सुपर-फ्लॉप योजना बन गई मनरेगा

ओडिशा के संबलपुर ज़िले की ग्राम पंचायत मानेसर के गांव सुरुंगा में पिछड़े वर्ग के 47 वर्षीय साहेब अदावर ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रा़ेजगार गारंटी योजना शुरू होते ही जॉब कार्ड बनवा लिया, जिसका नंबर है 23893. लेकिन, वह कभी काम मांगने नहीं गए.

इसी गांव के आदिवासी समुदाय के 30 वर्षीय अरुण कुमार पट्टा के कार्ड नंबर 12127 पर 2012 में 14 और 12 दिनों का काम दर्ज है, लेकिन उन्हें खुद नहीं मालूम कि उन्होंने कितने दिन काम किया.

3 बस उन्हें 75 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मज़दूरी मिल गई थी. आदिवासी समुदाय के संजय छूड़िया, अंतर्यामी मांडी, ललित प्रधान, जगबंधु पट्टा, सुवन्ना मांझी, सविता मांझी, श्रीधर भोई, सहस नाग, बुद्धमत प्रधान एवं राजकुमार विस्वाल का आरोप है कि तत्कालीन सरपंच ने उन्हें यह कहते हुए काम नहीं दिया कि मिट्टी खोदने का काम अभी है ही नहीं.

यूएनडीपी और भारत सरकार की फेलोशिप के तहत अध्ययन के क्रम में यहां आने पर पता चला कि इस पंचायत में यूं तो 20 गांव हैं, पर राजस्व गांवों की संख्या मात्र नौ है. सुरुंगा गांव संबलपुर-कटक राष्ट्रीय राजमार्ग पर संबलपुर से आठ किलोमीटर पूरब जाकर फिर पांच किलोमीटर उत्तर में पड़ता है. यहां से
तालपाली गांव क़रीब सात किलोमीटर है, जो इसी पंचायत में है. सरपंच यहीं रहती हैं.

खबर है कि यह पंचायत अब संबलपुर नगर निगम के अंतर्गत जाने वाली है, लेकिन 35 वर्षीया आदिवासी सरपंच चंद्रावती मुंडा को ऐसा कोई पत्र प्रशासन से नहीं मिला है. कलक्टर ने एक बैठक में इस बात की सूचना दी थी. हालांकि, बीडीओ पंकज प्रधान पत्र जारी होने की बात कहते हैं. सरपंच बताती हैं कि पंचायत में मिट्टी का काम नहीं है, क्योंकि यहां दोफसली खेती होती है.

क्या ग्राम पंचायत की आम सभा में आपने कभी रा़ेजगार सृजन के बारे में चर्चा की? इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं था. ओडिशा क्या, पूरे देश में मनरेगा की छवि मिट्टी कटाई-भराई के रूप में सृजित हो चुकी है. हालांकि, इस योजना की दस प्राथमिकताओं में मिट्टी का काम अंतिम स्थान पर है.

ज़िला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दक्षिण में इसी ब्लॉक की पंचायत पुटियापल्ली में भी दलित बाहुल्य आबादी है, लेकिन यहां के परसुराम भोई, धीरेंद्र नायक, सुवास प्रधान एवं पिंटू दंता आदि दलित-पिछड़े समुदाय के लोगों को शहर से लेकर गांव तक इतना काम मिल जाता है कि उन्हें मनरेगा में काम मांगने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

आप मनरेगा में काम क्यों नहीं करना चाहते? जवाब में वे कहते हैं कि इसमें मज़दूरी का भुगतान कई महीनों बाद होता है, मिट्टी की कटाई ठेके पर होती है, जमीन नाप कर मज़दूरी मिलती है और दिहाड़ी का कोई हिसाब नहीं होता. कुछ लोगों ने कई साल पहले काम किया था, लेकिन भुगतान की दिक्कत के चलते आगे काम मांगना ही छोड़ दिया. यहां पिछड़ी जाति की महिला कोटे से सरपंच बनीं 32 वर्षीया रंजीता साहू मनरेगा में काम न होने का मुख्य कारण मिट्टी की कमी बताती है.

उनके मुताबिक, यहां कोई काम भी नहीं है और न कोई काम सृजित करने की कोशिश कभी की गई. पढ़े-लिखे लोग तो काम मांगते नहीं और मज़दूरों को शहर के ही काम से फुर्सत नहीं मिलती. जॉब कार्ड में काम का विवरण न होने पर वह कहती हैं कि इस तरह का विवरण ब्लॉक के अधिकारी अपने यहां दर्ज कर लेते हैं, कार्ड में दर्ज करना ज़रूरी नहीं है.

संबलपुर-भुवनेश्वर राष्ट्रीय राजमार्ग पर जुजुमुरा ब्लॉक के गांवों में मनरेगा की हालत कुछ ज़्यादा दयनीय है. यहां मनरेगा एवं इंदिरा आवास योजना में गड़बड़ी और अनियमितता की चर्चा हर ज़ुबान पर है. इंदिरा आवास का पैसा ले लेना, कुछ बालू-ईंट गिरा देना और फिर सरपंच एवं अफसरों की मिलीभगत से पूरा पैसा गायब कर देना आम है. कई मृत लोगों के नाम पर भी जॉब कार्ड बनाने और भुगतान होने की बात ग्रामीण बताते हैं.

आदिवासी मज़दूरों का एक ही रोना है कि ठेकेदार कई महीनों बाद पैसा देता है. जॉब कार्ड तो उनके पास है, लेकिन बैंक की पासबुक ठेकेदार के पास है. यह ठेकेदार अवैध रूप से बीच में आ गया है, जो पैसे की बंदरबांट की योजना बनाता है.

जांच करने वाले आते नहीं और ग्राम रा़ेजगार सेवक ग़लत रिपोर्ट दे देता है. कई लोगों द्वारा दूसरे के कार्ड पर काम करने की बात भी सामने आई. इस व्यवस्था में कार्ड धारक को कुछ कमीशन दे दिया जाता है. गांव के चितरंजन प्रधान इन दोनों केंद्रीय योजनाओं में बदलाव की बात कहते हैं.

साहसपुर के पूर्व ओबीसी सरपंच और वर्तमान में सरपंच के पति शिव नारायण साहू मनरेगा के सारे प्रावधान गांव तक आते-आते पलट जाने की बात कहते हैं. मनरेगा में नीचे से रा़ेजगार सृजित करके उसके अनुसार धनराशि की मांग और सरकार की ओर से उतनी ही धनराशि के भुगतान की व्यवस्था है, लेकिन साहू के अनुसार, केंद्र एवं राज्य से जब बीडीओ के ऊपर दबाव पड़ता है कि कुछ काम दिखाना है, तो बीडीओ सरपंच एवं इंजीनियर आदि पर दबाव डालते हैं और अफरातफरी में खानापूर्ति करके पैसों की बंदरबांट हो जाती है.

ज़मीन पर कुछ काम नहीं हो पाता. साहू इलाके के लिए ऐसे कई काम बताते हैं, जिनकी प्रकृति मनरेगा से अलग है, जैसे मिट्टी वाली सड़क को अगले चरण में मुरुम और मेटल की बनाना, लेकिन मनरेगा में इसकी अनुमति नहीं है. जुजुमुरा में 1992 से 1995 तक ब्लॉक प्रमुख रहे 78 वर्षीय पंचानन पंडा सारी समस्या की जड़ में लोगों में इच्छाशक्ति न होना मानते हैं.

अधिक पैसा आ जाने पर लोग लूट में शामिल हो जाते हैं. पंडा इसे ठीक करने का उपाय ऊपर से बताते हैं. हालांकि, वह मनेरगा के वर्तमान क़ानून को पूर्ण और अच्छा मानते हैं. वह कहते हैं, भ्रष्टाचार रोकने के लिए शासन स्तर पर सुधार होना चाहिए. हमें सुविधावादिता छोड़कर श्रमवादी बनना पड़ेगा, तभी जाकर व्यवस्था ठीक हो पाएगी.

मनरेगा एवं इंदिरा आवास जैसी केंद्रीय योजनाओं की देखरेख के लिए ज़िम्मेदार संबलपुर ज़िला ग्रामीण विकास प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2014-15 और 2015-16 में अब तक ज़िले की किसी भी पंचायत से मनरेगा के लिए कोई धनराशि की मांग नहीं आई. इसके पहले के सालों में कुछ मांग है. अधिकारी इसके लिए ग्राम पंचायतों और माओवाद को ज़िम्मेदार मानते हैं.

बीडीओ पंकज प्रधान दोफसली खेती को मनरेगा के लिए बाधक मानते हैं. उनका कहना है कि पूरे साल खेतों में फसल खड़ी रहने की वजह से मिट्टी नहीं मिलती. लेकिन, वह इस बात का कोई जवाब नहीं देते कि पंचायतों में रा़ेजगार सृजन के अन्य आयाम क्यों नहीं खोजे जाते?

प्रधान यह भी बताते हैं कि उनके ब्लॉक की सभी 12 पंचायतों में ज़मीन सिंचित है, इसलिए काम की कमी नहीं है और मनरेगा की कोई खास ज़रूरत नहीं है. मनरेगा या इंदिरा आवास योजना में किसी प्रकार की गड़बड़ी को वह ग़लत बताते हैं.

संबलपुर ज़िला ग्रामीण विकास प्राधिकरण में परियोजना निदेशक ज्योति लाकड़ा मनरेगा में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार और गड़बड़ी की बात स्वीकारते हैं. उनका कहना है कि कई इलाके माओवाद प्रभावित हैं और वहां माओवादी लेवी वसूल करने के लिए बिना काम किए मज़दूरी उठाने का दबाव डालते हैं, इसलिए भी काम प्रभावित होता है.

वैसे कई पंचायतों में सिंचित ज़मीन और दोफसली खेती होने की वजह से काम की कमी नहीं है और लोग काम नहीं मांगते. तीन साल पहले तक सड़क बनाने और मिट्टी के अन्य काम काफी हुए. वे काम पूरे हो गए हैं. वैसे अन्य रा़ेजगार सृजन के बारे में विचार किया जा रहा है.

राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता 68 वर्षीय राधाकांत बोहिदार कहते हैं, स्थानीय संसाधनों एवं ज़रूरतों के मुताबिक स्थानीय स्तर पर क़ानून बनाकर और उस पर सख्ती से अमल करके ही स्थिति में सुधार हो सकता है.

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