसके बाद से कई योजनायें और भी आईं मौजूदा केंद्र सरकार ने भी नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत की है. लेकिन हज़ारों करोड़ रुपये की इन योजनाओं के बावजूद गंगा मैली की मैली ही बनी हुई है.

चौथी दुनिया ने वर्ष 2010 में पिछले 25 सालों के दौरान दो गंगा एक्शन प्लान के प्रभाव का जायजा लिया था. उस समय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों के मुताबिक गंगा एक्शन प्लान के दूसरे चरण के केवल दो वर्षों 2005-2009 के दौरान गंगा की स़फाई के नाम पर 1600 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च किए गए थे.

गंगा एक्शन प्लान के पहले चरण में 452 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. उस समय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने यह माना था कि गंगा एक्शन प्लान-1 अपने मक़सद में सफल नहीं हो सका, इसलिए 1993 में गंगा एक्शन प्लान-2 शुरू किया गया. इसके बावजूद गंगा में प्रदूषण का स्तर बढ़ता ही रहा.

फिलहाल केंद्र सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के तहत वर्ष 2014-15 के लिए 1500 करोड़ रुपये और 2015-16 के लिए 2100 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है. लेकिन एनजीटी कीटिप्पणी के मुताबिक यथा स्थित बनी हुई है. ऐसे में इस आशंका को बल मिलता है कि गंगा की सफाई के नाम पर बनी परियोजनाओं की राशि का कहीं बंदरबांट तो नहीं हो रहा है?

वर्ष 2010 के सरकारी आंकड़े बता रहे थे कि हरिद्वार से जैसे ही गंगा आगे बढ़ती है, इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घटनी शुरू हो जाती है. कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक पहुंचते-पहुंचते गंगा की हालत यह हो जाती है कि इसका पानी पीना तो दूर, नहाने लायक़ भी नहीं रह जाता. बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) एक जांच प्रक्रिया है, जिससे पानी की गुणवत्ता और उसमें ऑक्सीजन की मात्रा का पता चलता है.

गंगाजल के बीओडी जांच के मुताबिक़, कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद और बनारस में बीओडी की मात्रा 3.20 मिलीग्राम/लीटर से लेकर 16.5 मिलीग्राम/लीटर तक है, जबकि यह मात्रा 3.0 मिलीग्राम/लीटर से बिल्कुल भी ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. इसका अर्थ है कि उपरोक्त जगहों पर गंगास्नान आपके जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. गंगा में प्रदूषण की जो हालत वर्ष 2010 में थी वही हालत अब भी बरक़रार है.

जिन शहरों का ज़िक्र ऊपर किया गया है उन शहरों में आज भी गंगा का पानी खतरनाक हद तक दूषित है. उदहारण के लिए अप्रैल 2015 में वाराणसी में गंगा के पानी की जांच के बाद यह पाया गया कि यहां गंगा जब दाखिल होती है तो उसमें बीओडी की मात्र लगभग 3 मिलीग्राम/लीटर थी और जब यहां से बाहर निकली तो यह मात्र लगभग 5 मिलीग्राम/लीटर थी.

एक रिपोर्ट के मुताबिक 6000 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) कचरे में 80 प्रतिशत कचरा अशोधित रूप में ही गंगा में छोड़ा जाता है. अकेले कानपुर में 78 से ज़्यादा ऐसे चमड़ा उद्योग हैं, जो प्रदूषण नियंत्रण निर्देशों का पालन नहीं करते और रोज़ाना हज़ारों लीटर कचरा गंगा में बहा देते हैं. हालांकि एनजीटी ने केंद्र सरकार से यह पूछा है कि अगर चमड़ा उद्योग से नदी का प्रदूषण स्तर बढ़ रहा है तो वह इसे बंद करने या कहीं और स्थानांतरण का आदेश दे सकते हैं.

गोमुख से हरिद्वार तक ही कॉलिफोर्म बैक्टीरिया की मात्रा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अधिकतम सीमा 500 पीएन/100 मिली लीटर से ऊपर है यानि यह पानी पीने योग्य नहीं है. अब अगर गंगा की शुरुआत में ही ऐसी स्थिति है तो फिर इसे आगे उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगल के प्रदूषण का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है.

इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च के 2012 के एक शोध के मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में गंगा के किनारे रहने वाले लोगों को कैंसर का मर्ज़ होने का खतरा अधिक है. इसलिए गंगा की सफाई न सिर्फ पर्यावरण के लिए बल्कि यहां बसने वाले जीवन के लिए भी अत्यंत आवश्यक है.

बहरहाल, गंगा की सफाई को लेकर लचर सरकारी रवैया, जो गंगा एक्शन प्लान के ज़माने में था, अब भी बरक़रार है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने चुनाव भाषण के दौरान ही गंगा की सफाई पर विशेष बल दिया था. उसी के मद्देनज़र केंद्र सरकार ने गंगा सफाई के लिए नमामि गंगे परियोजना शुरू की है.

इस परियोजना को शुरू हुए भी एक वर्ष से अधिक समय बीत गया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई परिवर्तन होते नहीं दिख रहा है. केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती कहती हैं कि गंगा के प्रदूषण मुक्ति के संकेत अक्टूबर 2016 के बाद से मिलने शुरू होंगे. ज़ाहिर है जहां पिछली योजनायें कई वर्षों में जिस काम को पूरा नहीं कर पाईं तो केवल एक साल में किसी बड़े नतीजे की अपेक्षा करना थोड़ी ज्यादती होगी.

लेकिन कार्य में प्रगति दिखनी चाहिए इसलिए एनजीटी को पहल करते हुए उत्तर भारत की इस जीवन रेखा गंगा नदी को चरणबद्ध तरीके से नया जीवन देने और इसकी पुरानी पवित्रता बहाल करने की पहल करनी पड़ रही है.

loading...