सशक्तिकरण की ओर बढ़ते क़दम

morarka foundationएकता और संगठन से बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर हो जाती हैं. नवलगढ़ ज़िले की ग्रामीण महिलाएं इसी मूलमंत्र का अनुसरण कर आत्मविश्वास और सच्ची लगन के साथ स्वावलंबन की ओर अग्रसर हो रही हैं.

मोरारका फाउंडेशन द्वारा महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनके माध्यम से उनका सशक्तिकरण हो रहा है. इलाके की महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये सफलता के नए मुकाम हासिल कर रही हैं.

ऐसी ही एक महिला हैं नारसिंघानी गांव की प्रभाती देवी, जो पूर्व में पारिवारिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद आज एक सफल डेयरी संचालक हैं. आज वह क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं. प्रभाती देवी ने बताया कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और परिवार में शिक्षा का घोर अभाव था. उनके पति उन्हें घर से बाहर निकलने नहीं देते थे.

यह कहानी स़िर्फ प्रभाती देवी की नहीं है, बल्कि समूह की ज़्यादातर महिलाओं के पति उन्हें घर से बाहर नहीं जाने देते थे. प्रभाती देवी ने बताया कि मोरारका फाउंडेशन ने उनके गांव की सावित्री देवी के घर पर लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की बैठक बुलाई, जिसमें वह भी मौजूद थीं.

तब उन्हें पता चला कि समूह द्वारा महिलाओं को ऋण दिया जाता है. बैठक के बाद मोरारका फाउंडेशन के प्रतिनिधि ने उन्हें विस्तार पूर्वक स्वयं सहायता समूह के बारे में बताया-समझाया.

प्रभाती देवी बताती हैं कि मार्च 2003 में उन्हें स्वयं सहायता समूह की ओर से 25,000 रुपये का ऋण मिला, जिससे उन्होंने एक गाय खरीदी.गाय का दूध बेचने से हुई आमदनी से उन्होंने समूह का ऋण अदा कर दिया और कुछ पैसे भी बचा लिए.

इसके बाद सितंबर 2009 में उन्होंने बैंक से 50,000 रुपये का ऋण लिया, जिससे कई बकरियां खरीदीं और फिर उन बकरियों का दूध बेचकर बैंक का ऋण चुकाने के साथ-साथ बचत भी की. इससे उनके घर की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार आया.

सितंबर 2013 में उन्होंने 50,000 रुपये बैंक से और 50,000 रुपये आपसी लेन-देन के ज़रिये बतौर ऋण लिया. इन पैसों से उन्होंने गाय-बकरियों के लिए छप्पर बनवाए, चारा खरीदा और अपनी चार बीघा ज़मीन पर ट्यूबवेल लगवाया, जिससे गाय-बकरियों के घास-चारा उगाने की व्यवस्था की.

आज प्रभाती देवी गाय-बकरियों का दूध और उनके बच्चे बेचकर प्रतिमाह 5,000 रुपये की बैंक किस्त चुका रही हैं तथा अपने घर का खर्च भी वहन कर रही हैं. दिन-प्रतिदिन घर की आर्थिक स्थिति में सुधार देखकर अब उनके पति भी कामकाज में हाथ बंटा रहे हैं.

इसी तरह प्रेम स्वयं सहायता समूह की सदस्य प्रेम देवी ने टिफिन सप्लाई करके अपने घर की आर्थिक स्थिति सुधारी. उनके इस काम में एक दर्जन से ज़्यादा महिलाओं को रा़ेजगार मिला है. यह समूह टिफिन बनाकर स्कूलों एवं हॉस्टलों में सप्लाई करता है. यह टिफिन सेंटर शुरू करने में मोरारका फाउंडेशन ने काफी मदद की.

ग़ौरतलब है कि राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में स्वयं सहायता समूह का आग़ाज़ मोरारका फाउंडेशन ने वर्ष 1993 में किया था. पहले स्वयं सहायता समूह का गठन नवलगढ़ के निकट घोड़ीवारा खुर्द में हुआ था. समूहों के गठन के लिए ग़रीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों का सर्वेक्षण मोरारका फाउंडेशन ने नवलगढ़ क्षेत्र के विभिन्न गांवों में कराया.

सर्वेक्षण की मदद से क्षेत्र की निर्धन महिलाओं की समस्याओं के बारे काफी जानकारी हासिल हुई. शुरू में दस गांवों में 50 स्वयं सहायता समूह गठित किए गए. वर्ष 2000 में मोरारका फाउंडेशन ने नाबार्ड (नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट) की सहायता से 35 गांवों में 100 स्वयं सहायता समूहों का गठन किया. इसके बाद वर्ष 2003 में केयर आर्गनाइजेशन के साथ काम करते हुए 200 स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया.

समूह की महिलाओं को वर्मी कंपोस्ट, जूतियां, दरी, गलीचा, लाख की चूड़ियां, अचार, पापड़, मंगोड़ी, कपड़े के बैग एवं पायदान बनाने और सिलाई-कढ़ाई, बूंदी बांधने का प्रशिक्षण दिया गया.

इससे इन महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार आया. वर्ष 2004 में 50 स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया और इन समूहों से जुड़ी महिलाओं को यूनिसेफ की सहायता से छोटे-छोटे कामों का प्रशिक्षण दिया गया.

मोरारका फाउंडेशन का लक्ष्य है कि इस काम 100 गांवों और 15 हज़ार परिवारों तक पहुंचाया जाए, ताकि अधिक से अधिक लोगों को स्वयं सहायता समूह का लाभ मिल सके. मुकुंदगढ़ निवासी पूनम देवी स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं. वह बताती हैं कि उन्हें अपने बच्चों का स्कूल में दाखिला कराने के लिए पांच हज़ार रुपये की आवश्यकता थी.

अगर वह किसी साहूकार से ऋण लेने जातीं, तो उन्हें समय पर पूरा पैसा न मिलता. यदि मिल भी जाता, तो उसका सूद चुकाते-चुकाते सालों गुज़र जाते और मूल रक़म जस की तस रह जाती. समूह के माध्यम से उन्हें बैंक से तुरंत ज़रूरत भर पैसा मिल गया और उसका ब्याज भी बहुत कम था, जिसे अदा करना उनके लिए मुश्किल नहीं था.

लिहाज़ा, उन्होंने थोड़ा-थोड़ा करके ऋण अदा कर दिया. इसी गांव की रामा देवी बताती हैं कि उनके पति बीमार रहते हैं. वह काम कर सकने में अक्षम हैं, जिसकी वजह से घर की आर्थिक स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही थी. इसी बीच उन्हें मोरारका फाउंंडेशन की मदद से चलाए जा रहे स्वयं सहायता समूह के बारे में पता चला और वह उसकी सदस्य बन गईं.

फिर उन्हें समूह ने बैंक से पांच हज़ार रुपये का ऋण दिलाया और उन्होंने उन पैसों से किराने की दुकान खोल ली. अब किराने की दुकान से उन्हें इतनी आमदनी हो जाती है कि वह बैंक का ऋण भी अदा कर रही हैं और घर का खर्च भी ठीक से चल रहा है. इसी तरह बलवंतपुरा निवासी संतोष बताती हैं कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी.

उनका तीन वर्षीय बेटा भी अक्सर बीमार रहता था. उनकी यह हालत देखते हुए 2009 में सलासर स्वयं सहायता समूह की बैठक में उन्हें बुलाया गया, जहां मोरारका फाउंडेशन की विनोद देवी ने स्वयं सहायता समूह के बारे में बताया-समझाया. बात संतोष की समझ में आई और वह समूह की सदस्य बन गईं.

वर्ष 2012 में ज्योति स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया. मोरारका फाउंडेशन ने महिलाओं को इस समूह में शामिल होने की प्रेरणा दी. नतीजतन, 13 महिलाएं इस समूह की सदस्य बन गईं, जिनमें मुकुंदगढ़ निवासी सरोजा भी शामिल थीं. सरोजा ने समूह के ज़रिये बैंक से 15,000 रुपये का ऋण लिया.

उन पैसों से उन्होंने अपने पति को सब्जी का ठेला लगवाया और पांच हज़ार रुपये से अपने लिए सिलाई मशीन खरीदी और घर पर सिलाई का काम शुरू कर दिया. सरोजा कहती हैं कि वह और उनके पति बेरोज़गार थे, लेकिन समूह से जुड़ने के बाद उन दोनों को रोज़गार मिल गया.

अब दोनों की कमाई से दिन अच्छे गुज़र रहे हैं. सरोजा कहती हैं कि मोरारका फाउंडेशन ने उन्हें दूसरों की गुलामी से निजात दिलाई. सरोजा जैसी कई महिलाएं हैं, जिन्होंने स्वयं सहायता समूह की मदद से बैंक से ऋण लेकर छोटे-छोटे काम शुरू किए और अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर बनाकर आज खुशहाल जीवन व्यतीत कर रही हैं.

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