गुल खिला सकता है नेपाल का मधेश आंदोलन

एक ओर भारत-नेपाल का सीमावर्ती राज्य बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए सत्ता संग्राम का मैदान बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर वर्ष 2006-07 के मधेश विद्रोह के दौरान नेपाल सरकार एवं मधेशी दलों के बीच हुए समझौते के प्रावधान अंतरिम संविधान में शामिल किए जाने के बावजूद उन्हें नए संविधान से हटाने को लेकर नेपाल उग्र आंदोलन का केंद्र बना हुआ है.

आंदोलन के चलते एक ओर नेपाल के तराई में रहने वाले मधेशी परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार की चुप्पी को विरोधी दल प्रमुख मुद्दा बनाकर सीमांचल में चुनावी तस्वीर बदलने की तैयारी में लगे हैं.

पिछले दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने नेपाल के मधेश आंदोलन पर जमकर भड़ास निकाली. सीतामढ़ी के डुमरा में आयोजित पत्रकार सम्मेलन में उन्होंने कहा कि स़िर्फ एक मधेश-एक प्रदेश का सवाल नहीं है, बल्कि जनसंख्या के आधार पर संसद में सीटों का निर्धारण, समानुपातिक समावेशी प्रतिनिधित्व, प्रत्येक दस वर्षों के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का पुनरावलोकन, हिंदी को मान्यता एवं समान नागरिकता जैसी मांगें भी मुद्दे में शामिल हैं.

उन्होंने अ़फसोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि हाल में जो संविधान संसद से पारित किया गया है, उसके अनुच्छेद 283 के मुताबिक राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, प्रधान न्यायाधीश, संसद के सभा प्रमुख, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा के सभा प्रमुख, सुरक्षा अंगों के प्रमुख पदों के लिए केवल वही हक़दार होंगे, जिन्हें नागरिकता वंशज के आधार पर मिली है.

नेपाल में ब्याही भारतीय बेटियां और उनकी संतानें दोयम दर्जे की नागरिक होंगी और इन उच्च पदों के योग्य नहीं मानी जाएंगी. रघुवंश प्रसाद सिंह ने सा़फ कहा कि इस संवेदनशील मामले में भारत सरकार के ढुलमुल रवैये से लाखों परिवारों में रोटी-बेटी के रिश्ते पर आघात पहुंचा है.

नेपाल का तराई क्षेत्र तक़रीबन दो महीने से धधक रहा है. मेची से महाकाली के बीच क़रीब एक करोड़ 40 लाख मधेशी रहते हैं. उन्होंने कहा कि धरना-प्रदर्शन और आर्थिक नाकेबंदी के चलते जनजीवन अस्त-व्यस्त है. यही नहीं सेना एवं पुलिस द्वारा की गई फायरिंग में क़रीब 50 लोग मारे गए और हज़ारों लोग जख्मी हुए. इसके अलावा सैकड़ों आंदोलनकारी हिरासत में हैं.

ग़ौरतलब है कि बीते 30 सितंबर को मेची से महाकाली तक 1,155 किलोमीटर लंबी मानव श्र्खला बनाकर आंदोलनकारियों ने एक रिकॉर्ड कायम किया. भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड एवं पश्चिम बंगाल से जुड़े नेपाल के झापा, मुरंग, सोनसरी, सप्तरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बाड़ा, परसा एवं नवल परासी आदि ज़िलों में सीमांचल की तक़रीबन 20 लाख बेटियां ब्याही हैं.

यही वजह है कि नेपाल के मधेश आंदोलन के समर्थन में भारत-नेपाल के सीमावर्ती ज़िले सीतामढ़ी के भिट्ठा मोड़, सोनबरसा एवं बैरगनिया से लेकर रक्सौल तक ज़ोरदार आवाज़ उठने लगी है. लोगों का कहना है कि भारत सरकार को इस मामले में अविलंब हस्तक्षेप करना चाहिए.

मधेशियों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयास तेज करने चाहिए. नेपाल के सवाल पर राज्य के सीमावर्ती इलाकों की राजनीति गर्मा रही है. अगर दबी ज़ुबान चल रही चर्चा पर यकीन करें, तो चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की तैयारी है. अगर ऐसा होता है, तो सीमावर्ती इलाकों में राजनीतिक समीकरण बदल भी सकते हैं.

सीतामढ़ी की आठ सीटों एवं शिवहर की एक सीट पर नेपाल प्रकरण एनडीए प्रत्याशियों के सामने गंभीर चुनौती पेश कर सकता है. खास तौर पर सीतामढ़ी नगर, सुरसंड, परिहार एवं रीगा में यह प्रकरण एनडीए के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है. अगर समय रहते भाजपा नेतृत्व मधेश आंदोलन पर अपनी चुप्पी तोड़ देता है, तब तो संभव है कि एनडीए चुनाव में बाजी मार ले, अन्यथा जनाक्रोश उसके लिए घातक साबित हो सकता है.

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