सहवाग जैसे क्रिकेटर बनते नहीं पैदा होते हैं

अटकलों और अफवाहों के दौर के बाद नज़फगढ़ के नवाब और मुल्तान के सुल्तान के नाम से मशहूर भारतीय बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

अपने 37 वें जन्मदिन के मौक़े पर संन्यास की घोषणा करते हुए सहवाग ने कहा कि भारत के लिए खेलना एक यादगार सफ़र रहा है और मैंने इसे साथी खिलाड़ियों के साथ-साथ भारतीय क्रिकेट फैंस के लिए और यादगार बनाने की कोशिश की. मुझे लगता है कि ऐसा करने में मैं कुछ हद तक कामयाब रहा.

अपने बयान के आखिर में सहवाग ने कहा, मैं उन सभी लोगों का भी शुक्रिया अदा करना चाहता हूं जिन्होंने बीते सालों में क्रिकेट के बारे में मुझे सलाह दी. मैं ज्यादातर सलाहों को न मानने के लिए माफ़ी चाहता हूं. मेरे पास सलाह ना मानने का एक कारण था, मैं अपने तरीक़े से खेल रहा था. निःसंदेह सहवाग ने ऐसा ही किया.

भारतीय क्रिकेट में जब कभी सर्वश्रेष्ठ टेस्ट ओपनर की बात होगी तो सुनील गावस्कर के बाद वीरेंद्र सहवाग का नाम हमेशा लिया जाएगा. सहवाग ने क्रिकेट के मूलभूत तरीके खासकर ओपनिंग बल्लेबाज़ी में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया. उन्होंने टेस्ट और एक दिवसीय मैचों में दर्शकों को टी-20 क्रिकेट का मजा दिलाया.

सहवाग जैसे खिलाड़ियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि वह और उनके जैसे खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट को नीरसता के दलदल से बाहर खींच लाए और टेस्ट क्रिकेट के अस्तित्व के सवाल को बेनामी साबित कर दिया.

यदि आज दुनिया में टेस्ट क्रिकेट का स्वरूप बदला और भारतीय टीम ने पहले के मुक़ाबले ज्यादा सफलता हासिल की उसके श्रेय सिर्फ और सिर्फ वीरेंद्र सहवाग को जाता है. सहवाग के टेस्ट पदार्पण से पहले टीम इंडिया ने 463 टेस्ट मैच खेले थे जिनमें से लगभग 19 प्रतिशत मैचों में जीत हासिल की थी.

लेकिन सहवाग के टीम में रहते जीत प्रतिशत बढ़कर 40 हो गया था. उनके टीम से बाहर होने के बाद यह घटकर लगभग 26 प्रतिशत हो गया. ये आंकड़े बताते हैं कि सहवाग होने के क्या मायने हैं, सहवाग ने टीम इंडिया को किस तरह प्रभावित किया. कहावत भी है वेल बिगिन इज हाफ डन, जब-जब टीम इंडिया को सहवाग ने अच्छी शुरूआत दी, भारतीय टीम ने उन मैचों में अच्छा किया.

भारतीय क्रिकेट जगत में वीरेंद्र सहवाग ने अपनी पहचान एक आक्रामक बल्लेबाज के रूप में तब बनाई थी जब सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली जैसे बल्लेबाजों के सितारे बुलंदी पर थे. सहवाग ने अपनी बल्लेबाजी के अनोखे अंदाज से प्रशंसकों के बीच अमिट छाप छोड़ी. भले ही सहवाग ने पिछले दो सालों में टीम इंडिया के लिए कोई मैच नहीं खेला. लेकिन प्रशंसक उन्हें अपने दिल से नहीं निकाल सके.

उन्हें आशा थी कि सहवाग वापसी करने में कामयाब होंगे. एक गेंदबाज तब परेशान होता है. जब कोई बल्लेबाज़ उसकी बेहतरीन गेंद को बाउंड्री का पार पहुंचा दे. यह हुनर वीरेंद्र सहवाग के पास था. सहवाग ने दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन गेंदबाज के छक्के छुड़ा दिए. उन्हें केवल एक तरह की क्रिकेट खेलनी आती थी और वह थी आक्रामक क्रिकेट.

जब तक सहवाग पिच पर होते थे तब तक विरोधी कप्तान, गेंदबाज और फील्डर चैन की सांस नहीं ले पाते थे. सहवाग उस तूफान की तरह थे जो विरोधी खेमे को उड़ा ले जाते थे. मैदान पर कैसी भी परिस्थिति हो या कैसी भी पिच. वहां केवल एक चीज स्थिर होती थी और वह था सहवाग के खेल का बेखौफ अंदाज. खेल के इसी अंदाज ने उन्हें एक समय भारतीय क्रिकेट का सिरमौर बना दिया था. यदि सहवाग का बल्ला चल गया तो टीम की जीत निश्चित होती थी. जब तक सहवाग मैदान पर होते थे, तब तक सब कुछ संभव नज़र आता था.

लापरवाही भरे शॉट्स खेलना शुरू से ही सहवाग की आदत में शुमार था. वह एक ऐसे बल्लेबाज के तौर पर जाने जाते रहे हैं, जो चल गया तो विरोधी टीम का हारना तय और नहीं चला तो टीम इंडिया पर बोझ. बावजूद इसके टीम ने कप्तान ने उन पर हर बार दांव खेला.

वीरेंद्र सहवाग की दिलेरी ही उन्हें सबका कायल बनाती थी. सहवाग पिच पर कभी दबाव में नहीं होते थे. चाहे वह नर्वस नाइंटीज में हों या तिहरे शतक के करीब. वह कभी पर्सनल माइलस्टोन्स के लिए नहीं खेले, उनका मस्तमौला अंदाज ही उन्हें अपनी पीढ़ी के दूसरे खिलाड़ियों से अलग खड़ा करता है.

सहवाग ने अपने करियर में टीम इंडिया के लिए 104 टेस्ट मैच खेले और 49.34 की औसत से 8586 रन बनाए. इसमें 23 शतक और 32 अर्धशतक शामिल हैं. टेस्ट में उनका सर्वाधिक स्कोर 319 रन है. सहवाग तिहरा शतक बनाने वाले इकलौते भारतीय बल्लेबाज हैं. उनसे किसी को यह कारनामा करने की अपेक्षा नहीं थी लेकिन उन्होंने यह कारनामा दो बार किया.

आज भी टीम इंडिया के तीन सबसे बड़े स्कोर सहवाग के नाम दर्ज है. 251 एक दिवसीय मैचों में सहवाग ने 35.05 की औसत से 8273 रन बनाए. वन-डे में उनके नाम 15 शतक और 38 अर्धशतक दर्ज हैं.

सहवाग ने अपने अंतरराष्टीय करियर की शुरूआत वर्ष 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ मोहाली वन-डे से की थी. शुरूआत में उन्हें वन-डे विशेषज्ञ माना जाता था लेकिन साल 2001 के दक्षिण अफ्रीकी दौर पर जाने वाली टीम में तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने उन्हें जगह दिलवाई.

करियर के पहले टेस्ट में नंबर छह पर बल्लेबाज़ी करने उतरे सहवाग ने शतक जमाकर कप्तान के निर्णय को सही साबित किया. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. कुछ समय बाद सहवाग टीम इंडिया के लिए वन-डे और टेस्ट दोनों में पारी की शुरूआत करने लगे.

सहवाग एक अच्छे बल्लेबाज होने के साथ-साथ एक अच्छे ऑफ स्पिनर भी थे. उन्होंने अपनी गेंदबाजी की बदौलत कई बार टीम को मुश्किलों से बाहर निकाला. उन्होंने टेस्ट मैचों में 40 और वन-डे में 96 विकेट लिए. साल 2003 से 2012 के बीच उन्होंने 12 एकदिवसीय, चार टेस्ट और एक टी-20 मैच में टीम इंडिया की कमान भी संभाली.

हालांकि सहवाग ने मैदान पर किसी गेंदबाज को उधेड़े बिना नहीं छोड़ा, लेकिन उन्होंने संन्यास के बाद कहा कि मुथैया मुरलीधरन से उन्हें बहुत डर लगता था.सहवाग की तकनीक की क्रिकेट के जानकारों ने आलोचना की, लेकिन सहवाग ने हर बार अपने ऊपर ऊठे सवालों का जवाब अपने बल्ले से दिया.

उन्होंने अपने खेल का अंदाज कभी नहीं बदला. उछालभरी पिचों पर स्विंग होती गेंदों पर उनकी कमजोरियां उजागर हो जाती थीं. उन्हें डिफेंसिव क्रिकेट खेलना नहीं आता था. दूसरे खिलाड़ी गेंद को रोककर पुरानी करने में यकीन करते थे और सहवाग गेंद को पीट-पीटकर पुरानी करने में.

सहवाग जैसे धमाकेदार क्रिकेटर की धमाकेदार विदाई होनी चाहिए थी, लेकिन उन्हें वैसी विदाई नहीं मिल सकी. उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का बेहद निराशाजनक अंत हुआ. मार्च 2013 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे टेस्ट के बाद उन्हें भारतीय टीम से बाहर कर दिया गया. इसके बाद वह टीम में वापसी नहीं कर पाए.

जैफरी बायकॉट ने दो साल पहले ही बयान दिया था कि सहवाग अपना अंतिम टेस्ट खेल चुके हैं, वह वापसी नहीं कर पाएंगे. दुःखद यह है कि बायकॉट की भविष्यवाणी सही साबित हुई. सहवाग की आंखें कमजोर हो गई थीं, इस वजह से भी उन्हें खेलने में परेशानी हुई. वह चश्मे के साथ मैदान पर संतुलन नहीं बना सके, उनकी सबसे बड़ी ताकत ही उनकी राह की सबसे बड़ी बाधा बन गई.

सहवाग जैसे क्रिकेटर एक बार पैदा होते हैं. उनके जैसा खिलाड़ी बनाया नहीं जा सकता, जो खेल के नियम बदल सके, उन्हें हमेशा भारतीय क्रिकेट के स्वर्णिम दौर के और सर्वकालिक महान बल्लेबाज के रूप में याद किया जाएगा.