भारत की सबसे प्रासंगिक किताब संविधान है

बिहार विधानसभा चुनाव, दलित परिवार के बच्चों की हत्या, नाबालिग बच्चियों से बलात्कार, महंगाई और गोमांस खाना चाहिए या नहीं, ये सारे मुद्दे पिछले दिनों अ़खबारों की सुर्खियों में छाए हुए थे. इन मुद्दों को एक-एक करके देखते हैं.

पहले महंगाई की बात. यह हम सबके लिए एक सबक है कि महंगाई को चुनाव के समय बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहिए, ताकि किसी को बाद में पछताना पड़े, जैसा कि आज भाजपा के साथ हो रहा है.

सभी ने देखा है, ऐसी तस्वीरें भी हैं कि कैसे हेमा मालिनी एवं भाजपा की अन्य महिला नेताओं ने आटा, सब्जी, दल की महंगी क़ीमतों के मसले पर विरोध किया था. आज जिस तरह से इन वस्तुओं की क़ीमतें बढ़ी हैं, वह भाजपा के लिए शर्म की वजह है.

ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर सकती. सरकार ने छापा मारकर 35 हज़ार टन आयातित दाल बरामद की है. इसका अर्थ है कि इससे पहले तक सरकारी तंत्र निष्क्रिय था.

चूंकि भाजपा व्यापारी वर्ग का समर्थन करती है, इसलिए जब भाजपा सत्ता में होगी, तो नौकरशाही उसके खिला़फ कड़े क़दम नहीं उठाएगी. लेकिन, देश में वास्तव में दाल की कमी हो गई है और पहले भी ऐसा रहा है. इसके लिए एक उचित योजना बनाने की ज़रूरत है, क्योंकि हर साल यह समस्या सामने आती है. दाल की कमी की समस्या प्याज या अन्य सब्जियों की तरह नहीं है.

यह एक गंभीर समस्या है, क्योंकि दाल शाकाहारियों के लिए प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है और उसकी उपलब्धता वास्तव में एक कठिन बात हो गई है. दाल की महंगाई प्रमुखता से सामने आई है. यह दो सौ रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है. जितनी जल्दी गंभीर किस्म के नौकरशाह और मंत्री समूह इस मसले पर अपना दिमाग लगाकर इसका समाधान निकालें, उतना अच्छा होगा.

दूसरा बिंदु है कि संविधान अभी दबाव की स्थिति में है. संविधान में उल्लेखित शब्द सेकुलर का मज़ाक बनाया जा रहा है. मैं सेक्युलर शब्द इस्तेमाल नहीं करूंगा. संविधान क़ानून के समक्ष सबको बराबरी का अधिकार देता है, बिना जाति, धर्म, नस्ल और समुदाय में भेदभाव के. क्या हम अभी भी ऐसा कर पा रहे हैं या नहीं? यह पहला सवाल है, जिस पर आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों को निर्णय करना चाहिए.

अभी भी वे मानते है कि हिंदुओं का प्रभुत्व है और बाकी सब उनके अधीन हैं. उन्हें ऐसा बोलने का साहस दिखाना चाहिए. उन्हें इस पर बहस शुरू करनी चाहिए, इसे एक संवैधानिक बहस बनने देना चाहिए. जैसे कि मोहन भागवत ने कहा कि आरक्षण समाप्त होना चाहिए और बिहार विधानसभा चुनाव में यह बयान गंभीरता से लिया गया.

दरअसल, उनके दिमाग़ में एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसके ज़रिये वे संविधान पर होने वाली बहस दोबारा शुरू करना चाहते हैं. ज़ाहिर है, वे किसी नतीजे पर नहीं पहुंचेंगे. लेकिन, महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे पास एक मजबूत संविधान है. इस बात का श्रेय प्रधानमंत्री को देना चाहिए कि उन्होंने एक से अधिक अवसरों पर यह कहा है कि भारत के लिए अगर कोई किताब प्रासंगिक है, तो वह है संविधान.

अन्य सारी किताबें किसी खास धर्म के लिए हैं, लेकिन संविधान सबके लिए है. अब अगर प्रधानमंत्री चाहते हैं कि संविधान की प्रभुता बनी रहे, तो उन्हें इसके लिए उपाय भी करने होंगे. उन्हें लोगों को यह बोलने की अनुमति नहीं देनी चाहिए कि किसी को किसी खास दिन मांस नहीं खाना चाहिए और किसी को बीफ नहीं खाना चाहिए. यह सब संविधान में नहीं है.

मांस-बीफ खाना किसी के लिए भी व्यक्तिगत मुद्दा है, आप इसे सार्वजनिक मुद्दा नहीं बना सकते. इस तरह का विमश खत्म करने के लिए कुछ किया जाना चाहिए. खाना-पीना, टीवी-सिनेमा देखना, कपड़े पहनना आदि सरकार के लिए मुद्दा नहीं हैं.

इसी तरह मोदी सरकार एक और बड़ी ग़लती कर रही है. दिल्ली सरकार और शासन के मसले पर वह संविधान को दबावपूर्ण स्थिति में लाने का काम कर रही है. दिल्ली में पुलिस और भूमि का मसला उपराज्यपाल के अधीन है, लेकिन जिस तरीके से उनके द्वारा मुख्यमंत्री के साथ व्यवहार किया जा रहा है, वह सर्वथा अनुचित है.

मुख्यमंत्री पर इतना दबाव डालने का प्रयास हो रहा है, ताकि वह सब छोड़कर निकल जाएं. पुलिस कमिश्नर क्या होता है? वह हज़ारों आईपीएस अधिकारियों में से एक होता है. और, वह हर दिन एक मुख्यमंत्री के खिला़फ बयान दे रहा है! वह अपने संबंधित मंत्री की शह मिले बिना ऐसा नहीं कर सकता. और, पूरी दिल्ली जानती है कि वह शख्स कौन है? यह कोई अच्छी मिसाल नहीं पेश की जा रही है.

यह सब आपातकाल के दौरान हुआ था. श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया और उसके बाद देश को 19 महीनों तक नौकरशाहों ने चलाया. उसके बाद फिर क्या हुआ? देश और प्रशासन को नौकरशाहों से चलवा कर राजनीतिक प्रणाली हटाया नहीं जा सकती, क्योंकि भारत में लोकतंत्र जीवंत और परिपक्व है.

मुझे नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री को इस सबके निहितार्थ की जानकारी है या नहीं, लेकिन यह गृह मंत्रालय और गृह सचिव की ज़िम्मेदारी है कि वे इसे ठीक करें. एक पुलिस कमिश्नर को अनुशासनहीन होकर इस तरह बयानबाजी की अनुमति नहीं दी सकती और न देनी चाहिए.

इसलिए मैं कह रहा हूं कि संविधान दबावपूर्ण स्थिति में है. आरएसएस केंद्र सरकार को लड़खड़ाने की कोशिश कर रहा है और केंद्र सरकार दिल्ली की राज्य सरकार को लड़खड़ाने की कोशिश कर रही है. यह सब बंद होना चाहिए.

अब सवाल आता है बिहार विधानसभा चुनाव का. चुनाव जारी है. जनता सर्वोच्च है. जो होना है, वह होगा. लेकिन, जिस तरह का ट्रेंड दिख रहा है, उससे यह प्रतीत होता है कि नीतीश कुमार अच्छा कर रहे हैं और जीतने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. इस चुनाव के कुछ दिलचस्प पहलू हैं.

एक तो यह कि दस वर्षों के शासन के बाद भी नीतीश कुमार के खिला़फ एक भी आरोप नहीं है. जांच और सुबूत की बात तो छोड़िए, एक आरोप तक नहीं है. यहां तक कि भाजपा भी पूरी आक्रामकता के साथ भी स़िर्फ यह आरोप लगा पाने की स्थिति में है कि जबसे नीतीश कुमार भाजपा से अलग हुए हैं, तबसे बिहार में विकास नहीं हुआ है.

ठीक है, यह एक विचार है, लेकिन नीतीश कुमार के खिला़फ वह कोई आरोप नहीं लगा सकी है. यह आज की राजनीति के लिए एक बहुत बड़ी बात है कि एक शख्स दस वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे और उसके खिला़फ कोई आरोप न हो, जैसा कि आजकल देखने को नहीं मिलता. यह अकेली ऐसी बात है, जो उन्हें अगले पांच वर्षों के लिए मुख्यमंत्री बनने की योग्यता देती है.

दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि हर कोई कहता है कि आधुनिक विमर्श में जाति की बात नहीं होनी चाहिए. टीवी चैनल दिखा रहे हैं कि बिहार के युवा बोल रहे हैं कि शिक्षित लोगों के बीच अब विकास की बात है और जाति की कोई जगह नहीं है. लेकिन, सच्चाई यह है कि जाति अभी भी एक बड़ा फैक्टर है. यह परिपक्व होने का समय है.

भारत में जातिवाद ग़रीबी से जुड़ा हुआ है. आप कह सकते हैं कि सवर्ण जातियों में भी ग़रीब लोग हैं और कुछ दलित भी अमीर हैं, लेकिन यह भी सच है कि सवर्णों की तुलना में पिछड़े वर्ग के लोग अधिक ग़रीब हैं. इसलिए समय के साथ जब तक सामाजिक तौर पर बदलाव नहीं आएगा, तब तक जाति एक फैक्टर रहेगा.

जातिवाद खत्म करने का स़िर्फ एक ही तरीका है कि सकारात्मक रुख अपनाना या ग़रीबों के लिए ऐसे प्रावधान करना, ताकि वे आगे बढ़ चुके लोगों के बराबर पहुंच सकें. जब तक यह नहीं होता, जाति एक फैक्टर बना रहेगा. देखते हैं कि बिहार में क्या होता है?