वामपंथ किस राह जा रहा है

gandhi maidanवामपंथ की धारा तभी सूखने लगी थी, जब पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के हाथों उसे करारी शिकस्त मिली थी. फिर भी, एक विचारधारा के तौर पर क्या वामपंथ का अस्तित्व अभी भी बचा हुआ है या खत्म होने की कगार पर है? यह सवाल बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम को लेकर और भी प्रासंगिक हो जाता है. बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार छह वामपंथी दलों भाकपा, माकपा, भाकपा (माले), फारवर्ड ब्लॉक, आरएसपी एवं एसयूसीआई (सी) ने मिलकर चुनाव ल़डा.

लेकिन यह एकता वामपंथी दलों को वो सफलता नहीं दिला पाई, जिसकी उन्हें तलाश थी. हालांकि, इस चुनाव में सीपीआई (एमएल) लिबरेशन को तीन सीटों पर जरूर सफलता मिली है, लेकिन बाकी के वामपंथी दलों का खाता भी नहीं खुला.

2010 के बिहार विधान सभा चुनाव में केवल भाकपा एक सीट जीतने में कामयाब हुई थी. अन्य वामदलों का खाता भी नहीं खुल पाया था. 2015 के चुनाव में सीपीआई (एमएल) लिबरेशन को दरौली, तरारी और बलरामपुर सीट पर जीत हासिल हुई है. गौरतलब है कि 2005 के चुनाव में जहां इसे सात सीटें मिली थीं, वहीं 2010 में ये अपना खाता भी नहीं खोल पाई. 2015 में भाकपा (माले) लिबरेशन को करीब 1.5 फीसदी वोट मिले हैं.

दूसरी तरफ, भाकपा अपना खाता भी नहीं खोल सकी, जबकि एक वक्त था, जब 1967 से लेकर 1995 तक इस पार्टी के विधायक अच्छी-खासी संख्या में जीतते रहे हैं, लेकिन सवाल ये है कि आखिर पिछले कुछ सालों में ऐसा क्या हुआ कि बिहार की उस धरती से वामपंथ का लगभग सफाया हो गया, जहां कभी बेगुसराय को पूरब का मास्को और चंपारण को लेनिनग्राद के नाम से लोग जानते थे. यदि पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डाली जाए तो यह सा़फ हो जाएगा कि राज्य में वामपंथ का बड़ा आधार था, लेकिन चुनाव में किसी भी वामपंथी दल को कोई सीट नहीं मिली थी.

यहां तक की 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लिए चल रही सहानुभूति लहर में भी वामपंथी पार्टियों को 13 सीटें मिली थीं. लेकिन साल 2000 तक बिहार में वामपंथी पार्टियों की हालत खराब होती चली गई. वैसे तो पूरे देश से ही वाम दलों के आधार में कमी आती नजर आ रही है. पश्चिम बंगाल, केरल से वे सत्ता से बाहर हो चुके हैं.

त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य में जरूर अभी भी उनकी सरकार है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी लेफ्ट को मुंह की खानी प़डी. वैसे राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि वाम दलों के खस्ताहालत के लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं. खुद इन दलों ने अपने से विपरीत वैचारिक दृष्टिकोण वाली पार्टियों के साथ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गठबंधन कर अपने आधार को धीरे-धीरे खिसकने दिया और दूसरी तरफ उनके साथ आए दल मजबूत होते चले गए.

बिहार में वामपंथी दलों के अस्तित्व के बारे में सीपीआई (एमएल) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य का मानना है कि पार्टी के आंदोलन में कोई ठहराव नहीं हुआ है, उसमें विस्तार ही हो रहा हैं, लेकिन सच्चाई यह भी है कि बिहार के वामपंथी जनाधार में कमी आई है. उन्होंने कुछ मुद्दे जरूर उठाए, लेकिन उस पर चर्चा नहीं हुई.

वैसे कहा ये भी जा रहा है कि पूरी दुनिया से वामपंथ के कमजोर होने का असर भारत में भी दिखा है और इसका असर बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम में भी दिख रहा है, तो इसमें कोई आशचर्य की बात नहीं होनी चाहिए. बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम से सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला है कि छह वामपंथी पार्टियों का गठबंधन भी बिहार में अपनी खोई हुई ज़मीन हासिल करने में सफल नहीं हो पाया.