पप्पू यादव, ओवैसी और तारिक अनवर बेअसर साबित हुए

biharबिहार चुनाव से पहले मुस्लिम-यादव (माय) समीकरण के टूटने या उसमें सेंध लगने की बातें कही जा रही थीं. इस सन्दर्भ में तीन नाम लिए जा रहे थे. ये नाम थे- पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी (लो), असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (एआईएमआईएम) और तारिक अनवर की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी).

ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि ये तीनों महागठबंधन का खेल बिगाड़ सकते हैं. वोटिंग के बाद आने वाले एग्जिट पोल भी ये इशारा कर रहे थे कि शायद इन तीनों ने माय समीकरण में कुछ न कुछ सेंध ज़रूर लगाया है. एनडीए के चुनाव जीतने और न जीतने में भी इन तीनों की कुछ न कुछ भूमिका रहने वाली थी.

बहरहाल, चुनाव के आखिरी नतीजे इस लिहाज से अप्रत्याशित थे कि लगभग सभी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण या एग्जिट पोल कांटे की लड़ाई की उम्मीद लगाये हुए थे. लेकिन इसमें एक दिलचस्प पहलू यह भी था कि न तो पप्पू यादव या ओवैसी या फिर तारिक अनवर बिहार के मतदाताओं को प्रभावित कर पाए.

जहां तक असदुद्दीन ओवैसी का सवाल है तो चुनाव से पहले उनके नाम की बहुत चर्चा थी, उनके बारे में कहा जा रहा था कि वह लालू यादव के माय समीकरण को बिगाड़ सकते हैं. एआईएमआईएम मुख्य रूप से हैदराबाद और तेलंगाना की पार्टी है और यह आम तौर पर हैदराबाद के आस-पास के क्षेत्र तक सीमित है.

लेकिन पिछले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीतकर पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कहा जा रहा था कि ओवैसी यहां भी अपने उम्मीदवार उतार कर महागठबंधन का खेल बिगाड़ सकते हैं.

वह टीवी न्यूज शो में दिखने भी लगे थे. शुरू में यह खबर आई कि उनकी पार्टी राज्य के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र सीमांचल की 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. लेकिन फिर यह खबर आई कि वह एनडीए को फायदा पहुंचाने के लिए बिहार में आ रहे हैं. अंत में उन्होंने केवल छह उम्मीदवार मैदान में उतारे लेकिन अगर चुनाव के नतीजों पर नज़र डाली जाए तो उनका खाता भी नहीं खुला.

एक दो सीटों पर उनके उम्मीदवार लड़ाई में दिखे लेकिन उनकी पार्टी का कोई खास असर नहीं हुआ. अगर वोट प्रतिशत के लिहाज से देखा जाए तो उनकी पार्टी को केवल 0.2 प्रतिशत वोट मिले. किशनगंज के कोचाधामन से अख्तरुल ईमान दूसरा स्थान हासिल कर सके. बाकी के किसी भी एआईएमआईएम उम्मीदवार का प्रदर्शन उत्साहजनक नहीं रहा.

ओवैसी द्वारा केवल छह उम्मीदवार मैदान में उतारने पर ये सवाल उठ रहे थे कि आखिर वह इतने कम उम्मीदवारों के साथ भारतीय मुसलमानों के नेतृव का दावा कैसे पेश कर सकते हैं? दरअसल उन्हें एहसास था कि सीमांचल में मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव महागठबंधन की तऱफ है और वे उनकी पार्टी को वोट नहीं देंगे. इसलिए उन्होंने मतदाताओं का मिजाज़ भांपते हुए केवल छह उम्मीदवार मैदान में उतारे.

जैसा ख़बरों में भी आया कि ओवैसी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर अपनी निगाह टिका रखी है. लेकिन बिहार विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी के लिए जो नतीजे आये हैं, वह किसी भी तरह से उत्साह जनक नहीं हैं. और उत्तर प्रदेश की उनकी राह आसान होती हुई नहीं दिख रही है.

लालू यादव के माय समीकरण का खेल बिगाड़ने के सिलसिले में जो दूसरा नाम लिया जा रहा था वह नाम पप्पू यादव का. चुनाव अभियान के दौरान उनकी कई सभाओं में अच्छी-खासी भीड़ भी दिखी जिससे लग रहा था कि वह कम से कम कोसी-मधेपुरा के यादव बहुल क्षेत्र में लालू और महागठबंधन के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं.

लेकिन यहां के मतदाताओं ने पूरी तरह से लालू और महागठबंधन के साथ जाने का फैसला किया और पप्पू यादव को पूरी तरह से नकार दिया. शायद ओवैसी की तरह यह बात उनके विरुद्ध गई कि वह जीतने के लिए नहीं बल्कि केवल महागठबंधन को हराने के लिए मैदान में हैं. इसलिए उनकी पार्टी जन अधिकार पार्टी (लो) के उम्मीदवार मधेपुरा और कोसी क्षेत्र की सीटों पर कोई खास प्रदर्शन नहीं कर पाए.

उनकी पार्टी को कुल वोट का केवल 1.4 प्रतिशत वोट मिल सका, और सहरसा, मधेपुर, सुपौल और पूर्णिया जहां पप्पू यादव की एक अच्छे नेता की छवि है, की किसी भी सीट पर कोई चुनौती पेश करते हुए नहीं देखे और न ही उनके उम्मीदवार महागठबंधन का खेल बिगाड़ते नज़र आये.

जब समाजवादी पार्टी और एनसीपी ने महागठबंधन से अलग होने का फैसला किया तो पप्पू यादव ने उनके साथ मिलकर एक तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयास किया लेकिन फिर वह प्रयास सफल नहीं हो पाया और उन्हें अकेले ही चुनाव मैदान में उतरना पड़ा.

हालांकि एनसीपी का बिहार में कोई खास आधार नहीं है लेकिन तारिक अनवर इस पार्टी के बड़े नेता हैं और वह कटिहार से कई बार लोक सभा के लिए चुने गए हैं. शुरू में उनकी पार्टी राजद, जदयू और कांग्रेस के महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने वाली थी लेकिन एनसीपी ने छह सीटों के साथ महागठबंधन में शामिल होने से इंकार कर दिया था.

इसलिए पार्टी अकेले ही चुनाव मैदान में उतरी और आशा के अनुरूप कटिहार की तीन सीटों पर उनका प्रदर्शन अच्छा रहा. कहिटार के प्राणपुर विधान सभा से उनकी उम्मीदवार इशरत प्रवीण दूसरे स्थान पर रहीं, तीसरा स्थान कांग्रेस को मिला. इस सीट से भाजपा के विनोद कुमार सिंह विजयी हुए.

अगर एनसीपी महागठबंधन में शामिल हुई होती तो यह सीट वे जीत सकते थे. इसके इलावा एनसीपी, महागठबंधन को कोई नुकसान पहुंचाती नज़र नहीं आती.
एनसीपी को बिहार के कुल वोट का केवल 0.5 प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ.

कुल मिला कर देखा जाए तो तीनों पार्टियां लालू यादव के माय समीकरण को तोड़ने में नाकाम रहीं. इसकी एक वजह तो यह थी कि पप्पू यादव और ओवैसी पर यह आरोप लगा के वे चुनाव जीतने के बजाये एनडीए को फायेदा पहुंचाने के लिए मैदान में उतरे हैं.

इसलिए न तो पप्पू यादव अपने वर्चस्व वाले यादव बहुल क्षेत्र में बेअसर दिखे वहीं ओवैसी और तारिक अनवर भी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कोई कामयाबी हासिल नहीं कर पाए.